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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

न्यायबिन्दु ७
स च प्रतिबन्धः साध्येऽर्थे लिङ्गस्य वस्तुतस्ता¹-
दात्म्यात्साध्यार्थादुत्पत्तेश्च ।
स्वभावप्रतिबन्ध साध्य अर्थमें लिङ्गका होता है । ( पराधीन होने से लिङ्ग प्रति-
बद्ध होता है । साध्य अर्थ पराधीन न होनेसे प्रतिबन्धका विषय अथवा प्रतिबन्धविषय
होता है किन्तु प्रतिबद्ध नहीं होता ) । क्योंकि वास्तव में साध्य और लिङ्गका तादात्म्य
है और साध्य अर्थसे लिङ्गकी उत्पत्ति होती है । ( अर्थात् तादात्म्य और तदुत्पत्तिसे
ही स्वभावप्रतिबन्ध होता है )
अतत्स्वभावस्यातदुत्पत्तेश्च तत्राप्रतिबद्धस्वभावत्वात् ।
क्योंकि जिसका वह स्वभाव न हो तथा जिसकी उससे उत्पत्ति न हो उसमें
प्रतिबद्धस्वभावता नहीं होती है ।
ते च तादात्म्यतदुत्पत्ती स्वभावकार्ययोरेवेति²
ताभ्यामेव वस्तुसिद्धिः ।
तादात्म्य और तदुत्पत्ति स्वभाव और कार्य में ही होती हैं । अतएव कार्य और
स्वभावसे ही वस्तुकी ( अथवा विधिकी ) सिद्धि होती है ।
प्रतिषेधसिद्धिरपि यथोक्ताया एवानुपलब्धेः ।
सति वस्तुनि तस्या असंभवत् ।
प्रतिषेध व्यवहार की सिद्धि भी पूर्वोक्त दृश्यानुपलब्धि से ही होती है ।
[ क्योंकि प्रतिषेध्य ] वस्तुके विद्यमान होनेपर दृश्यानुपलब्धि नहीं हो सकती ।
अन्यथा चानुपलब्धिलक्षणप्राप्तेषु देशकालस्वभावविप्र-
कृष्टेष्वात्मप्रत्यक्षनिवृत्तेरभावनिश्चयाभावात् ।
अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त ( जिसकी उपलब्धिको कोई कारणविशेष उपस्थित नहीं
है ) देशकालस्वभावविप्रकृष्ट पदार्थोंका आत्मप्रत्यक्ष न हो सकनेसे उनका अभाव
नहीं कह सकते । ( देशविप्रकृष्ट-जैसे भारतसे अमेरिका । कालविप्रकृष्ट-जैसे-भूत-
कालमें रामचन्द्र । स्वभावविप्रकृष्ट-जैसे-मदारीका अपने मुखमें से अग्नि निकालना )
[ अदृश्यानुपलब्धि वस्तुके विद्यमान होते हुए भी ही हो सकती है । जिसप्रकार
अन्धेको सब वस्तुएँ अदृश्य होनेसे अनुपलब्ध हैं । अतएव प्रतिषेध सिद्धि अदृश्यानु-
पलब्धिसे न होकर दृश्यानुपलब्धिसे ही होती है । ]
अमूढस्मृतिसंस्कारस्यातीतस्य वर्तमानस्य च प्रतिपत्तृ-
प्रत्यक्षस्य निवृत्तिरभावव्यवहारसाधनी ।
तस्या एवाभावनिश्चयात् ।
१. पूर्वपुस्तक में 'वस्तुतः' यह पाठ है । किन्तु हमारी सम्मति में वह अशुद्ध है ।
२. पूर्वपुस्तक में 'इति' के पश्चात् विराम दे दिया है ।
१५ न्या०