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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 350 में से

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पृष्ठ 118

चक्षुर्योग्यत्वमेव कथं तदाह, गृह्णातीति—आलोकसंयोग उद्भूतरूपं
च चाक्षुषप्रत्यक्षंप्रति कारणम् ।
भाषा—ग्रीष्मऋतुमेंहोनेवाली(उष्मा)भाफमें रूप अनुद्बुद्ध होनेसे प्रत्यक्ष नहीं होता
पृथक्त्वसंख्यादिकभी प्रत्यक्षयोग्य पदार्थमें प्रत्यक्ष होते हैं. अन्यथा नहीं. समवायभी
प्रत्यक्षयोग्य पदार्थमें प्रत्यक्ष होताहै एवं प्रकाशका संयोग तथा उद्भूतरूप नेत्रजन्य
प्रत्यक्षके प्रति कारण है.
तत्र द्रव्यचाक्षुषंप्रति तयोः समवायसम्बन्धेन कारणत्वं द्रव्यसम-
वेतरूपादिप्रत्यक्षं प्रति स्वाश्रयसमवायसम्बन्धेन । द्रव्यसमवेत-
समवेतस्य रूपत्वादेः प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धे-
नेति ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
भाषा—उसमेंभी ( द्रव्य ) घटादिप्रत्यक्षके प्रति प्रकाशसंयोग तथा उद्भूतरूपको
समवायसम्बन्धसे कारणता है, क्योंकि घटका तथा प्रकाशका संयोग घट प्रकाश
उभयमें समवायसम्बन्धसे रहताहै और घटका रूपभी घटमें समवायसम्बन्धहीसे
रहताहै; याते दोनोंको विषयनिष्ठ समवायसम्बन्धसे विषयसाक्षात्कारमें कार-
णता है. एवं घटादि समवेत रूपादि प्रत्यक्षके प्रति प्रकाशसंयोग उद्भूत रूपको
स्व ) रूपादिका ( आश्रय ) अधिकरण जो घटादि द्रव्य तन्निष्ठ समवायसम्बन्धसे
कारणताहै. एवं घटादिद्रव्यमें समवेत जो रूपादि उन रूपादिकोंमें समवेत जो रूपत्वादि
उन रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षमें प्रकाशसंयोग उद्भूतरूपको (स्व) प्रकाशसंयोग उद्भूतरू-
पका ( आश्रय ) अधिकरण जो घटादिद्रव्य उस द्रव्यमें समवेत जो रूपादि उन
रूपादिकोंमें समवेत जो रूपत्वादि उन रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षमें एतादृश परंपरास-
म्बन्धसे कारणताहै—इति ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
उद्भूतस्पर्शवद्द्रव्यं गोचरः सोऽपि च त्वचः ।
भाषा—जिस द्रव्यका स्पर्श उद्भूत हो उसको त्वगिन्द्रिय ग्रहण करता है:
उद्भूतेति । उद्भूतस्पर्शवद्द्रव्यं त्वचो गोचरः । सोऽप्युद्भूतस्पर्शो
ऽपि स्पर्शत्वादिसहितः ।
भाषा—उद्भूत स्पर्शवाले द्रव्यको त्वगिन्द्रिय ग्रहण करता है. उद्भूतस्पर्शको तथा
उसमें रहनेवाली स्पर्शत्वादि जातिकोभी त्वगिन्द्रिय ग्रहण करताहै.
रूपान्यच्चक्षुषो योग्यं -