न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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तृतीय परिच्छेद
त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम् ।
त्रिरूपलिङ्गका कहना परार्थानुमान है ।
कारणे कार्योपचारात् ।
क्योंकि यहाँ कारणमें कार्यका उपचार किया जाता है ।
( त्रिरूपलिङ्ग के कहने से त्रिरूपलिङ्गकी स्मृति उत्पन्न होती है । स्मृति से अनु-
मान होता है । अतएव त्रिरूपलिङ्ग का कहना अनुमान का परम्परासे कारण है । उस
कारणवचनमें कार्यानुमान का उपचार ( समारोप ) किया जाता है ।
सहकारी आदि होनेके कारणसे अतद्भाव ( जो उस स्वरूप न हो ) में तद्वत्
( उसी स्वरूप के समान ) के कहनेको उपचार कहते हैं । )
तद् द्विविधं प्रयोगभेदात् ।
परार्थानुमान के प्रयोग के भेद से दो भेद होते हैं—
साधर्म्यवद्वैधर्म्यवच्चेति ।
साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् ।
नानयोरर्थतः कश्चिद् भेदोऽन्यत्र प्रयोगभेदात् ।
इन दोनोंमें भेद केवल प्रयोगसे ही है अर्थ से कुछ भी नहीं है ।
तत्र साधर्म्यवदनुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नोपलभ्यते
सोऽसद्व्यवहारविषयः सिद्धः ।
उसमें से साधर्म्यवत्—
जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह असद्व्यवहारका
विषय होता है ( अर्थात् उसका अभाव होता है ) । यह सिद्ध है ।
यथान्यः कश्चिद् दृष्टः शशविषाणादिः¹।
जैसे खरहे के सींग आदि कोई अन्य (साध्यधर्मी से) दृष्ट (प्रमाण से निश्चित) है ।
नोपलभ्यते च क्वचित्प्रदेशविशेष उपलब्धि-
लक्षणाप्राप्तो घट इति ।
[ दृश्यानुपलम्भके पक्षधर्मत्वको दिखलाते हुए कहते हैं— ]
किसी प्रदेशविशेष में उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट उपलब्ध नहीं होता ।
तथा स्वभावहेतोः प्रयोगः—
यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति ।
१. पीटर्सन संस्करण में 'शशविषाणादि' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसे अगले वाक्य
में मिलाकर '–विषाणादिर्नोप०–' कर दिया है ।