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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 350 में से

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पृष्ठ 121

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९७
न हो तो वायुगत द्वित्व परिमाणादिकोंका ग्रहण भी होताहै. जैसे 'द्वितीयोऽयं महान्
वायुः' इस प्रत्ययमें द्वित्व तथा परिमाण उभयका भानहै और कहीं सजातीय प्रत्ययरूप
दोषसे संख्यापरिमाण आदिकोंका ग्रहण नहींभी होता ॥ ५६ ॥
– त्वचो योगो मनसा ज्ञानकारणम् ।
भाषा-मनके साथ त्वगिन्द्रियका सम्बन्ध ज्ञान सामान्यमें कारण है.
त्वचो योग इति । त्वङ्मनःसंयोगो ज्ञानसामान्ये कारणमित्यर्थः ।
किं तत्र प्रमाणम्, सुषुप्तिकाले त्वचं त्यक्त्वा पुरीततिवर्तमाननेन
मनसा ज्ञानाजननमिति ।
भाषा-त्वचामनका संयोग जन्यज्ञानमात्रमें कारण है. शंका-इसमें क्या प्रमाण
है? समाधान-गाढनिद्राकालमें त्वचासम्बन्धको त्यागके पुरीततीनामा नाडीमें
मन प्रवेश करता है तो ज्ञान नहीं होता. यही प्रमाण है.
ननु सुषुप्तिकाले किं ज्ञानं भविष्यति, अनुभवरूपं स्मरणरूपं
वा । नाद्यः, अनुभवसामग्र्यभावात् । तथाहि। चाक्षुषादिप्रत्यक्षे
चक्षुरादिना सह मनःसंयोगस्य हेतुत्वात्, तदभावादेव न चाक्षु-
षादिप्रत्यक्षम्,ज्ञानादेरभावादेव न मानसप्रत्यक्षम्,ज्ञानाद्यभावे
चात्मनोऽपि न प्रत्यक्षम्, एवं व्याप्तिज्ञानाभावान्नानुमितिः, सादृ-
श्यज्ञानाभावान्नोपमितिः, पदज्ञानाभावान्न शाब्दबोध इत्यनुभ-
वसामग्र्याभावान्नानुभवः, उद्बोधकाभावाच्च न स्मरणम्। मैवम् ।
सुषुप्तिप्राक्कालोत्पन्नेच्छादिव्यक्तेस्तत्सम्बन्धेनात्मनश्च प्रत्यक्ष-
त्वप्रसङ्गात् । तदतीन्द्रियत्वे मानाभावात् ।
शंका-सुषुप्तिकालमें यदि त्वङ्मनःसंयोग मानभी लिया जाय तो उस कालमें
कैसा ज्ञान होसकताहै? अनुभवरूप, अथवा स्मरणरूप? यदि अनुभवरूप कहो तो
युक्त नहीं; क्योंकि उस कालमें अनुभवजनकसामग्रीका अभाव है. अनुभवजनक
सामग्री मनका नेत्रादि इन्द्रियोंके साथ संयोगरूपा है. चाक्षुषत्वाचादि प्रत्यक्षमें चक्षु-
र्मनःसंयोग तथा त्वङ्मनःसंयोग आदिकोंको हेतुता है. सुषुप्तिकालमें त्वङ्मनःसंयो-
गादिके अभावसे त्वचाचाक्षुषादि प्रत्यक्ष नहीं होता; सुषुप्तिकालमें आत्माके ज्ञानादि
गुणोंकाभी तिरोधान है. याते मानसप्रत्यक्षभी नहीं होसकता और आत्माकाभी मा-
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