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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 176 में से

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पृष्ठ 148

द्वितीय परिच्छेद ।
अनुमानं द्विधा—
अनुमान दो प्रकारका होता है—
स्वार्थं परार्थं च ।
स्वार्थ और परार्थ ।
तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् ।
त्रिरूपलिङ्ग से होने वाले अनुमेयके ज्ञानको स्वार्थानुमान कहते हैं ।
प्रमाणफलव्यवस्थाऽत्रापि प्रत्यक्षवत् ।
प्रमाणके फलकी व्यवस्था यहां भी प्रत्यक्षके ही समान है ।
त्रैरूप्यम् पुनः—
लिङ्गस्यानुमेये सत्त्वमेव,
सपक्ष एव सत्त्वम्,
असपक्षे चासत्त्वमेव निश्चितम् ।
त्रैरूप्य ( त्रिरूपलिङ्ग ) यह है—
(१) अनुमेयमें लिङ्गकी विद्यमानता—
(लिङ्ग शब्दका अर्थ चिह्न है । जैसे—दूरसे देखनेवालेके लिये अग्निका चिह्न या
लिङ्ग धूम है । धूम ही हेतु है । इसको धर्म भी कहते हैं ।)
(२) लिङ्गका सपक्षमें अवश्य रहना । और
(३) लिङ्गका विपक्षमें किसी अवस्थामें भी न रहना ।
अनुमेयोऽत्र जिज्ञासितविशेषो धर्मी ।
जिस धर्मीको अनुमानके द्वारा जाननेकी इच्छा की जाती हैउसे अनुमेय कहते हैं ।
(जिस गुण या लक्षणको दिखला कर वस्तु (अनुमेय) सिद्ध की जाती है उसे
धर्म कहते हैं । जिस वस्तु (अनुमेय) में वह धर्म रहे उसे धर्मी कहते हैं । जिसे
सिद्ध किया जावे उसे साध्य कहते हैं ।)
साध्यधर्मसामान्येन समानोऽर्थः सपक्षः ।
जो पदार्थ साध्यधर्मके समान हो उसे सपक्ष कहते हैं ।
(बौद्धग्रन्थों में ‘धर्म’ शब्द के चार अर्थों में चार प्रयोग मिलते हैं—
(१) Scriptural Texts या मूल धार्मिक पुस्तकें ।
(२) Quality या गुण ।
(३) Cause या हेतु । और