सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासंमेता. ९१
ब्दबोधे पदज्ञानस्य स्मरणेऽनुभवस्य च हेतुत्वान्न तत्र तत्राति-
व्याप्तिः ।
भाषा-अथवा जिस ज्ञानका ज्ञानान्तर करण नहीं वह ज्ञान प्रत्यक्ष है. इस
लक्षणका लक्ष ईश्वरज्ञानभी हो सकताहै; अनुमितिरूप ज्ञानके प्रति व्याप्तिज्ञानकी
करणता है; एवं उपमितिज्ञानके प्रति सादृश्यज्ञानको करणता है; एवं शाब्दबोधके
प्रति पदज्ञानको करणता है; ऐसेही स्मृतिरूप ज्ञानके प्रति अनुभवात्मक ज्ञानकी
करणता है; याते यह सभी ज्ञान ज्ञानान्तर करणक हैं, और प्रत्यक्ष ज्ञानका कोई
ज्ञानान्तर करण नहीं है; इसलिये पूर्वोक्त लक्षणजन्य प्रत्यक्षमें समन्वय होताहै
और अनुमिति आदि ज्ञानोंमें अतिव्याप्तिभी नहीं है.
परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः । यद्यपि परामर्शप्रत्यक्षादिकं परा-
मर्शजन्यं तथापि परामर्शजन्यं हेत्वविषयकं यज्ज्ञानं तदेवानुमि
तिः। न च कादाचित्कहेतुविषयकानुमितावव्याप्तिरिति वाच्यम् ।
तादृशज्ञानवृत्त्यनुभवत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् ।
अथवा व्याप्तिज्ञानकरणकं ज्ञानमनुमितिः ।
भाषा-व्याप्तिकरणक परामर्शद्वारा उत्पन्न हुए ज्ञानका नाम 'अनुमिति' है. य-
द्यपि परामर्शका प्रत्यक्ष तथा परामर्शका ध्वंसभी परामर्शजन्य है, क्योंकि अपने
प्रत्यक्षमें परामर्शको विषयविधया कारणता है तथा अपने ध्वंसमें परामर्शको
प्रतियोगिविधया कारणता है तथापि हेतुको न विषय करनेवाला जो परामर्श
जन्य "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक ज्ञान वह अनुमिति है. परामर्शात्मक
ज्ञानमें हेतुका भान होताहै इसलिये परामर्श ज्ञानके विषय करनेवाले ज्ञानमेंभी हेतु
का भान अवश्य होगा, याते उसको अनुमिति कहना योग्य नहीं. शंका-किसी २
स्थलमें हेतुकाभी भान पक्षतावच्छेदकरूपसे अनुमितिमें होता है; जैसे "धूमवान्पर्वतो
वह्निमान्" इस अनुमितिमें धूमरूप हेतुका पक्षतावच्छेदक रूपसे भान है; याते
हेतुकोभी विषय करनेवाली इस अनुमितिमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समा०-
(तादृश) व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानजन्य जो अनुमितिआत्मक ज्ञान उस ज्ञानमें
वर्तनेवाली जो अनुभवत्वकी व्याप्य 'अनुमितित्व' जाति तादृश जातिमत्ता अनु-
मितिको विवक्षित है याते पूर्वोक्त दोष नहीं अथवा लाघवसे व्याप्ति ज्ञानकरण हो
जिस ज्ञानका वह अनुमिति ज्ञान है ऐसा लक्षण करना उचित है.
एवं सादृश्यज्ञानकरणकं ज्ञानमुपमितिः ।