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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 350 में से

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पृष्ठ 117

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९३
स्य प्रत्यक्षत्वात्तद्वृत्तिजातिरपि प्रत्यक्षा । गन्धाश्रयग्रहणे तु घ्रा-
णस्य न सामर्थ्यमिति बोध्यम् ।
भाषा-मूलोक्त 'आदि'पदसे 'सुरभित्व' 'असुरभित्व' धर्मोंका ग्रहण है. गन्धके
प्रत्यक्ष होनेसे उसमें रहनेवाली 'गन्धत्व' जातिभी प्रत्यक्षसिद्ध है. गन्धका आश्रय जो
पृथिवीरूप द्रव्य है उसके ग्रहण करनेमें घ्राणका सामर्थ्य नहीं है-इति ।
तथा रसो रसज्ञायास्तथा शब्दोऽपि च श्रुतेः ॥५३॥
तथा रस इति । रसत्वादिसहित इत्यर्थः ।
भाषा-ऐसेही रसगुणका तथा रसत्वादि जातियोंका रसना इन्द्रियद्वारा ग्रहण
होता है. एवंही शब्दगुणका तथा शब्दत्वादि जातियोंका श्रोत्र इन्द्रियद्वारा ग्रहण
होता है.
गन्धो रसश्चोद्भूतो बोध्यः । तथाशब्दत्वादिसहितः ॥ ५३ ॥
भाषा-इस प्रकरणमें ( उद्भूत ) प्रत्यक्षके योग्य गन्ध तथा रसका ग्रहण है.
उद्भूतरूपं नयनस्य गोचरो
द्रव्याणि तद्वन्ति पृथक्त्वसंख्ये ।
विभागसंयोगपरावरत्वस्नेहद्रवत्वं परिमाणयुक्तम् ५४
क्रियां जातिं योग्यवृत्तिं समवायं च तादृशम् ।
गृह्णाति चक्षुः संबन्धादालोकोद्भूतरूपयोः ॥ ५५ ॥
भाषा-उद्भूतरूपका तथा उद्भूतरूपवाले द्रव्यका, एवं पृथक्त्व तथा संख्या
का विभागका तथा संयोगका, परत्वका तथा अपरत्वका, स्नेहका तथा द्रव्य-
त्वका, परिमाणका, प्रत्यक्षके योग्य द्रव्यकी क्रियाका, जातिका तथा समवायका ग्रहण
नेत्रइन्द्रियद्वारा होताहै. प्रकाशसम्बन्ध तथा उद्भूतरूप पूर्वोक्त प्रत्यक्षमें सहकारी
हैं ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
उद्भूतरूपमिति। ग्रीष्मोष्मादावनुद्भूतं रूपमिति न चाक्षुषं प्रत्य-
क्षम् । तद्वन्ति उद्भूतरूपवन्ति । योग्येति । पृथक्त्वादिकमपि
योग्यव्यक्तिवृत्तितया ग्राह्यम् । तादृशं योग्यव्यक्तिवृत्तीत्यर्थः ।