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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

८ | भाषाटीका सहित
यह दृश्यानुपलब्धि जानने वालेके पूर्व अनुभूतप्रत्यक्ष (जिस प्रत्यक्ष ज्ञानका उसके
द्वारा पहिले अनुभव किया जा चुका है) और वर्तमानकालके प्रत्यक्षकी निवृत्तिके
अभावके व्यवहारको बतलाने वाली है।
क्योंकि अतीत और वर्तमानकालीन अनुपलब्धि ही अभावको निश्चय करती है।
सा च प्रयोगभेदादेकादशप्रकारा ।
अनुपलब्धि प्रयोगके भेदसे ग्यारह प्रकारकी होती है—
स्वभावानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमः उपलब्धि-
लक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति ।
स्वभावानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां धूम नहीं है, क्योंकि वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने पर भी अनु-
पलब्ध है ॥ १ ॥
कार्यानुपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि धूम-
कारणानि सन्ति धूमाभावात् ।
कार्यानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके कार्यकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां अप्रतिबद्धसामर्थ्यवाले (जिस धूमकी गतिकी सामर्थ्य रुकी न हो)
धूमके कारण नहीं हैं, क्योंकि यहां धूमका अभाव है ॥ २ ॥
व्यापकानुपलब्धिर्यथा । नात्र शिंशपा वृक्षाभावादिति ।
व्यापकानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके व्याप्यके व्यापक धर्मकी अनुपलब्धि)—
जैसे—यहां शिंशपा (शीशमका वृक्ष) नहीं है, क्योंकि इस स्थानमें वृक्षका
अभाव है ॥ ३ ॥
स्वभावविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शोऽग्नेरिति ।
स्वभावविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावसे विरुद्धकी उपलब्धि)—
जैसे—यहाँ शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि यहाँ अग्नि है ॥ ४ ॥
विरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शो धूमादिति ।
विरुद्धकार्योपलब्धि (प्रतिषेध्यसे विरुद्ध कार्य की उपलब्धि)—
जैसे—यहाँ शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि यहां धुआं है ॥ ५ ॥
विरुद्धव्याप्तोपलब्धिर्यथा । न ध्रुवभावी भूतस्यापि
भावस्य विनाशो हेत्वन्तरापेक्षणादिति ।
विरुद्धव्याप्तोपलब्धि (प्रतिषेध्यके विरुद्धसे व्याप्त धर्मान्तर कीउ पलब्धि)—
जैसे—उत्पन्न हुई वस्तुका भी नाश अवश्यंभावी नहीं है (अनुत्पन्नका तो कैसे
कह सकते हैं), क्योंकि वह हेत्वन्तर की अपेक्षा रखती है ॥ ६ ॥
कार्यविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि
शीतकारणानि सन्त्यग्नेरिति ।