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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 176 में से

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पृष्ठ 156

१२ भाषाटीका सहित
तथा स्वभावहेतुका प्रयोग—
जो सत् होता है वह सब अनित्य होता है । जैसे-घट आदि ।
शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः—
यदुत्पत्तिमत्तदनित्यमिति ।
शुद्ध स्वभावहेतु का प्रयोग—
जो उत्पत्तिमान् होता है वह अनित्य होता है । ( यह अव्यतिरिक्तविशेषणवाला
प्रयोग है । )
स्वभावभूतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः—
यत्कृतकं तदनित्यमित्युपाधिभेदेन ।
स्वभावभूतधर्मके भेद से स्वभाव का प्रयोग—
जो कृतक होता है वह अनित्य होता है ।
इस प्रकार उपाधिके भेदसे [ स्वभावहेतु का प्रयोग कहा । ]
अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इति ।
जो वस्तु अपने स्वभावकी निष्पत्ति ( उत्पत्ति ) में दूसरी वस्तु के व्यापारकी
आवश्यकता रखे उसे कृतक कहते हैं ।
एवं प्रत्ययभेदभेदित्वादयो द्रष्टव्याः ।
उसी प्रकार प्रत्ययभेदभेदित्व प्रयत्ननानन्तरीयकत्व आदि भी समझ लेने चाहिये ।
( जिसमें प्रत्यय अथवा कारणके भेदसे भेद निकाला जा सके उसे प्रत्ययभेदभेदी
कहते हैं । नान्तरीयक व्याप्तको कहते हैं । अर्थात् जो जिसके रहने पर रहे और न
रहने पर न रहे उसे उससे व्याप्त या नान्तरीयक कहते हैं । जैसे सूर्य के होने पर
मैदान में प्रकाश अवश्य होता है और उसके न होने पर नहीं होता । जो प्रयत्नसे
व्याप्त होता है वह अनित्य होता है । जो प्रत्ययभेदभेदी होता है वह कृतक होता है । )
सन्नुत्पत्तिमत्कृतको वा शब्द इति पक्षधर्मोपदर्शनम्¹ ।
अथवा शब्द सत् उत्पत्तिमान् और कृतक है । इस प्रकार पक्ष धर्म को
दिखला दिया ।
( धर्मी को पक्ष भी कहते हैं । यहाँ धर्मीशब्दमें पक्षके धर्म सत्त्व, उत्पत्तिमत्त्व
और कृतकत्व दिखलाये हैं । उनमें से सत्त्व वस्तु से बिलकुल अपृथक् होने से शुद्ध
विशेषण है । उत्पत्तिमत्त्व से प्रगट होता है कि वस्तुमें उसके अन्दर ही अन्दर कुछ
परिवर्तन हुआ है । अतएव यह अव्यतिरिक्तविशेषण है । कृतकत्वसे प्रगट होता है कि
करने वाला स्वयं वस्तुसे भिन्न है । अतः यह व्यतिरिक्त विशेषण है । )
( शङ्का ) यह स्वभावहेतु सिद्धसम्बन्ध स्वभावके साध्यमें प्रयोग किये जाने चाहिये
अथवा असिद्धसम्बन्धके ?
१. पीटर्सन संस्करण में यहाँ भी विराम न देकर इसको अगले वाक्य में मिला दिया है ।