न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबिन्दु ०६
कार्याविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कार्यके विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—यहां पर अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाले शीतके कारण नहीं हैं; क्योंकि यहां
अग्नि है ॥ ७ ॥
व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र तुषारस्पर्शोऽग्नेरिति ।
व्यापकविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके व्यापकसे विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—यहां तुषारका स्पर्श नहीं है; क्योंकि यहां अग्नि है ॥ ८ ॥
कारणानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमोऽग्न्यभावादिति ।
कारणानुपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कारणकी अनुपलब्धि )—
जैसे—यहां पर धूम नहीं है; क्योंकि यहाँ अग्निका अभाव है ॥ ९ ॥
कारणविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नास्य रोमहर्षादिविशेषाः
संनिहितदहनविशेषत्वादिति ।
कारणविरुद्धोपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कारणके विरुद्धकी उपलब्धि )—
जैसे—इस पुरुषको रोमहर्ष आदि नहीं हो रहे हैं; क्योंकि उसके पास अग्नि-
विशेष है ॥ १० ॥
कारणविरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । न रोमहर्षादिविशेष-
युक्तपुरुषवानयं प्रदेशो धूमादिति ।
कारणविरुद्धकार्योपलब्धि ( प्रतिषेध्यकारणके विरुद्धके कार्यकी उपलब्धि )—
जैसे—इस प्रदेशमें रोमहर्ष आदिसे युक्त पुरुष नहीं है; क्योंकि यहां धूम है ॥११॥
इमे सर्वे कार्यानुपलब्ध्यादयो दशानुपलब्धिप्रयोगाः
स्वभावानुपलब्धौ संग्रहमुपयान्ति ।
ये सब कार्यानुपलब्धि आदि दश अनुपलब्धिके प्रयोग स्वभावानुपलब्धिमें ही
आ जाते हैं ।
पारम्पर्येणार्थान्तरविधिप्रतिषेधाभ्यां प्रयोगभेदेऽपि प्रयोगदर्शना-
भ्यासात्स्वयमप्येवं व्यवच्छेदप्रतीतिर्भवतीति
स्वार्थेऽप्यनुमानेऽस्याः प्रयोगनिर्देशः ।
[ कार्यानुपलब्धि आदिमें यद्यपि ] अर्थान्तरसे विधि और प्रतिषेधसे प्रयोगभेद
है तथापि परम्परासे [ स्वभावानुपलब्धिमें अन्तर्भूत हो जाते हैं । हम लोगोंको इन ]
प्रयोगोंको देखनेके अभ्याससे स्वयं ही व्यवच्छेद ( प्रतिषेध ) की प्रतीति होती है ।
इसी लिये इनका प्रयोग स्वार्थानुमानमें भी किया गया है ।
सर्वत्र चास्यामभावव्यवहारसाधन्यामनुपलब्धौ येषां स्वभाव-
विरुद्धादीनामुपलब्ध्या कारणादीनामनुपलब्ध्या च प्रतिषेध उक्त-