न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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स्तेषामुपलब्धिलक्षणप्राप्तानामेवोपलब्धिरनुपलब्धिश्च वेदितव्या ।
अन्येषां विरोधकार्यकारणभावासिद्धिः ।
इस अभाव और अभावको साधन करने वाली अनुपलब्धिमें जिन स्वभावविरुद्ध
आदिकोंकी उपलब्धि और कारणादिकोंकी अनुपलब्धिसे प्रतिषेध कहा गया है उन्हीं
उपलब्धिलक्षणप्राप्तोंकी उपलब्धि और अनुपलब्धि जाननी चाहिये । क्योंकि दूसरोंके
विरोध और कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
विप्रकृष्टविषयानुपलब्धिः प्रत्यक्षानुमाननिवृत्ति-
लक्षणा संशयहेतुः प्रमाणनिवृत्तावप्यर्थाभावासिद्धेरिति ।
संशयके कारण विप्रकृष्टविषयानुपलब्धि ( अदृश्यानुपलब्धि ) प्रत्यक्ष अनुमानकी
निवृत्ति ( उसमें प्रत्यक्ष और अनुमान दोनोंकी गति नहीं है ) लक्षण वाली है ।
( ज्ञानज्ञेयस्वभाव वाली है ) । क्योंकि प्रमाणकी निवृत्ति होनेपर भी अर्थका अभाव
असिद्ध ही है ।
इति द्वितीय परिच्छेद ।