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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 350 में से

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पृष्ठ 113

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८९
भाषा-वह आत्मा अहंकारका आश्रय है, एवं मनोमात्र इन्द्रियसे आत्माका ग्र-
हण होता है ॥ ५० ॥
अहङ्कारस्येति । अहङ्कारोऽहमिति प्रत्ययस्तस्याश्रयो विषय
आत्मा, न शरीरादिरिति।मन इति। मनोभिन्नेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षा-
विषयो मानसप्रत्यक्षविषयश्चेत्यर्थः। रूपाद्यभावेनेन्द्रियान्तरा-
योग्यत्वात् ॥ ५० ॥
भाषा-अहंकार नाम ‘अहं’ इत्याकारक प्रत्ययका है. इस प्रत्ययका विषय
आत्माही है; शरीरादि नहीं बन सकते. एवं मनसे भिन्न सभी इन्द्रियोंका अविषय है,
केवल मानस प्रत्यक्षका विषय है; क्योंकि मनसे भिन्न सभी इन्द्रियरूप रसादिवाले
पदार्थको ग्रहण करतेहैं और आत्मामें रूपरसादि गुण नहीं हैं; याते नेत्रादि इन्द्रियों-
द्वारा प्रत्यक्षयोग्य आत्मा नहींहै ॥ ५० ॥
विभुर्बुद्ध्यादिगुणवान्-
भाषा-वह आत्मा व्यापक है तथा बुद्धिआदि गुणोंवाला है.
विभुरिति । विभुत्वं परममहत्परिमाणवत्त्वं, तच्च पूर्वमुक्तमपि
स्पष्टार्थमुक्तम् । बुद्ध्यादीति । बुद्धिसुखदुःखेच्छादयश्चतुर्दश
गुणाः पूर्वमुक्ता वेदितव्याः ।
भाषा--विभु नाम परममहत् परिमाणवालेका है. यह यद्यपि “कालखात्मदिशां
सर्वगतत्वं परमं महत् ( २६ का० ) ” इस ग्रन्थसे कह चुके हैं, तथापि स्पष्टार्थ
बोधनके लिये उसी अर्थको फिर कहाहै. बुद्ध्यादि पदसे “बुद्ध्यादिषट्कं ३२” इत्या-
दि कारिकोक्त आत्माके १४ गुण जान लेने.
अत्रैव प्रसङ्गाद्बुद्धेः कतिपयं प्रपञ्चं दर्शयति, बुद्धिस्त्विति-
भाषा-यहांही बुद्धिके प्रसंगसे ग्रंथकार बुद्धिके कईएक भेद दिखलाता है-

  • बुद्धिस्तु द्विविधा मता ।
    अनुभूतिः स्मृतिश्च स्यादनुभूतिश्चतुर्विधा ॥ ५१ ॥
    भाषा--एवं वह बुद्धि दो प्रकारकी है; एक अनुभवरूपा है और दूसरी स्मृतिरूपा
    है. एवं अनुभवरूपा बुद्धि पुनः चार प्रकारकी है ॥ ५१ ॥
    द्वैविध्यं व्युत्पादयति, अनुभूतिरिति । अनुभूतिश्चतुर्विधेति । ए-