न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८७
अनुकूल तर्कभी नहीं है. प्रत्युत "वीतरागजन्मादर्शनात्-३ अ, १ आ, २५
सू०-अर्थात् विरक्त पुरुषका जन्म नहीं होता किंतु रागवाले पुरुषका जन्म होता है "
इस गौतमसूत्रसे कर्त्ता अनादि प्रतीत होता है, एवं भावरूप अनादिका नाश नहीं
होता; याते कर्त्ता नित्य मानना उचित है, एवं अप्रमाणिक प्रकृति आदि पदार्थोंकी
कल्पनासे क्या लाभ है ?
नच "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमू-
ढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते" इत्यनेन विरोध इति वाच्यम्, प्रकृ-
तेरदृष्टस्य गुणैरदृष्टजन्यैरिच्छादिभिः कर्त्ताऽहं कर्त्ताहमेवेत्यस्य
तदर्थत्वात् । "तत्रैवं सति कर्त्तारमात्मानं केवलं तु यः" इ-
त्यादि वदता भगवता प्रकटीकृतोऽयमुपरिष्टादाशय इति संक्षेपः।
सांख्यी-श्रीकृष्णदेवने ( गीताके तृतीयाध्यायके २७ श्लोकमें ) यह कहा कि-
"क्रियमाण यावत् कर्म प्रकृतिके सत्त्वादि गुणोंसे होते हैं उन कर्मोंको 'मैं कर्त्ता हूं'
इत्याकारक अहंकारसे विमूढ चित्तवाला जीवात्मा पुरुष 'मैंही कर्त्ताहूं' ऐसा मानताहै"
इस भगवद्वाक्यसे आपके कथनका विरोध होगा, क्योंकि इस वाक्यसे भगवान्ने
पुरुषको कर्त्ता नहीं मानाहै. नैयायिक-इस भगवद्वाक्यमें 'प्रकृति' नाम अदृष्टोंका
है, 'गुण' नाम अदृष्टजन्य इच्छादिकोंका है. एवं अदृष्टजन्य इच्छादि गुणोंद्वारा 'मैंही
कर्त्ता हूं' ऐसे अहंकार विमूढ होकर जीवात्मा मानताहै. इस वाक्यका येहा अर्थ
है. इस वाक्यसे भगवान्ने यह नहीं कहा, कि जीवात्मा कर्त्ता नहीं है
किन्तु यह कहा है कि-अकेला जीवात्मा कर्त्ता नहीं है; क्योंकि इसी अर्थको भग-
वान्ने अष्टादशाध्यायके १५ वें तथा १६ वें श्लोकमें लिखा है. वहां ऐसे कहा है कि
"आश्रय १ कर्त्ता २ अनेकप्रकारके करण ३ अनेक प्रकारकी चेष्टा ४ और जीवोंके
अदृष्ट ५,"यह पांचों मिलकर कार्यमात्रके प्रति कर्त्ता हैं. एवं इन पांचोंमेंसे जो पुरुष
केवल अपने आपकोही कर्त्ता मानताहै उस मलीनबुद्धि पुरुषको यथार्थ ज्ञान नहीं है
इन वाक्योंसे भगवान्का आशयै जीवके कर्त्तापनेमे स्पष्ट प्रतीत होता है यह संक्षेपसे
सांख्यमत खण्डन कियाहै.
धर्माधर्माश्रयोऽध्यक्षो विशेषगुणयोगतः ॥ ४९ ॥
भाषा-आत्मा धर्म तथा अधर्मका आश्रय है. एवं सुखदुःखादि विशेष गुणोंके
सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्षभी हो सकताहै ॥ ४९ ॥