सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८५
भाषा-उस बुद्धिका नेत्रादि इंद्रियरूप प्रणालिका द्वारा ज्ञानरूप परिणाम घटादि
पदार्थोंके साथ सम्बंध है. पुरुषमें कर्तृत्व-'मैं कर्ता हूं' यह अभिमान, एवं बुद्धिमें
चैतन्य ' मैं चेतनाहूं ' यह अभिमान बुद्धिका तथा पुरुषका परस्पर भेद न जाननेसे
है. " ममेदं कर्तव्यम्-अर्थात् मेरेको यह कार्य करने योग्य है " इत्याकारका
बुद्धिमें "मम, इदं, कर्तव्यम्" ये तीन अंश हैं. उनमें प्रथम अंश ( पुरुष ) जीवा-
त्माका है; वहभी जैसे ( दर्पण ) शीशेके स्वच्छ होनेसे उसमें मुखकी प्रतीति
मिथ्याही होजाती है, वैसेही बुद्धिके स्वच्छ होनेसे पुरुष प्रतिबिंबद्वारा ( अतात्त्विक )
झूठा ( उपराग ) सम्बंध रूप है. एवं द्वितीय अंश विषयका है. वही बुद्धि ( इंद्रिय )
नेत्रादिद्वारा परिणामको प्राप्त हुई विषयको ग्रहण करती है; जैसे शीशेपर ( निः-
श्वासाभिहत ) फूत्कार मारनेसे ( मलिणिमा ) छाईका सम्बन्ध ( तात्त्विक ) सच्चा
हो जाता है; वैसेही बुद्धिका परिणाम रूपसे विषयके साथ सम्बन्ध वास्तव है. एवं
तृतीय व्यापार अंशका भान है. वह बुद्धिका अपना तथा तात्त्विक है.
तेनांशत्रयवती बुद्धिस्तत्परिणामेन ज्ञानेन पुरुषस्यातात्त्विकः स-
म्वन्धो दर्पणमलिनिमैव मुखस्योपलब्धिरुच्यते। ज्ञानवत् सुखदुः-
खेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा अपि बुद्धेरेव कृतिसामानाधिकरण्येन
प्रतीतेः ।
भाषा--इस रीतिसे बुद्धि तीन अंशवाली है और बुद्धिके परिणामरूप ज्ञानके साथभी
पुरुषका अतात्त्विक संबंध है. जैसे-शीशेकी छाईके साथ मुखका संबंध वस्तुतः नहीं
किन्तु मिथ्या है; वैसेही बुद्धि परिणाम ज्ञानके साथभी पुरुषका सम्बन्ध वास्तव
नहीं किन्तु अतात्त्विक है. उसी अतात्त्विक सम्बन्धकी सांख्यशास्त्रमें ( उपलब्धि )
संज्ञा कही है. जैसे-परिणामी ज्ञान बुद्धिका धर्म है, वैसेही सुख दुःख इच्छा द्वेष
प्रयत्न, धर्म और अधर्म ये सातभी बुद्धिकीके धर्म हैं; क्योंकि इन सबकी " अहं
कर्त्ता, अहंसुखी" इत्यादि प्रत्ययोंसे ( कृति ) प्रयत्नके साथ एकाधिकरणत
प्रतीत होती है.
न च बुद्धिश्चेतना, परिणामित्वात्, इति मतमपास्तम्। कृत्यदृष्ट-
भोगानामिव चैतन्यस्यापि सामानाधिकरण्यप्रतीतेस्तद्भिन्ने
मानाभावाच्च ।
भाषा -और प्रयत्न बुद्धिका मुख्य धर्म है. वह बुद्धि(परिणामिनी)अनित्य धर्मोंवाली
होनेसे चिद्रूपा नहीं है, यह सब सांख्याचार्यका मत है. पूर्वोक्त तथा अग्रे मयुक्ती