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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

बौद्ध न्यायबिन्दु
का
हिन्दी अनुवाद
अनुवादक—
काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री ।
प्रथम परिच्छेदः ।
सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिरिति तद् व्युत्पाद्यते ।
सभी पुरुषार्थोंकी सिद्धि सम्यग्ज्ञानपूर्वक होती है, अतएव [ इस ग्रन्थमें ] उसी
का वर्णन किया जाता है ।
द्विविधं सम्यग्ज्ञानम्—
सम्यग्ज्ञान दो प्रकारका होता है—
प्रत्यक्षमनुमानञ्च ।
प्रत्यक्ष और अनुमान ।
तत्र कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् ।
उनमेंसे कल्पनारहित निर्भ्रान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं ।
अभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासप्रतीतिः कल्पना तया रहितम् ।
अभिलाप ( वाचकशब्द ) से संसर्ग ( एक ज्ञानमें अभिधेयाकारका अभिधाना-
कारके साथ ग्रहण करने योग्य हो जाना । जो कहा जावे उसे अभिधेय तथा कहने या
नाम को अभिधान कहते हैं ) के योग्य प्रतिभासकी प्रतीतिको कल्पना कहते हैं ।
( 'वृक्ष' इस शब्दके कहते ही हृदयमें इस शब्दके संसर्ग से इस शब्दके योग्य स्कन्ध
और शाखादिमान् पदार्थका प्रतिभास होने लगता है । उस पदार्थकी प्रतीतिको कल्पना
कहते हैं । ) प्रत्यक्षज्ञान उस कल्पनासे रहित होना चाहिये ।
तिमिराशुभ्रमणनौयानसंक्षोभाद्यनाहितविभ्रमं ज्ञानं प्रत्यक्षम् ।
जिस ज्ञानमें अन्धकार, [ अलात आदिका ] शीघ्र २ घूमना, नौकापर जाना और
[ वात पित्त और श्लेष्मके ] संक्षोभ आदिसे विभ्रम नहीं हुआ हो ऐसा [ कल्पना
रहित और निर्भ्रान्त ] ज्ञान ही प्रत्यक्ष होता है ।