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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 350 में से

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पृष्ठ 112

८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
धर्माधर्माश्रय इति । आत्मेत्यनुषज्यते । शरीरस्य तदाश्रयत्वे
देहान्तरकृतकर्मणां देहान्तरेण भोगानुपपत्तेः । विशेषगुणयो-
गत इति । योग्यविशेषगुणसम्बन्धेनात्मनः प्रत्यक्षं भवति, न
त्वन्यथा । अहंजानेहंकरोमीत्यादि प्रतीतेः ॥ ४९ ॥
भाषा-यहां 'आत्मा' शब्दका सम्बन्ध पीछे ग्रन्थसे करलेना. यदि शरीरहीको
धर्माधर्मका आश्रय मानें तो (देहान्तर) पुरुषशरीरसे किये कर्मोंका (देहान्तर)
श्वादिशरीरसे भोगनही बनसकेगा.प्रत्यक्षके योग्य ज्ञानसुखादि विशेष गुणोंके सम्बन्ध-
हीसे जीवात्माका प्रत्यक्ष होताहै. विशेषगुणोंके सम्बन्धसे विना नहीं होता. 'मैं जान
ताहूं, मैं करताहूं' इत्यादि प्रतीतियोंसे ज्ञानप्रकारक प्रयत्नादि प्रकारक जीवात्माका
भान होताहै ॥ ४९ ॥
प्रवृत्त्याद्यनुमेयोऽयं रथगत्येव सारथिः ।
भाषा-जैसे रथकी गतिसे रथवाहीका अनुमान होताहै वैसेही यह आत्मा दूसरे
पुरुषके शरीरमें चेष्टाद्वारा अनुमेय है.
प्रवृत्तीति । अयमात्मा परदेहादौ प्रवृत्त्यादिनाऽनुमीयते । प्रवृ-
त्तिरत्र चेष्टा, ज्ञानेच्छाप्रयत्नादीनां देहेऽभावस्योक्तप्रायत्वात् ।
चेष्टायाश्च प्रयत्नसाध्यत्वाच्चेष्टया प्रयत्नवानात्माऽप्यनुमीयत इति
भावः । तत्र दृष्टान्तमाह । रथेति । यद्यपि रथकर्म चेष्टा न भ-
वति तथापि तेन कर्मणा सारथिर्यथाऽनुमीयते तथा चेष्टात्म-
केन कर्मणा परात्माऽपीति भावः ।
भाषा-इस आत्माका दूसरे पुरुषकी देहमें प्रवृत्तिनिवृत्तिसे अनुमान होताहै.
यहां 'प्रवृत्ति' शब्दसे चेष्टाका ग्रहण है. ज्ञान इच्छा प्रयत्नादि गुणोंका शरीरमें अभाव
“शरीरस्य न चैतन्यं” इत्यादि ग्रन्थसे पीछे कह चुकेहैं और चेष्टा प्रयत्नसाध्य-
होती है इसलिये चेष्टावत्वरूप हेतुसे प्रयत्नवाले आत्माका अनुमानभी होसकताहै.
यहां रथसारथिका दृष्टान्तरूपसे कथन है. यद्यपि दृष्टान्तमें रथकी क्रिया चेष्टा नहीं है;
क्योंकि चेष्टा नाम 'हिताहितपरिहारार्था क्रिया' का है. वह क्रिया सिवाय चेतनके
रथादि जड़पदार्थोंमें होही नहीं सकती; तथापि जैसे रथकी क्रियासे रथवाहीका
अनुमान होताहै वैसेही चेष्टारूप कर्मसे आत्माका अनुमानभी होसकताहै.
अहङ्कारस्याश्रयोऽयं मनोमात्रस्य गोचरः ॥ ५० ॥