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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

न्यायबिन्दु १५
न हि स्वभावप्रतिबन्धे सत्येकस्य निवृत्तावप-
रस्य नियमेन निवृत्तिः ।
स्वभावप्रतिबन्धके होनेपर एककी निवृत्तिमें दूसरेकी निवृत्ति नियमसे नहीं होती ।
स च द्विप्रकारः । सर्वस्य तादात्म्यलक्षणस्तदुत्पत्ति-
लक्षणश्चेत्युक्तम् ।
वह स्वभावप्रतिबन्ध ( सब प्रतिवद्धका ) दो प्रकारका होता है—
तादात्म्यलक्षण और तदुत्पत्तिलक्षण ।
तेन हि निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो दर्शनीयः ।
[ स्वभावप्रतिबन्ध होनेपर निवर्त्यनिवर्तकभावके होनेके कारण से ] [ वह साध्यकी
निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिको कहनेवाले [ निवर्त्यनिवर्तकमें ] प्रतिबन्धको देखे ।
तस्मान्निवृत्तिवचनमाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनमेव भवति ।
[ साधनके साध्यमें प्रतिबद्ध होनेसे साध्यकी निवृत्ति होनेपर साधनकी निवृत्ति भी
हो जाती है ] अतएव [ साध्यकी निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिका कहना उस प्रतिबन्ध
का दिखलाना ही हो जाता है ।
यच्च प्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनमित्येकेनापि वाक्येनान्व-
यमुखेन व्यतिरेकमुखेन वा प्रयुक्तेन सपक्षासपक्षयोर्लिङ्गस्य सदस-
त्त्वख्यापनं कृतं भवतीति नावश्यवाक्यद्वयप्रयोगः ।
और वह प्रतिबन्धोपदर्शन ही (प्रतिबन्ध का दिखलाना ही) अन्वयवचन है ।
इस प्रकार प्रयोग किये हुए एक ही अन्वयमुख अथवा व्यतिरेकमुख वाक्यसे सपक्षमें
लिङ्गका सत्त्व अथवा असत्त्व कहा जाता है । इस प्रकार दो वाक्योंके प्रयोगकी कोई
आवश्यकता नहीं रहती ।
अनुपलब्धावपि यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एवेत्युक्तेऽनु-
पलभ्यमानं तादृशमसदिति प्रतीतेरन्वयसिद्धिः ।
अनुपलब्धिमें भी 'जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है' ऐसा
कहने पर उसी प्रकारका 'अनुपलभ्यमान ( न मिलनेवाला ) पदार्थ असत् है' ऐसी
प्रतीति हो जानेसे अन्वयकी सिद्धि हो जाती है ।
द्वयोरप्यनयोः प्रयोगेऽवश्यं पक्षनिर्देशः ।
इन दोनों प्रयोगोंमें पक्षका निर्देश ( कहना ) अवश्य होना चाहिये ।
यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं
सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्यवहारविषयः ।
क्योंकि साधर्म्यवत् प्रयोगमें भी जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध
नहीं होता वह असत् व्यवहारका विषय है ।
१६ न्या०