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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 176 में से

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पृष्ठ 150

६ भाषाटीका सहित
यः स्वभावः सत्स्वन्येषूपलम्भप्रत्ययेषु यत्प्रत्यक्ष
एव भवति स स्वभावः ।
[ आलम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त ] शेष उपलम्भप्रत्ययोंके रहते हुए जो स्वभावसे
प्रत्यक्ष होता है वह स्वभाव है । ( यह स्वभाव विशेषकी परिभाषा है । )
स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्मे हेतुः ।
यथा-वृक्षोऽयं शिंशपात्वादिति ।
[ जो पदार्थ अपने हेतुके अस्तित्वकी अपेक्षाकरके विद्यमान होता है और हेतु-
सत्तासे भिन्न अन्य किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं करता वह स्वसत्तामात्रभावी साध्य है । ]
उस स्वसत्तामात्रभावी साध्यधर्ममें जो हेतु है वह स्वभाव हेतु है ।
जैसे-यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है ।
कार्यं यथाग्निरत्र धूमादिति ।
कार्यका उदाहरण—
जैसे-यहाँपर अग्नि है, क्योंकि यहाँ धूम है ।
अत्र द्वौ वस्तुसाधनौ१, एकः प्रतिषेधहेतुः ।
इन तीन हेतुओंमें ( अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्यमें ) से दो हेतु ( स्वभाव
और कार्य ) वस्तुकी विधिको बतलाते हैं । और एक ( अनुपलब्धि ) प्रतिषेधको
बतलाता है ।
स्वभावप्रतिबन्धे हि सत्यर्थोऽर्थं गमयेत् ।
स्वभावप्रतिबन्ध ( स्वभावसे एक स्थानमें नियत होना ) होने पर ही साधन अर्थ
साध्य अर्थको बतलाता है । [ इस कारणसे यह तीन ही साध्यको सिद्ध कर सकते
हैं अन्य नहीं ]
तदप्रतिबद्धस्य तदव्यभिचारनियमाभावात् ।
क्योंकि जो जहाँ पर स्वभावसे प्रतिबद्ध नहीं होता उसका अप्रतिबद्धविषयमें
अव्यभिचार के नियमका अभाव होता है । [ अतएव स्वभावसे अप्रतिबद्धोंमें अव्यभि-
चारनियम अथवा अविनाभावनियम नहीं बन सकता । गम्यगमकभाव अव्यभिचार-
नियम से ही होता है । लिङ्ग योग्यतासे दीपकके समान परोक्ष अर्थको प्रकाशित
करनेका निमित्त भी नहीं माना जा सकता । विरुद्ध इसके वह अव्यभिचारीपने से
ही निश्चय किया जाता है । अतएव स्वभावप्रतिबन्ध होने पर ही अविनाभाव का निश्चय
होता है । और गम्यगमकभाव अविनाभावसे ही होता है । अतएव स्वभावप्रतिबन्ध
होने पर ही अर्थ अर्थको बतलाता है अन्य प्रकार से नहीं बतलाता । ]


१. पूर्व छपी पुस्तक में विराम चिह्न '-साधनौ' के पश्चात् है । 'प्रतिषेधहेतुः' के पश्चात्
कोई चिह्न न देकर उसे अगले वाक्य में मिला दिया है, जिससे अर्थ बिलकुल गड़बड़ा जाता है ।