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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 176 में से

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पृष्ठ 143

निवेदन ।
बौद्धदर्शनके प्रेमियोंके संमुख मैं न्यायबिन्दुका यह हिन्दी अनुवाद
लेकर उपस्थित हो रहा हूँ। अनुवाद कैसा है यह पाठक ही बतला सकेंगे।
क्योंकि मुझे इस विषयमें कहने का कुछ अधिकार नहीं है। यह अवश्य है
कि इस अनुवादके करनेमें बौद्धोंके पारिभाषिक शब्दोंकी व्याख्या करना
तो दूर उनके समझनेमें भी मुझे महीनों उलझना पड़ा है। आशा है कि
पाठकोंको उनमें अब विशेष न उलझना पड़ेगा।
ग्रन्थकी भाषाके लिये मुझे सबसे प्रथम क्षमा प्रार्थना करनी है।
क्योंकि न्यायका कोई भी ग्रन्थ हिन्दीमें न होनेसे मुझे इसके लिये स्वयं ही
ढंग सोचना पड़ा है। भाषासम्बन्धी त्रुटियाँ निकालने वालोंसे मुझे यह
प्रार्थना है कि उनको जिस वाक्यमें भाषासम्बन्धी त्रुटि जान पड़े उसको
प्रथम स्वयं ठीक करके ही दूसरोंको दिखलावें। ऐसा करनेसे उन्हें इस
सम्बन्धमें मेरी कठिनताका बहुत कुछ आभास हो जावेगा। उचित तो यह
होता कि कुछ संस्कृत न्याय तथा कुछ हिन्दी साहित्यके विद्वानोंकी एक
समिति न्यायकी भाषा को निश्चित करती, किन्तु यह न होता देखकर मैंने
स्वयं ही इस विषय पर लेखनी उठायी है। आशा है कि इसके लिये हिन्दी
भाषाके विद्वान् मुझे क्षमा करेंगे।
यदि मूल संस्कृत ग्रन्थका शाब्दिक अनुवाद ही किया जाता तो वह
किसी कामका भी न होता। अतएव वाक्य पूरा करनेके लिये मुझको दूसरे
शब्द डालने पड़े हैं जो [ ] ऐसे कोष्ठकमें रखे गये हैं। भावको स्पष्ट
करने वाले शब्द सादे कोष्ठकमें रखे गये हैं।
आशा है कि इस ग्रन्थसे हिन्दी साहित्यके दर्शन विभागको कुछ उत्ते-
जना मिलेगी।
भदैनी, बनारस
दि० २८ जून १६२४ ई० } चन्द्रशेखर शास्त्री ।
१४ न्या०