न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ भाषाटीका सहित
नोपलभ्यते चात्रोपलब्धिलक्षणप्राप्तो घट इत्युक्ते
सामर्थ्यादेव नेह घट इति भवति ।
'यहां उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट नहीं है' ऐसा कहनेपर 'यहां घट नहीं है' यह
सामर्थ्यसे ही आ जाता है।
तथा वैधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि 'यः सद्द्व्यवहारविषय उपलब्धिलक्ष-
णप्राप्तः स उपलभ्यत एव, न तथात्र तादृशो घट उपलभ्यत'
इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह सद्द्व्यवहारविषय इति भवति ।
उसी प्रकार वैधर्म्यवत् प्रयोगमें भी 'जो सद्द्व्यवहारका विषय और उपलब्धिलक्षण-
प्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है इसी प्रकार यहां वैसा घट उपलब्ध नहीं है' यह
कहनेपर सामर्थ्यसे ही 'यहां पर घट सद्द्व्यवहारका विषय नहीं है' यह हो जाता है।
कीदृशः पुनः पक्ष इति निर्देश्यः ।
'अब पक्ष कैसा होता है' यह कहा जाता है।
स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति ।
जो स्वरूपसे ही स्वयं इष्ट और अनिराकृत हो उसे पक्ष कहते हैं।
स्वरूपेणेति साध्यत्वेनेष्टः । स्वरूपेणैवेति साध्यत्वेनेष्टो न
साधनत्वेनापि ।
यथा शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चाक्षुषत्वं हेतुः ।
'स्वरूपसे इष्ट' शब्दसे पक्षको साध्य बतलाया है। स्वरूपसे ही साध्यरूपसे ही माना
गया है साधनरूपसे भी नहीं माना गया ।
जैसे—शब्दकी अनित्यताको साध्य करनेमें चाक्षुषत्व ( नेत्रसे उत्पन्न होना )
हेतु देना ।
शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यं न पुनस्तदिह साध्यत्वेनैवेष्टं साधनत्वे-
नाप्यभिधानात् ।
वह शब्दमें असिद्ध होनेसे साध्य है। उसको यहां केवल साध्य ही नहीं माना है।
क्योंकि उसे साधन भी कहा है।
'स्वयं इस पदका समर्थन—
स्वयमिति वादिना यस्तदा साधनमाह । एतेन यद्यपि क्वचि-
च्छास्त्रे स्थितः साधनमाह । तच्छास्त्रकारेण तस्मिन् धर्मिण्यनेकधर्मा-
भ्युपगमेऽपि यस्तदा तेन वादिना धर्मः स्वयं साधयितुमिष्टः स एव
साध्यो नेतर इत्युक्तं भवति ।
१. पीटर्सन संस्करण का 'निराकृतः' पाठ अशुद्ध है।
२, पीटर्सन संस्करण का 'स्थितसाधनमाह' पाठ हमारी सम्मति में अशुद्ध है।