न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
तृतीयपरिच्छेदः १०३
नियतसाधनप्रतीतये¹ उपात्ताः । तदसमर्था दुष्टाः स्वकार्यकरणादिति साम-
र्थ्यम् । इयता साधनमुक्तम् ।
दूषणं वक्तुमाह—
दूषणा न्यूनतायुक्तिः ।
दूषणा का द्रष्टव्या । न्यूनतादीनामुक्तिरुच्यते । न येत्युक्तिर्वचनं
न्यूनतादिर्वचनम् ।
दूषणं विवरीतुमाह—
ये पूर्वं न्यूनतादयः साधनादोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं
दूषणम् ।
ये पूर्वं न्यूनतादयोऽसिद्धविरुद्धानैकान्तिका उक्तास्तेषामुद्भावनं यद्वचनं
तद्दूषणम् ।
ननु च न्यूनतादयो न विपर्ययसाधनास्तत्कथं दूषणमित्याह—
तेन परेषामर्थसिद्धिप्रतिबन्धात् ।
तेन न्यूनतादिवचनेन परेषामिष्टश्चासावर्थश्च तस्य सिद्धिर्निश्चयस्त-
स्याः प्रतिबन्धान्नावश्यं विपर्ययसाधनादेव दूषणं विरुद्धवदपि तु परस्या-
भिप्रेतनिश्चयनिबन्धान्निश्चयाभावो भवति ।
निश्चयविपर्यय इत्यस्ति² विपर्ययसिद्धिरिति ।
दूषणाभासास्तु जातयः ।
उक्ता दूषणाभासा इति । दूषण³वदाभासन्त इति दूषणाभासाः । के
ते जातयः । जातिशब्दः सादृश्यवचन उत्तरसदृशानि जात्युत्तराणीति⁴ ।
उत्तरस्थानप्रयुक्तत्वादुत्तरसदृशानि जात्युत्तराणि ।
तदेवोत्तरसादृश्यमुत्तरस्थानप्रयुक्तत्वेन दर्शयितुमाह—
अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति ।
१ प्रतीतये, ख० प्रतिपत्तये । २ अस्ति, ख० अस्त्येव । ३ दूषणवत्, ख० दूषणा-
वत् । ४ 'इति' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते ।
१०४ न्यायबिन्दुः
अभूतस्यासत्यस्य दोषस्योद्भावनानि । उद्भाव्यत एतैरित्युद्भावनानि
वचनानि तानि जात्युत्तराणि । जात्या सादृश्येनोत्तराणि जात्युत्तराणीति ।
इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
कतिपयपदवस्तुव्याख्यया यन्मयाप्तं कुशलममलमिन्दोरंशुवन्न्यायबिन्दोः ।
पदमजरमवाप्य ज्ञानधर्मोत्तरं यज्जगदुपकृतिमात्रव्यापृतिः स्यामतोऽहम्¹ ॥
न्यायबिन्दुः समाप्तः ।
समाप्तेयं² न्यायबिन्दुटीका कृतिराचार्यधर्मोत्तरस्य ॥०॥
सहस्रमेकं श्लोकानां तथा शतचतुष्टयम् ।
सप्तसप्ततिसंयुक्तं निपुणं परिपिण्डितम्³ ॥
१ अथ श्रीधर्मोत्तराचार्यः स्वाभिप्रायप्रकाशपुरःसरं कृतिमुपसंहरन्नाह—कतिपयेति ।
यत् । मया धर्मोत्तराचार्येण । इन्दोश्चन्द्रस्य । अंशुवत् किरणवत् । न्यायबिन्दोः
न्यायबिन्दुः नाम अस्य ग्रन्थस्य । कतिपयान्यमूनि पदानि तान्येव वस्तूनि
तेषां व्याख्या तया न्यायबिन्दुटीकया इत्यर्थः । कुशलं निर्विघ्नं । अमलं निर्मलं । अजरं
अनश्यम् । पदम् । अवाप्य प्राप्य । यत् । ज्ञानं च धर्मं च ज्ञानधर्मे ताभ्याम्, उत्तरं श्रेष्ठं
ज्ञानधर्मोत्तरम् । अथवा अनेन पदेन आचार्येण स्वनाम 'धर्मोत्तराचार्यः' प्रदर्शितम्,
आचार्यस्य ज्ञानकारणत्वात् । आप्तं प्राप्तम् । अतोऽस्मात् न्यायबिन्दुटीकारूपकार्यात् ।
जगतः उपकृतिरुपकारस्तन्मात्रमेव व्यापृतिः व्यापारो यस्य स । अहं धर्मोत्तराचार्यः ।
स्याम् । २ 'समाप्तेयं' आदि; ख० आचार्यधर्मोत्तरपादविरचितायां न्यायबिन्दुटीकायां
तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः । ३ ग्रन्थस्यास्य परिमाणं १४७७ श्लोकप्रमितिमात्रमस्ति ।
श्लोकेऽत्र द्वात्रिंशदक्षराणि ज्ञेयानि ।
निवेदन ।
बौद्धदर्शनके प्रेमियोंके संमुख मैं न्यायबिन्दुका यह हिन्दी अनुवाद
लेकर उपस्थित हो रहा हूँ। अनुवाद कैसा है यह पाठक ही बतला सकेंगे।
क्योंकि मुझे इस विषयमें कहने का कुछ अधिकार नहीं है। यह अवश्य है
कि इस अनुवादके करनेमें बौद्धोंके पारिभाषिक शब्दोंकी व्याख्या करना
तो दूर उनके समझनेमें भी मुझे महीनों उलझना पड़ा है। आशा है कि
पाठकोंको उनमें अब विशेष न उलझना पड़ेगा।
ग्रन्थकी भाषाके लिये मुझे सबसे प्रथम क्षमा प्रार्थना करनी है।
क्योंकि न्यायका कोई भी ग्रन्थ हिन्दीमें न होनेसे मुझे इसके लिये स्वयं ही
ढंग सोचना पड़ा है। भाषासम्बन्धी त्रुटियाँ निकालने वालोंसे मुझे यह
प्रार्थना है कि उनको जिस वाक्यमें भाषासम्बन्धी त्रुटि जान पड़े उसको
प्रथम स्वयं ठीक करके ही दूसरोंको दिखलावें। ऐसा करनेसे उन्हें इस
सम्बन्धमें मेरी कठिनताका बहुत कुछ आभास हो जावेगा। उचित तो यह
होता कि कुछ संस्कृत न्याय तथा कुछ हिन्दी साहित्यके विद्वानोंकी एक
समिति न्यायकी भाषा को निश्चित करती, किन्तु यह न होता देखकर मैंने
स्वयं ही इस विषय पर लेखनी उठायी है। आशा है कि इसके लिये हिन्दी
भाषाके विद्वान् मुझे क्षमा करेंगे।
यदि मूल संस्कृत ग्रन्थका शाब्दिक अनुवाद ही किया जाता तो वह
किसी कामका भी न होता। अतएव वाक्य पूरा करनेके लिये मुझको दूसरे
शब्द डालने पड़े हैं जो [ ] ऐसे कोष्ठकमें रखे गये हैं। भावको स्पष्ट
करने वाले शब्द सादे कोष्ठकमें रखे गये हैं।
आशा है कि इस ग्रन्थसे हिन्दी साहित्यके दर्शन विभागको कुछ उत्ते-
जना मिलेगी।
भदैनी, बनारस
दि० २८ जून १६२४ ई० } चन्द्रशेखर शास्त्री ।
१४ न्या०
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बौद्ध न्यायबिन्दु
का
हिन्दी अनुवाद
अनुवादक—
काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री ।
प्रथम परिच्छेदः ।
सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिरिति तद् व्युत्पाद्यते ।
सभी पुरुषार्थोंकी सिद्धि सम्यग्ज्ञानपूर्वक होती है, अतएव [ इस ग्रन्थमें ] उसी
का वर्णन किया जाता है ।
द्विविधं सम्यग्ज्ञानम्—
सम्यग्ज्ञान दो प्रकारका होता है—
प्रत्यक्षमनुमानञ्च ।
प्रत्यक्ष और अनुमान ।
तत्र कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् ।
उनमेंसे कल्पनारहित निर्भ्रान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं ।
अभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासप्रतीतिः कल्पना तया रहितम् ।
अभिलाप ( वाचकशब्द ) से संसर्ग ( एक ज्ञानमें अभिधेयाकारका अभिधाना-
कारके साथ ग्रहण करने योग्य हो जाना । जो कहा जावे उसे अभिधेय तथा कहने या
नाम को अभिधान कहते हैं ) के योग्य प्रतिभासकी प्रतीतिको कल्पना कहते हैं ।
( 'वृक्ष' इस शब्दके कहते ही हृदयमें इस शब्दके संसर्ग से इस शब्दके योग्य स्कन्ध
और शाखादिमान् पदार्थका प्रतिभास होने लगता है । उस पदार्थकी प्रतीतिको कल्पना
कहते हैं । ) प्रत्यक्षज्ञान उस कल्पनासे रहित होना चाहिये ।
तिमिराशुभ्रमणनौयानसंक्षोभाद्यनाहितविभ्रमं ज्ञानं प्रत्यक्षम् ।
जिस ज्ञानमें अन्धकार, [ अलात आदिका ] शीघ्र २ घूमना, नौकापर जाना और
[ वात पित्त और श्लेष्मके ] संक्षोभ आदिसे विभ्रम नहीं हुआ हो ऐसा [ कल्पना
रहित और निर्भ्रान्त ] ज्ञान ही प्रत्यक्ष होता है ।
२ भाषाटीका सहित
तच्चतुर्विधम् ।
प्रत्यक्षज्ञान चार प्रकारका होता है—
१ इन्द्रियज्ञान, २ मनोविज्ञान, ३ आत्मसंवेदन ( स्वसंवेदन ) और ४ योगिप्रत्यक्ष
( योगिज्ञान ) ।
इन्द्रियज्ञानम्¹ ।
इन्द्रियोंके ज्ञानको इन्द्रियज्ञान कहते हैं।
स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तर-
प्रत्ययेन जनितं तत्' मनोविज्ञानम् ।
अपने विषयके पश्चात्, विषयके सहकारी, समनन्तरप्रत्ययरूप इन्द्रियज्ञानसे
उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको मनोविज्ञान कहते हैं।
( बौद्ध दर्शनमें ज्ञानके ४ प्रत्यय ( कारण ) माने हैं । नेत्रसे घटको देखनेमें
• पहला कारण स्वयं घट है । अतएव विषय होनेसे इसको आलम्बन प्रत्यय कहते हैं ।
दूसरा कारण आलोक है । क्योंकि उसकी सहायताके बिना इन्द्रियाँ किसी विषयको
ग्रहण नहीं कर सकतीं । अतएव उसको सहकारी प्रत्यय कहते हैं । तीसरा कारण
इन्द्रियाँ हैं उनको अधिपतिप्रत्यय कहते हैं । और चौथा कारण ग्रहण करने अथवा
विचार करनेकी वह शक्ति है जिसका उपयोग न होने से हम प्रायः देखते हुए भी नहीं
देख सकते, शब्द होते हुए भी नहीं सुन सकते । बौद्धेतर दर्शनोंकी अपेक्षा इसको मन
कहना उपयुक्त होगा । इसको समनन्तरप्रत्यय कहते हैं । )
सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम् ।
सभी चित्त ( अर्थमात्रको ग्रहण करने वाले ) और चैत्तों ( विशेष अवस्थाको
ग्रहण करने वाले सुख आदि ) का आत्माको प्रकट करना आत्मसंवेदन है ।
( वाह्यार्थास्तित्ववादी बौद्धोंके मतमें प्रत्येक वस्तुके दो भेद हैं—वाह्य और
आन्तर । बाह्यके फिर दो भेद हैं-भूत और भौतिक । आन्तरके भी दो भेद हैं-चित्त
और चैत्त । चैत्तको चैत्तिक भी कहते हैं । भूत पृथ्वी आदि चार परमाणु हैं । भौतिक
रूप आदि और चक्षु आदि हैं । चित्त विज्ञान है । चैत्तिक रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा
और संस्कार संज्ञा वाले पाँच स्कन्ध हैं । विज्ञानके फिर दो भेद हैं-आलयविज्ञान जो
'अहं' या 'मैं' इस आकारका है । प्रवृत्तिविज्ञान इन्द्रिय आदिसे उत्पन्न होता है और
रूप आदिको विषय करता है । )
१. पीटर्सन साहब की पुस्तक में विरामचिह्न 'इन्द्रियज्ञानम्' के पश्चात् न देकर अगले
वाक्य में 'तत्' के पश्चात् दिया गया है । जिससे 'स्वविषय' आदिके इन्द्रियज्ञान का लक्षण होने
का भ्रम होता है ।
२. पहिली पुस्तक का पाठ 'सर्व चित्त-' आदि है । किन्तु वह अशुद्ध है ।
न्यायबिन्दु ३
भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति ।
सद्भूत अर्थके प्रकर्ष तक होने वाले ज्ञानको योगिज्ञान कहते हैं । ( योगिप्रत्यक्ष
सद्भूत अर्थका ही हो सकता है । असद्भूतका नहीं हो सकता, और वह भी थोड़ा बहुत
नहीं होता किन्तु प्रकर्ष अर्थात् चरम सीमा तक होता है ।)
तस्य विषयः स्वलक्षणम् ।
प्रत्यक्षका विषय स्वलक्षण है । [ जो कि क्षण है ।]
यस्यार्थस्य संनिधानासंनिधानाभ्यां ज्ञानप्रतिभासभेदस्तत्स्व-
लक्षणम्, तदेव परमार्थसत्, अर्थक्रियास-
मर्थ्यलक्षणत्वाद्वस्तुनः ।
जिस विषयकी समीपता और असमीपतासे ज्ञानके प्रतिभासमें भेद हो वह स्वलक्षण
है । और वही परमार्थ सत् है । क्योंकि वही वस्तुमें अर्थक्रिया कराता है ।
अन्यत्सामान्यलक्षणम्, सोऽनुमानस्य विषयः ।
स्वलक्षणसे भिन्न सामान्यलक्षण होता है । वह अनुमानका विषय होता है ।
तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ।
वह प्रत्यक्ष ज्ञान ही अर्थ प्रतीतिरूप होनेसे प्रमाणका फल है ।
अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं, तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेरिति ।
इस ज्ञानका अर्थके समान बन जाना प्रमाण है । क्योंकि उसीसे अर्थकी प्रतीतिकी
सिद्धि होती है ।
इति प्रथम परिच्छेद ।
द्वितीय परिच्छेद ।
अनुमानं द्विधा—
अनुमान दो प्रकारका होता है—
स्वार्थं परार्थं च ।
स्वार्थ और परार्थ ।
तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् ।
त्रिरूपलिङ्ग से होने वाले अनुमेयके ज्ञानको स्वार्थानुमान कहते हैं ।
प्रमाणफलव्यवस्थाऽत्रापि प्रत्यक्षवत् ।
प्रमाणके फलकी व्यवस्था यहां भी प्रत्यक्षके ही समान है ।
त्रैरूप्यम् पुनः—
लिङ्गस्यानुमेये सत्त्वमेव,
सपक्ष एव सत्त्वम्,
असपक्षे चासत्त्वमेव निश्चितम् ।
त्रैरूप्य ( त्रिरूपलिङ्ग ) यह है—
(१) अनुमेयमें लिङ्गकी विद्यमानता—
(लिङ्ग शब्दका अर्थ चिह्न है । जैसे—दूरसे देखनेवालेके लिये अग्निका चिह्न या
लिङ्ग धूम है । धूम ही हेतु है । इसको धर्म भी कहते हैं ।)
(२) लिङ्गका सपक्षमें अवश्य रहना । और
(३) लिङ्गका विपक्षमें किसी अवस्थामें भी न रहना ।
अनुमेयोऽत्र जिज्ञासितविशेषो धर्मी ।
जिस धर्मीको अनुमानके द्वारा जाननेकी इच्छा की जाती हैउसे अनुमेय कहते हैं ।
(जिस गुण या लक्षणको दिखला कर वस्तु (अनुमेय) सिद्ध की जाती है उसे
धर्म कहते हैं । जिस वस्तु (अनुमेय) में वह धर्म रहे उसे धर्मी कहते हैं । जिसे
सिद्ध किया जावे उसे साध्य कहते हैं ।)
साध्यधर्मसामान्येन समानोऽर्थः सपक्षः ।
जो पदार्थ साध्यधर्मके समान हो उसे सपक्ष कहते हैं ।
(बौद्धग्रन्थों में ‘धर्म’ शब्द के चार अर्थों में चार प्रयोग मिलते हैं—
(१) Scriptural Texts या मूल धार्मिक पुस्तकें ।
(२) Quality या गुण ।
(३) Cause या हेतु । और
न्यायबिन्दु ५
( ४ ) Unsubstantial and Soulles या निःसत्त्व और निर्जीव । इस
को पाली में 'निसत्त निज्जीव' कहते हैं । हमारी सम्मति में न्यायबिन्दु के समासों में
'धर्म' शब्द का तीसरे अर्थ में प्रयोग किया गया है । )
न सपक्षोऽसपक्षः ।
जो सपक्ष नहीं होता उसे विपक्ष या असपक्ष कहते हैं ।
ततोऽन्यस्तद्विरुद्धस्तदभावश्चेति ।
जो वस्तु सपक्षसे भिन्न हो या सपक्षके विरुद्ध हो अथवा जिसमें सपक्षका अभाव
हो वह असपक्ष होती है ।
त्रिरूपाणि च ॥
[ ऊपर कहे हुए ] त्रिरूप हैं ।
त्रीण्येव च लिङ्गानि—
अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति ।
लिङ्ग भी तीन ही होते हैं—
अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्य ।
तत्रानुपलब्धिर्यथा—न प्रदेशविशेषे क्वचिद् घट
उपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति ।
उनमें से अनुपलब्धि इस प्रकार है—
जैसे-कसी विशेष स्थान में घट नहीं है । क्योंकि घटके उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने
परभी उसकी वहां अनुपलब्धि है ।
( घट स्वभावसे ही विद्यमान है । अर्थात् घटके अस्तित्वमें स्वभाव के अतिरिक्त
अन्य कारण नहीं है । अतएव घट उपलब्धि ( मिलना ) लक्षण वाला है । घटमें
उपलब्धिलक्षण है अतएव वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त है । घटका उपलब्धिलक्षणप्राप्तपना
उसकी उपलब्धिलक्षणप्राप्ति है । अनुपलब्धि न मिलनेको कहते हैं । )
उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरुपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्यं
स्वभावविशेषश्च ।
उपलब्धिलक्षणप्राप्ति उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य और स्वभावविशेष [ यह तीनों
एकही हैं । ] ( पीछे उपलब्धिके चार प्रत्यय बतला दिये हैं । यहाँ प्रत्ययान्तर शब्द
आलम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त अन्य प्रत्ययोंका वाचक है । साकल्य सम्पूर्णताको कहते
हैं । उपलम्भके प्रत्ययान्तरोंकी एकत्रित सम्पूर्णताको उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य
कहते हैं । )
६ भाषाटीका सहित
यः स्वभावः सत्स्वन्येषूपलम्भप्रत्ययेषु यत्प्रत्यक्ष
एव भवति स स्वभावः ।
[ आलम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त ] शेष उपलम्भप्रत्ययोंके रहते हुए जो स्वभावसे
प्रत्यक्ष होता है वह स्वभाव है । ( यह स्वभाव विशेषकी परिभाषा है । )
स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्मे हेतुः ।
यथा-वृक्षोऽयं शिंशपात्वादिति ।
[ जो पदार्थ अपने हेतुके अस्तित्वकी अपेक्षाकरके विद्यमान होता है और हेतु-
सत्तासे भिन्न अन्य किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं करता वह स्वसत्तामात्रभावी साध्य है । ]
उस स्वसत्तामात्रभावी साध्यधर्ममें जो हेतु है वह स्वभाव हेतु है ।
जैसे-यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है ।
कार्यं यथाग्निरत्र धूमादिति ।
कार्यका उदाहरण—
जैसे-यहाँपर अग्नि है, क्योंकि यहाँ धूम है ।
अत्र द्वौ वस्तुसाधनौ१, एकः प्रतिषेधहेतुः ।
इन तीन हेतुओंमें ( अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्यमें ) से दो हेतु ( स्वभाव
और कार्य ) वस्तुकी विधिको बतलाते हैं । और एक ( अनुपलब्धि ) प्रतिषेधको
बतलाता है ।
स्वभावप्रतिबन्धे हि सत्यर्थोऽर्थं गमयेत् ।
स्वभावप्रतिबन्ध ( स्वभावसे एक स्थानमें नियत होना ) होने पर ही साधन अर्थ
साध्य अर्थको बतलाता है । [ इस कारणसे यह तीन ही साध्यको सिद्ध कर सकते
हैं अन्य नहीं ]
तदप्रतिबद्धस्य तदव्यभिचारनियमाभावात् ।
क्योंकि जो जहाँ पर स्वभावसे प्रतिबद्ध नहीं होता उसका अप्रतिबद्धविषयमें
अव्यभिचार के नियमका अभाव होता है । [ अतएव स्वभावसे अप्रतिबद्धोंमें अव्यभि-
चारनियम अथवा अविनाभावनियम नहीं बन सकता । गम्यगमकभाव अव्यभिचार-
नियम से ही होता है । लिङ्ग योग्यतासे दीपकके समान परोक्ष अर्थको प्रकाशित
करनेका निमित्त भी नहीं माना जा सकता । विरुद्ध इसके वह अव्यभिचारीपने से
ही निश्चय किया जाता है । अतएव स्वभावप्रतिबन्ध होने पर ही अविनाभाव का निश्चय
होता है । और गम्यगमकभाव अविनाभावसे ही होता है । अतएव स्वभावप्रतिबन्ध
होने पर ही अर्थ अर्थको बतलाता है अन्य प्रकार से नहीं बतलाता । ]
१. पूर्व छपी पुस्तक में विराम चिह्न '-साधनौ' के पश्चात् है । 'प्रतिषेधहेतुः' के पश्चात्
कोई चिह्न न देकर उसे अगले वाक्य में मिला दिया है, जिससे अर्थ बिलकुल गड़बड़ा जाता है ।
न्यायबिन्दु ७
स च प्रतिबन्धः साध्येऽर्थे लिङ्गस्य वस्तुतस्ता¹-
दात्म्यात्साध्यार्थादुत्पत्तेश्च ।
स्वभावप्रतिबन्ध साध्य अर्थमें लिङ्गका होता है । ( पराधीन होने से लिङ्ग प्रति-
बद्ध होता है । साध्य अर्थ पराधीन न होनेसे प्रतिबन्धका विषय अथवा प्रतिबन्धविषय
होता है किन्तु प्रतिबद्ध नहीं होता ) । क्योंकि वास्तव में साध्य और लिङ्गका तादात्म्य
है और साध्य अर्थसे लिङ्गकी उत्पत्ति होती है । ( अर्थात् तादात्म्य और तदुत्पत्तिसे
ही स्वभावप्रतिबन्ध होता है )
अतत्स्वभावस्यातदुत्पत्तेश्च तत्राप्रतिबद्धस्वभावत्वात् ।
क्योंकि जिसका वह स्वभाव न हो तथा जिसकी उससे उत्पत्ति न हो उसमें
प्रतिबद्धस्वभावता नहीं होती है ।
ते च तादात्म्यतदुत्पत्ती स्वभावकार्ययोरेवेति²
ताभ्यामेव वस्तुसिद्धिः ।
तादात्म्य और तदुत्पत्ति स्वभाव और कार्य में ही होती हैं । अतएव कार्य और
स्वभावसे ही वस्तुकी ( अथवा विधिकी ) सिद्धि होती है ।
प्रतिषेधसिद्धिरपि यथोक्ताया एवानुपलब्धेः ।
सति वस्तुनि तस्या असंभवत् ।
प्रतिषेध व्यवहार की सिद्धि भी पूर्वोक्त दृश्यानुपलब्धि से ही होती है ।
[ क्योंकि प्रतिषेध्य ] वस्तुके विद्यमान होनेपर दृश्यानुपलब्धि नहीं हो सकती ।
अन्यथा चानुपलब्धिलक्षणप्राप्तेषु देशकालस्वभावविप्र-
कृष्टेष्वात्मप्रत्यक्षनिवृत्तेरभावनिश्चयाभावात् ।
अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त ( जिसकी उपलब्धिको कोई कारणविशेष उपस्थित नहीं
है ) देशकालस्वभावविप्रकृष्ट पदार्थोंका आत्मप्रत्यक्ष न हो सकनेसे उनका अभाव
नहीं कह सकते । ( देशविप्रकृष्ट-जैसे भारतसे अमेरिका । कालविप्रकृष्ट-जैसे-भूत-
कालमें रामचन्द्र । स्वभावविप्रकृष्ट-जैसे-मदारीका अपने मुखमें से अग्नि निकालना )
[ अदृश्यानुपलब्धि वस्तुके विद्यमान होते हुए भी ही हो सकती है । जिसप्रकार
अन्धेको सब वस्तुएँ अदृश्य होनेसे अनुपलब्ध हैं । अतएव प्रतिषेध सिद्धि अदृश्यानु-
पलब्धिसे न होकर दृश्यानुपलब्धिसे ही होती है । ]
अमूढस्मृतिसंस्कारस्यातीतस्य वर्तमानस्य च प्रतिपत्तृ-
प्रत्यक्षस्य निवृत्तिरभावव्यवहारसाधनी ।
तस्या एवाभावनिश्चयात् ।
१. पूर्वपुस्तक में 'वस्तुतः' यह पाठ है । किन्तु हमारी सम्मति में वह अशुद्ध है ।
२. पूर्वपुस्तक में 'इति' के पश्चात् विराम दे दिया है ।
१५ न्या०
८ | भाषाटीका सहित
यह दृश्यानुपलब्धि जानने वालेके पूर्व अनुभूतप्रत्यक्ष (जिस प्रत्यक्ष ज्ञानका उसके
द्वारा पहिले अनुभव किया जा चुका है) और वर्तमानकालके प्रत्यक्षकी निवृत्तिके
अभावके व्यवहारको बतलाने वाली है।
क्योंकि अतीत और वर्तमानकालीन अनुपलब्धि ही अभावको निश्चय करती है।
सा च प्रयोगभेदादेकादशप्रकारा ।
अनुपलब्धि प्रयोगके भेदसे ग्यारह प्रकारकी होती है—
स्वभावानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमः उपलब्धि-
लक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति ।
स्वभावानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां धूम नहीं है, क्योंकि वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने पर भी अनु-
पलब्ध है ॥ १ ॥
कार्यानुपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि धूम-
कारणानि सन्ति धूमाभावात् ।
कार्यानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके कार्यकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां अप्रतिबद्धसामर्थ्यवाले (जिस धूमकी गतिकी सामर्थ्य रुकी न हो)
धूमके कारण नहीं हैं, क्योंकि यहां धूमका अभाव है ॥ २ ॥
व्यापकानुपलब्धिर्यथा । नात्र शिंशपा वृक्षाभावादिति ।
व्यापकानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके व्याप्यके व्यापक धर्मकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां शिंशपा (शीशमका वृक्ष) नहीं है, क्योंकि इस स्थानमें वृक्षका
अभाव है ॥ ३ ॥
स्वभावविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शोऽग्नेरिति ।
स्वभावविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावसे विरुद्धकी उपलब्धि)—
जैसे—यहाँ शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि यहाँ अग्नि है ॥ ४ ॥
विरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शो धूमादिति ।
विरुद्धकार्योपलब्धि (प्रतिषेध्यसे विरुद्ध कार्य की उपलब्धि)—
जैसे—यहाँ शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि यहां धुआं है ॥ ५ ॥
विरुद्धव्याप्तोपलब्धिर्यथा । न ध्रुवभावी भूतस्यापि
भावस्य विनाशो हेत्वन्तरापेक्षणादिति ।
विरुद्धव्याप्तोपलब्धि (प्रतिषेध्यके विरुद्धसे व्याप्त धर्मान्तर कीउ पलब्धि)—
जैसे—उत्पन्न हुई वस्तुका भी नाश अवश्यंभावी नहीं है (अनुत्पन्नका तो कैसे
कह सकते हैं), क्योंकि वह हेत्वन्तर की अपेक्षा रखती है ॥ ६ ॥
कार्यविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि
शीतकारणानि सन्त्यग्नेरिति ।
न्यायबिन्दु ०६
कार्याविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कार्यके विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—यहां पर अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाले शीतके कारण नहीं हैं; क्योंकि यहां
अग्नि है ॥ ७ ॥
व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र तुषारस्पर्शोऽग्नेरिति ।
व्यापकविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके व्यापकसे विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—यहां तुषारका स्पर्श नहीं है; क्योंकि यहां अग्नि है ॥ ८ ॥
कारणानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमोऽग्न्यभावादिति ।
कारणानुपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कारणकी अनुपलब्धि )—
जैसे—यहां पर धूम नहीं है; क्योंकि यहाँ अग्निका अभाव है ॥ ९ ॥
कारणविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नास्य रोमहर्षादिविशेषाः
संनिहितदहनविशेषत्वादिति ।
कारणविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कारणके विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—इस पुरुषको रोमहर्ष आदि नहीं हो रहे हैं; क्योंकि उसके पास अग्नि-
विशेष है ॥ १० ॥
कारणविरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । न रोमहर्षादिविशेष-
युक्तपुरुषवानयं प्रदेशो धूमादिति ।
कारणविरुद्धकार्योपलब्धि ( प्रतिषेध्यकारणके विरुद्धके कार्यकी उपलब्धि )—
जैसे—इस प्रदेशमें रोमहर्ष आदिसे युक्त पुरुष नहीं है; क्योंकि यहां धूम है ॥११॥
इमे सर्वे कार्यानुपलब्ध्यादयो दशानुपलब्धिप्रयोगाः
स्वभावानुपलब्धौ संग्रहमुपयान्ति ।
ये सब कार्यानुपलब्धि आदि दश अनुपलब्धिके प्रयोग स्वभावानुपलब्धिमें ही
आ जाते हैं ।
पारम्पर्येणार्थान्तरविधिप्रतिषेधाभ्यां प्रयोगभेदेऽपि प्रयोगदर्शना-
भ्यासात्स्वयमप्येवं व्यवच्छेदप्रतीतिर्भवतीति
स्वार्थेऽप्यनुमानेऽस्याः प्रयोगनिर्देशः ।
[ कार्यानुपलब्धि आदिमें यद्यपि ] अर्थान्तरसे विधि और प्रतिषेधसे प्रयोगभेद
है तथापि परम्परासे [ स्वभावानुपलब्धिमें अन्तर्भूत हो जाते हैं । हम लोगोंको इन ]
प्रयोगोंको देखनेके अभ्याससे स्वयं ही व्यवच्छेद ( प्रतिषेध ) की प्रतीति होती है ।
इसी लिये इनका प्रयोग स्वार्थानुमानमें भी किया गया है ।
सर्वत्र चास्यामभावव्यवहारसाधन्यामनुपलब्धौ येषां स्वभाव-
विरुद्धादीनामुपलब्ध्या कारणादीनामनुपलब्ध्या च प्रतिषेध उक्त-
१० भाषाटीका सहित
स्तेषामुपलब्धिलक्षणप्राप्तानामेवोपलब्धिरनुपलब्धिश्च वेदितव्या ।
अन्येषां विरोधकार्यकारणभावासिद्धिः ।
इस अभाव और अभावको साधन करने वाली अनुपलब्धिमें जिन स्वभावविरुद्ध
आदिकोंकी उपलब्धि और कारणादिकोंकी अनुपलब्धिसे प्रतिषेध कहा गया है उन्हीं
उपलब्धिलक्षणप्राप्तोंकी उपलब्धि और अनुपलब्धि जाननी चाहिये । क्योंकि दूसरोंके
विरोध और कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
विप्रकृष्टविषयानुपलब्धिः प्रत्यक्षानुमाननिवृत्ति-
लक्षणा संशयहेतुः प्रमाणनिवृत्तावप्यर्थाभावासिद्धेरिति ।
संशयके कारण विप्रकृष्टविषयानुपलब्धि ( अदृश्यानुपलब्धि ) प्रत्यक्ष अनुमानकी
निवृत्ति ( उसमें प्रत्यक्ष और अनुमान दोनोंकी गति नहीं है ) लक्षण वाली है ।
( ज्ञानज्ञेयस्वभाव वाली है ) । क्योंकि प्रमाणकी निवृत्ति होनेपर भी अर्थका अभाव
असिद्ध ही है ।
इति द्वितीय परिच्छेद ।
५१
तृतीय परिच्छेद
त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम् ।
त्रिरूपलिङ्गका कहना परार्थानुमान है ।
कारणे कार्योपचारात् ।
क्योंकि यहाँ कारणमें कार्यका उपचार किया जाता है ।
( त्रिरूपलिङ्ग के कहने से त्रिरूपलिङ्गकी स्मृति उत्पन्न होती है । स्मृति से अनु-
मान होता है । अतएव त्रिरूपलिङ्ग का कहना अनुमान का परम्परासे कारण है । उस
कारणवचनमें कार्यानुमान का उपचार ( समारोप ) किया जाता है ।
सहकारी आदि होनेके कारणसे अतद्भाव ( जो उस स्वरूप न हो ) में तद्वत्
( उसी स्वरूप के समान ) के कहनेको उपचार कहते हैं । )
तद् द्विविधं प्रयोगभेदात् ।
परार्थानुमान के प्रयोग के भेद से दो भेद होते हैं—
साधर्म्यवद्वैधर्म्यवच्चेति ।
साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् ।
नानयोरर्थतः कश्चिद् भेदोऽन्यत्र प्रयोगभेदात् ।
इन दोनोंमें भेद केवल प्रयोगसे ही है अर्थ से कुछ भी नहीं है ।
तत्र साधर्म्यवदनुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नोपलभ्यते
सोऽसद्व्यवहारविषयः सिद्धः ।
उसमें से साधर्म्यवत्—
जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह असद्व्यवहारका
विषय होता है ( अर्थात् उसका अभाव होता है ) । यह सिद्ध है ।
यथान्यः कश्चिद् दृष्टः शशविषाणादिः¹।
जैसे खरहे के सींग आदि कोई अन्य (साध्यधर्मी से) दृष्ट (प्रमाण से निश्चित) है ।
नोपलभ्यते च क्वचित्प्रदेशविशेष उपलब्धि-
लक्षणाप्राप्तो घट इति ।
[ दृश्यानुपलम्भके पक्षधर्मत्वको दिखलाते हुए कहते हैं— ]
किसी प्रदेशविशेष में उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट उपलब्ध नहीं होता ।
तथा स्वभावहेतोः प्रयोगः—
यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति ।
१. पीटर्सन संस्करण में 'शशविषाणादि' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसे अगले वाक्य
में मिलाकर '–विषाणादिर्नोप०–' कर दिया है ।
१२ भाषाटीका सहित
तथा स्वभावहेतुका प्रयोग—
जो सत् होता है वह सब अनित्य होता है । जैसे-घट आदि ।
शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः—
यदुत्पत्तिमत्तदनित्यमिति ।
शुद्ध स्वभावहेतु का प्रयोग—
जो उत्पत्तिमान् होता है वह अनित्य होता है । ( यह अव्यतिरिक्तविशेषणवाला
प्रयोग है । )
स्वभावभूतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः—
यत्कृतकं तदनित्यमित्युपाधिभेदेन ।
स्वभावभूतधर्मके भेद से स्वभाव का प्रयोग—
जो कृतक होता है वह अनित्य होता है ।
इस प्रकार उपाधिके भेदसे [ स्वभावहेतु का प्रयोग कहा । ]
अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इति ।
जो वस्तु अपने स्वभावकी निष्पत्ति ( उत्पत्ति ) में दूसरी वस्तु के व्यापारकी
आवश्यकता रखे उसे कृतक कहते हैं ।
एवं प्रत्ययभेदभेदित्वादयो द्रष्टव्याः ।
उसी प्रकार प्रत्ययभेदभेदित्व प्रयत्ननानन्तरीयकत्व आदि भी समझ लेने चाहिये ।
( जिसमें प्रत्यय अथवा कारणके भेदसे भेद निकाला जा सके उसे प्रत्ययभेदभेदी
कहते हैं । नान्तरीयक व्याप्तको कहते हैं । अर्थात् जो जिसके रहने पर रहे और न
रहने पर न रहे उसे उससे व्याप्त या नान्तरीयक कहते हैं । जैसे सूर्य के होने पर
मैदान में प्रकाश अवश्य होता है और उसके न होने पर नहीं होता । जो प्रयत्नसे
व्याप्त होता है वह अनित्य होता है । जो प्रत्ययभेदभेदी होता है वह कृतक होता है । )
सन्नुत्पत्तिमत्कृतको वा शब्द इति पक्षधर्मोपदर्शनम्¹ ।
अथवा शब्द सत् उत्पत्तिमान् और कृतक है । इस प्रकार पक्ष धर्म को
दिखला दिया ।
( धर्मी को पक्ष भी कहते हैं । यहाँ धर्मीशब्दमें पक्षके धर्म सत्त्व, उत्पत्तिमत्त्व
और कृतकत्व दिखलाये हैं । उनमें से सत्त्व वस्तु से बिलकुल अपृथक् होने से शुद्ध
विशेषण है । उत्पत्तिमत्त्व से प्रगट होता है कि वस्तुमें उसके अन्दर ही अन्दर कुछ
परिवर्तन हुआ है । अतएव यह अव्यतिरिक्तविशेषण है । कृतकत्वसे प्रगट होता है कि
करने वाला स्वयं वस्तुसे भिन्न है । अतः यह व्यतिरिक्त विशेषण है । )
( शङ्का ) यह स्वभावहेतु सिद्धसम्बन्ध स्वभावके साध्यमें प्रयोग किये जाने चाहिये
अथवा असिद्धसम्बन्धके ?
१. पीटर्सन संस्करण में यहाँ भी विराम न देकर इसको अगले वाक्य में मिला दिया है ।
न्यायबिन्दु १३
(उत्तर) सिद्धसम्बन्धमें प्रयोग किये जाने चाहिये । (यही दिखलाते हुए कहते हैं)
सर्व एते साधनधर्मा यथास्वं प्रमाणैः सिद्धसाधनधर्म-
मात्रानुबन्ध एव साध्यधर्मेऽवगन्तव्याः ।
यह स्वभावहेतु ( साधनधर्म ) निश्चितसाधनधर्ममात्रानुबन्धिसाधनधर्ममें ही प्रयोग
किये जाने चाहिये । अन्यत्र नहीं ।
( गमक होनेसे साधन और पराश्रित होनेसे धर्म कहा जाता है । साधन धर्म-
मात्रसे अभिप्राय केवल साधनधर्मसे ही है । अनुबन्ध अन्वयव्याप्तिको कहते हैं ।
जैसे—धूम पावकानुवन्धि ( अनुवन्धि-अनुबन्धवाला ) है । जो अपने अनुरूप
प्रमाणोंसे सिद्ध हो उसको यहाँ निश्चित कहा है । अतएव स्वभावहेतुका प्रयोग ऐसे
निश्चितसाधनधर्ममात्रको अनुबन्ध करने वाले साधनधर्ममें ही किया जाना चाहिये । )
तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ।
[ क्योंकि जो साध्यधर्म साधनधर्ममात्रानुबन्धि है ] वह ही उस साधनधर्मका
स्वभाव है । और स्वभाव ही हेतु है ।
[ यद्यपि साध्यधर्म साधनका स्वभाव होता है, तथा साधन हेतु होता है तथापि
साधन प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु नहीं है । ]
( धर्म और धर्मी के समुदायको प्रतिज्ञा कहते हैं । एकदेश एक भाग को कहते
हैं । यदि प्रतिज्ञा ( धर्म और धर्मी ) के ही किसी भाग को ( धर्म या धर्मी को )
हेतु बनाया जावेगा तो वह प्रयोग साध्यको सिद्ध न कर सकनेके कारणसे हेतु का
एकदोष हो जाता है । जैसे—'अग्नि उष्ण है; क्योंकि वह उष्ण है' में 'उष्णत्व' हेतु
प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु है ! )
वस्तुतस्तयोस्तादात्म्यात्तन्निष्पत्तावनिष्पन्नस्य तत्स्वभा-
वत्वाभावाद् व्यभिचारसंभवाच्च ।
क्योंकि वास्तवमें साध्य और साधन का तादात्म्य होता है । और जो तन्निष्पत्तिमें
अनिष्पन्न है ( जो जिसका नियमसे कारण नहीं होता वह तन्निष्पत्ति ( उसकी उत्पत्ति )
में अनिष्पन्न ( उत्पन्न न होने वाला ) होता है ) वह उस स्वभाववाला नहीं होता और
उसमें व्यभिचार भी आता है ।
कार्यहेतोरपि प्रयोगः । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानसादा-
वस्ति चेह धूम इति । इहापि सिद्ध एव ।
कार्यहेतु का प्रयोग—
जहाँपर धूम होता है वहां अग्नि होती है; जैसे पाकशाला आदिमें । उसी प्रकार
यहाँ भी धूम है । इस लिये यहाँ भी अग्नि सिद्ध ही है ।
कार्यकारणभावे कारणे साध्ये कार्यहेतुर्वक्तव्यः ।
कार्यकारणभावमें कारणके साध्य होनेपर कार्यको हेतु कहना चाहिये ।
१४ भाषाटीका सहित
वैधर्म्यवतः प्रयोगो यत्समुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एव ।
यथा नीलादिविशेषः । न चैवमिहोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्य सत उप-
लब्धिर्घटस्येत्यनुपलब्धिप्रयोगः ।
वैधर्म्यवत् का प्रयोग—
जो सत् और उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता है वह अवश्य उपलब्ध होता है । जैसे—
नील आदि विशेष । उसी प्रकार यहाँ उपलब्धिलक्षणप्राप्त सत् घटकी उपलब्धि नहीं
है । अतएव यह अनुपलब्धि प्रयोग है ।
असत्यनित्यत्वे नास्ति सत्त्वमुत्पत्तिमत्त्वं कृतकत्वं वा ।
असच्च शब्द उत्पत्तिमान्कृतको वेति स्वभावहेतोः प्रयोगः ।
[ स्वभावहेतुके वैधर्म्यप्रयोगको कहते हैं—]
अनित्यत्व ( साध्य ) का अभाव होने पर भी सत्त्व, उत्पत्तिमत्त्व अथवा कृतकत्व नहीं
हो सकते । शब्द असत् होते हुए भी उत्पत्तिमान् तथा कृतक होता है, यह स्वभावहेतु
का प्रयोग है ।
असत्यग्नौ न भवत्येव धूमोऽत्र चास्तीति कार्यहेतोः प्रयोगः ।
अग्नि के न होने पर धूम भी नहीं होता, उसी प्रकार यहाँ है । ( अर्थात् अग्निके
न होनेसे धूम नहीं है ) । यह कार्यहेतु का प्रयोग है ।
साधर्म्येणापि हि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिरिति । असति
तस्मिन्साध्येनं हेतोरन्वयाभावात् ।
साधर्म्य ( अन्वय ) के प्रयोगसे वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) अर्थात् ही आ जाता है ।
क्योंकि व्यतिरेकके अभावमें हेतुका साध्यसे अन्वय न हो सकेगा ।
( व्याप्तिके दो भेद हैं । एक अन्वयव्याप्ति, दूसरी व्यतिरेकव्याप्ति । एकके होने
पर दूसरे का नियमसे होना अन्वय है । जैसे—धूमके सद्भावमें अग्निका सद्भाव अवश्य
होनेके कारण धूमका अग्निके साथ अन्वय है । एकके न होने पर दूसरेका भी
नियमसे न होना व्यतिरेक है । जैसे—अग्निके अभावमें धूम का अभाव ।
तथा वैधर्म्येणाप्यन्वयगतिः । असति तस्मिन्साध्यो-
भावे हेत्वभावस्यासिद्धेः ।
उसी प्रकार वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) से भी अन्वय स्वयं ही आ जाता है । क्योंकि
अन्वयके न होनेपर साध्यके अभावमें हेतुका अभाव भी सिद्ध न होगा ।
१. पीटर्सन संस्करण में 'साध्ये न' पाठ है । संस्कृत टीका में भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।
२. पीटर्सन संस्करण में 'साध्यभावे' पाठ है । संस्कृत टीकामें भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।
न्यायबिन्दु १५
न हि स्वभावप्रतिबन्धे सत्येकस्य निवृत्तावप-
रस्य नियमेन निवृत्तिः ।
स्वभावप्रतिबन्धके होनेपर एककी निवृत्तिमें दूसरेकी निवृत्ति नियमसे नहीं होती ।
स च द्विप्रकारः । सर्वस्य तादात्म्यलक्षणस्तदुत्पत्ति-
लक्षणश्चेत्युक्तम् ।
वह स्वभावप्रतिबन्ध ( सब प्रतिवद्धका ) दो प्रकारका होता है—
तादात्म्यलक्षण और तदुत्पत्तिलक्षण ।
तेन हि निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो दर्शनीयः ।
[ स्वभावप्रतिबन्ध होनेपर निवर्त्यनिवर्तकभावके होनेके कारण से ] [ वह साध्यकी
निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिको कहनेवाले [ निवर्त्यनिवर्तकमें ] प्रतिबन्धको देखे ।
तस्मान्निवृत्तिवचनमाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनमेव भवति ।
[ साधनके साध्यमें प्रतिबद्ध होनेसे साध्यकी निवृत्ति होनेपर साधनकी निवृत्ति भी
हो जाती है ] अतएव [ साध्यकी निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिका कहना उस प्रतिबन्ध
का दिखलाना ही हो जाता है ।
यच्च प्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनमित्येकेनापि वाक्येनान्व-
यमुखेन व्यतिरेकमुखेन वा प्रयुक्तेन सपक्षासपक्षयोर्लिङ्गस्य सदस-
त्त्वख्यापनं कृतं भवतीति नावश्यवाक्यद्वयप्रयोगः ।
और वह प्रतिबन्धोपदर्शन ही (प्रतिबन्ध का दिखलाना ही) अन्वयवचन है ।
इस प्रकार प्रयोग किये हुए एक ही अन्वयमुख अथवा व्यतिरेकमुख वाक्यसे सपक्षमें
लिङ्गका सत्त्व अथवा असत्त्व कहा जाता है । इस प्रकार दो वाक्योंके प्रयोगकी कोई
आवश्यकता नहीं रहती ।
अनुपलब्धावपि यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एवेत्युक्तेऽनु-
पलभ्यमानं तादृशमसदिति प्रतीतेरन्वयसिद्धिः ।
अनुपलब्धिमें भी 'जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है' ऐसा
कहने पर उसी प्रकारका 'अनुपलभ्यमान ( न मिलनेवाला ) पदार्थ असत् है' ऐसी
प्रतीति हो जानेसे अन्वयकी सिद्धि हो जाती है ।
द्वयोरप्यनयोः प्रयोगेऽवश्यं पक्षनिर्देशः ।
इन दोनों प्रयोगोंमें पक्षका निर्देश ( कहना ) अवश्य होना चाहिये ।
यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं
सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्यवहारविषयः ।
क्योंकि साधर्म्यवत् प्रयोगमें भी जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध
नहीं होता वह असत् व्यवहारका विषय है ।
१६ न्या०
१६ भाषाटीका सहित
नोपलभ्यते चात्रोपलब्धिलक्षणप्राप्तो घट इत्युक्ते
सामर्थ्यादेव नेह घट इति भवति ।
'यहां उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट नहीं है' ऐसा कहनेपर 'यहां घट नहीं है' यह
सामर्थ्यसे ही आ जाता है।
तथा वैधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि 'यः सद्द्व्यवहारविषय उपलब्धिलक्ष-
णप्राप्तः स उपलभ्यत एव, न तथात्र तादृशो घट उपलभ्यत'
इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह सद्द्व्यवहारविषय इति भवति ।
उसी प्रकार वैधर्म्यवत् प्रयोगमें भी 'जो सद्द्व्यवहारका विषय और उपलब्धिलक्षण-
प्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है इसी प्रकार यहां वैसा घट उपलब्ध नहीं है' यह
कहनेपर सामर्थ्यसे ही 'यहां पर घट सद्द्व्यवहारका विषय नहीं है' यह हो जाता है।
कीदृशः पुनः पक्ष इति निर्देश्यः ।
'अब पक्ष कैसा होता है' यह कहा जाता है।
स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति ।
जो स्वरूपसे ही स्वयं इष्ट और अनिराकृत हो उसे पक्ष कहते हैं।
स्वरूपेणेति साध्यत्वेनेष्टः । स्वरूपेणैवेति साध्यत्वेनेष्टो न
साधनत्वेनापि ।
यथा शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चाक्षुषत्वं हेतुः ।
'स्वरूपसे इष्ट' शब्दसे पक्षको साध्य बतलाया है। स्वरूपसे ही साध्यरूपसे ही माना
गया है साधनरूपसे भी नहीं माना गया ।
जैसे—शब्दकी अनित्यताको साध्य करनेमें चाक्षुषत्व ( नेत्रसे उत्पन्न होना )
हेतु देना ।
शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यं न पुनस्तदिह साध्यत्वेनैवेष्टं साधनत्वे-
नाप्यभिधानात् ।
वह शब्दमें असिद्ध होनेसे साध्य है। उसको यहां केवल साध्य ही नहीं माना है।
क्योंकि उसे साधन भी कहा है।
'स्वयं इस पदका समर्थन—
स्वयमिति वादिना यस्तदा साधनमाह । एतेन यद्यपि क्वचि-
च्छास्त्रे स्थितः साधनमाह । तच्छास्त्रकारेण तस्मिन् धर्मिण्यनेकधर्मा-
भ्युपगमेऽपि यस्तदा तेन वादिना धर्मः स्वयं साधयितुमिष्टः स एव
साध्यो नेतर इत्युक्तं भवति ।
१. पीटर्सन संस्करण का 'निराकृतः' पाठ अशुद्ध है।
२, पीटर्सन संस्करण का 'स्थितसाधनमाह' पाठ हमारी सम्मति में अशुद्ध है।