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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 176 में से

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पृष्ठ 157

न्यायबिन्दु १३
(उत्तर) सिद्धसम्बन्धमें प्रयोग किये जाने चाहिये । (यही दिखलाते हुए कहते हैं)
सर्व एते साधनधर्मा यथास्वं प्रमाणैः सिद्धसाधनधर्म-
मात्रानुबन्ध एव साध्यधर्मेऽवगन्तव्याः ।
यह स्वभावहेतु ( साधनधर्म ) निश्चितसाधनधर्ममात्रानुबन्धिसाधनधर्ममें ही प्रयोग
किये जाने चाहिये । अन्यत्र नहीं ।
( गमक होनेसे साधन और पराश्रित होनेसे धर्म कहा जाता है । साधन धर्म-
मात्रसे अभिप्राय केवल साधनधर्मसे ही है । अनुबन्ध अन्वयव्याप्तिको कहते हैं ।
जैसे—धूम पावकानुवन्धि ( अनुवन्धि-अनुबन्धवाला ) है । जो अपने अनुरूप
प्रमाणोंसे सिद्ध हो उसको यहाँ निश्चित कहा है । अतएव स्वभावहेतुका प्रयोग ऐसे
निश्चितसाधनधर्ममात्रको अनुबन्ध करने वाले साधनधर्ममें ही किया जाना चाहिये । )
तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ।
[ क्योंकि जो साध्यधर्म साधनधर्ममात्रानुबन्धि है ] वह ही उस साधनधर्मका
स्वभाव है । और स्वभाव ही हेतु है ।
[ यद्यपि साध्यधर्म साधनका स्वभाव होता है, तथा साधन हेतु होता है तथापि
साधन प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु नहीं है । ]
( धर्म और धर्मी के समुदायको प्रतिज्ञा कहते हैं । एकदेश एक भाग को कहते
हैं । यदि प्रतिज्ञा ( धर्म और धर्मी ) के ही किसी भाग को ( धर्म या धर्मी को )
हेतु बनाया जावेगा तो वह प्रयोग साध्यको सिद्ध न कर सकनेके कारणसे हेतु का
एकदोष हो जाता है । जैसे—'अग्नि उष्ण है; क्योंकि वह उष्ण है' में 'उष्णत्व' हेतु
प्रतिज्ञार्थैकदेशहेतु है ! )
वस्तुतस्तयोस्तादात्म्यात्तन्निष्पत्तावनिष्पन्नस्य तत्स्वभा-
वत्वाभावाद् व्यभिचारसंभवाच्च ।
क्योंकि वास्तवमें साध्य और साधन का तादात्म्य होता है । और जो तन्निष्पत्तिमें
अनिष्पन्न है ( जो जिसका नियमसे कारण नहीं होता वह तन्निष्पत्ति ( उसकी उत्पत्ति )
में अनिष्पन्न ( उत्पन्न न होने वाला ) होता है ) वह उस स्वभाववाला नहीं होता और
उसमें व्यभिचार भी आता है ।
कार्यहेतोरपि प्रयोगः । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानसादा-
वस्ति चेह धूम इति । इहापि सिद्ध एव ।
कार्यहेतु का प्रयोग—
जहाँपर धूम होता है वहां अग्नि होती है; जैसे पाकशाला आदिमें । उसी प्रकार
यहाँ भी धूम है । इस लिये यहाँ भी अग्नि सिद्ध ही है ।
कार्यकारणभावे कारणे साध्ये कार्यहेतुर्वक्तव्यः ।
कार्यकारणभावमें कारणके साध्य होनेपर कार्यको हेतु कहना चाहिये ।