सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

न्यायबिन्दु ५
( ४ ) Unsubstantial and Soulles या निःसत्त्व और निर्जीव । इस
को पाली में 'निसत्त निज्जीव' कहते हैं । हमारी सम्मति में न्यायबिन्दु के समासों में
'धर्म' शब्द का तीसरे अर्थ में प्रयोग किया गया है । )
न सपक्षोऽसपक्षः ।
जो सपक्ष नहीं होता उसे विपक्ष या असपक्ष कहते हैं ।
ततोऽन्यस्तद्विरुद्धस्तदभावश्चेति ।
जो वस्तु सपक्षसे भिन्न हो या सपक्षके विरुद्ध हो अथवा जिसमें सपक्षका अभाव
हो वह असपक्ष होती है ।
त्रिरूपाणि च ॥
[ ऊपर कहे हुए ] त्रिरूप हैं ।
त्रीण्येव च लिङ्गानि—
अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति ।
लिङ्ग भी तीन ही होते हैं—
अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्य ।
तत्रानुपलब्धिर्यथा—न प्रदेशविशेषे क्वचिद् घट
उपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति ।
उनमें से अनुपलब्धि इस प्रकार है—
जैसे-कसी विशेष स्थान में घट नहीं है । क्योंकि घटके उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने
परभी उसकी वहां अनुपलब्धि है ।
( घट स्वभावसे ही विद्यमान है । अर्थात् घटके अस्तित्वमें स्वभाव के अतिरिक्त
अन्य कारण नहीं है । अतएव घट उपलब्धि ( मिलना ) लक्षण वाला है । घटमें
उपलब्धिलक्षण है अतएव वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त है । घटका उपलब्धिलक्षणप्राप्तपना
उसकी उपलब्धिलक्षणप्राप्ति है । अनुपलब्धि न मिलनेको कहते हैं । )
उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरुपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्यं
स्वभावविशेषश्च ।
उपलब्धिलक्षणप्राप्ति उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य और स्वभावविशेष [ यह तीनों
एकही हैं । ] ( पीछे उपलब्धिके चार प्रत्यय बतला दिये हैं । यहाँ प्रत्ययान्तर शब्द
आलम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त अन्य प्रत्ययोंका वाचक है । साकल्य सम्पूर्णताको कहते
हैं । उपलम्भके प्रत्ययान्तरोंकी एकत्रित सम्पूर्णताको उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य
कहते हैं । )