न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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तच्चतुर्विधम् ।
प्रत्यक्षज्ञान चार प्रकारका होता है—
१ इन्द्रियज्ञान, २ मनोविज्ञान, ३ आत्मसंवेदन ( स्वसंवेदन ) और ४ योगिप्रत्यक्ष
( योगिज्ञान ) ।
इन्द्रियज्ञानम्¹ ।
इन्द्रियोंके ज्ञानको इन्द्रियज्ञान कहते हैं।
स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तर-
प्रत्ययेन जनितं तत्' मनोविज्ञानम् ।
अपने विषयके पश्चात्, विषयके सहकारी, समनन्तरप्रत्ययरूप इन्द्रियज्ञानसे
उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको मनोविज्ञान कहते हैं।
( बौद्ध दर्शनमें ज्ञानके ४ प्रत्यय ( कारण ) माने हैं । नेत्रसे घटको देखनेमें
• पहला कारण स्वयं घट है । अतएव विषय होनेसे इसको आलम्बन प्रत्यय कहते हैं ।
दूसरा कारण आलोक है । क्योंकि उसकी सहायताके बिना इन्द्रियाँ किसी विषयको
ग्रहण नहीं कर सकतीं । अतएव उसको सहकारी प्रत्यय कहते हैं । तीसरा कारण
इन्द्रियाँ हैं उनको अधिपतिप्रत्यय कहते हैं । और चौथा कारण ग्रहण करने अथवा
विचार करनेकी वह शक्ति है जिसका उपयोग न होने से हम प्रायः देखते हुए भी नहीं
देख सकते, शब्द होते हुए भी नहीं सुन सकते । बौद्धेतर दर्शनोंकी अपेक्षा इसको मन
कहना उपयुक्त होगा । इसको समनन्तरप्रत्यय कहते हैं । )
सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम् ।
सभी चित्त ( अर्थमात्रको ग्रहण करने वाले ) और चैत्तों ( विशेष अवस्थाको
ग्रहण करने वाले सुख आदि ) का आत्माको प्रकट करना आत्मसंवेदन है ।
( वाह्यार्थास्तित्ववादी बौद्धोंके मतमें प्रत्येक वस्तुके दो भेद हैं—वाह्य और
आन्तर । बाह्यके फिर दो भेद हैं-भूत और भौतिक । आन्तरके भी दो भेद हैं-चित्त
और चैत्त । चैत्तको चैत्तिक भी कहते हैं । भूत पृथ्वी आदि चार परमाणु हैं । भौतिक
रूप आदि और चक्षु आदि हैं । चित्त विज्ञान है । चैत्तिक रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा
और संस्कार संज्ञा वाले पाँच स्कन्ध हैं । विज्ञानके फिर दो भेद हैं-आलयविज्ञान जो
'अहं' या 'मैं' इस आकारका है । प्रवृत्तिविज्ञान इन्द्रिय आदिसे उत्पन्न होता है और
रूप आदिको विषय करता है । )
१. पीटर्सन साहब की पुस्तक में विरामचिह्न 'इन्द्रियज्ञानम्' के पश्चात् न देकर अगले
वाक्य में 'तत्' के पश्चात् दिया गया है । जिससे 'स्वविषय' आदिके इन्द्रियज्ञान का लक्षण होने
का भ्रम होता है ।
२. पहिली पुस्तक का पाठ 'सर्व चित्त-' आदि है । किन्तु वह अशुद्ध है ।