न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबिन्दु ३
भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति ।
सद्भूत अर्थके प्रकर्ष तक होने वाले ज्ञानको योगिज्ञान कहते हैं । ( योगिप्रत्यक्ष
सद्भूत अर्थका ही हो सकता है । असद्भूतका नहीं हो सकता, और वह भी थोड़ा बहुत
नहीं होता किन्तु प्रकर्ष अर्थात् चरम सीमा तक होता है ।)
तस्य विषयः स्वलक्षणम् ।
प्रत्यक्षका विषय स्वलक्षण है । [ जो कि क्षण है ।]
यस्यार्थस्य संनिधानासंनिधानाभ्यां ज्ञानप्रतिभासभेदस्तत्स्व-
लक्षणम्, तदेव परमार्थसत्, अर्थक्रियास-
मर्थ्यलक्षणत्वाद्वस्तुनः ।
जिस विषयकी समीपता और असमीपतासे ज्ञानके प्रतिभासमें भेद हो वह स्वलक्षण
है । और वही परमार्थ सत् है । क्योंकि वही वस्तुमें अर्थक्रिया कराता है ।
अन्यत्सामान्यलक्षणम्, सोऽनुमानस्य विषयः ।
स्वलक्षणसे भिन्न सामान्यलक्षण होता है । वह अनुमानका विषय होता है ।
तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ।
वह प्रत्यक्ष ज्ञान ही अर्थ प्रतीतिरूप होनेसे प्रमाणका फल है ।
अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं, तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेरिति ।
इस ज्ञानका अर्थके समान बन जाना प्रमाण है । क्योंकि उसीसे अर्थकी प्रतीतिकी
सिद्धि होती है ।
इति प्रथम परिच्छेद ।