न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ -न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
योंसे यहभी खण्डित है; क्योंकि जैसे "अहं कर्ता, अहं धार्मिकः, अहं भोक्ता" इत्या-
दि प्रत्यय एकाधिकरणमें प्रतीत होते हैं वैसेही 'अहं चेतनः' यह प्रत्ययभी उसी
अधिकरणमें प्रतीत होता है याते ( तद् ) कर्तासे भिन्न चेतन माननेमें कोई
प्रमाण नहीं है.
चेतनोऽहं करोमीति प्रतीतिश्चैतन्यांशे भ्रम इति चेत्। कृत्यंशेऽपि
किं नेष्यते । अन्यथा बुद्धेर्नित्यत्वे मोक्षाभावोऽनित्यत्वे तत्पूर्व-
मसंसारापत्तिः ।
सांख्यी-शंका-'चेतनोऽहं करोमि' यह प्रतीति चेतनअंशमें भ्रमरूपा है
क्योंकि चेतन 'पुरुष' है उसके सम्बन्धसे प्रतिबिम्ब ग्रहण करतीहुई बुद्धि अपनेमें
मिथ्याही चेतनताका अभिमानकरती है. नैयायिक-यदि पूर्वोक्ता प्रतीति चेतनां-
शमें भ्रमरूपा है तो प्रयत्न अंशमेंभी भ्रमरूपाही माननी उचितहै, क्योंकि उक्तप्रतीतिमें
दोनोंका अधिकरण एकही प्रतीत होता है; ( अन्यथा ) यदि कर्ता तथा चेतनका
परस्परभेद मानों तो हम पूँछतेहैं कि-वह बुद्धि आपकी नित्या है अथवा अनित्या है?
यदि नित्या कहो तो मोक्षका अभावहोगा क्योंकि बुद्धिरूपकर्तासे भिन्न चेतनमें सुखदुःख
का अभाव होनेसे उसमें बन्ध मोक्ष व्यवहार अनुपपन्न है. शेष रहा बुद्धिरूप कर्ता
तो इसीके सत्त्व तथा असत्त्वसे बन्ध तथा मोक्ष मानना होगा एवं यदि बुद्धिको
नित्य मानें तो उसके सत्त्व निबन्धन संसारभी नित्यही मानना होगा; एवं मोक्षाभाव
होगा. एवं यदि बुद्धिको अनित्य मानो तो वह उत्पत्तिवालीभी माननी होगी क्योंकि
अजन्य भावपदार्थका नाश नहीं होता. एवं बुद्धिकी उत्पत्तिसे प्रथमकालमें
संसार नहीं हुआ चाहिये अर्थात् बुद्धिकी उत्पत्तिसे पूर्व बुद्धिमें अदृष्ट नहीं रहसकते
अदृष्टोंके न होनेसे बुद्धिकी उत्पत्ति नहीं होसकती. एवं संसार कदापि न
होना चाहिये.
नन्वचेतनायाः प्रकृतेः कार्यत्वाद्वुद्धेरचैतन्यं, कार्यकारणयो-
स्तादात्म्यादिति चेत् । न, असिद्धेः । कर्तुर्जन्यत्वे मानाभावा-
द्वीतरागजन्मादर्शनादनादित्वम्। अनादेर्नाशासम्भवान्नित्यत्वम्।
तत् किं प्रकृत्यादिकल्पनेन ।
सांख्यी-हमारे मतमें कार्यकारणका परस्पर अभेद है; इसलिये अचेतनप्रकृतिका
कार्यरूप बुद्धिभी चेतन नहीं है. नैयायिक-तुम्हारा कथन असिद्धहै; क्योंकि
बुद्धि प्रकृतिका कार्य नहीं है और कर्ता नियमसे जन्य होता है, इसमें कोई