न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ भाषाटीका सहित
वैधर्म्यवतः प्रयोगो यत्समुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एव ।
यथा नीलादिविशेषः । न चैवमिहोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्य सत उप-
लब्धिर्घटस्येत्यनुपलब्धिप्रयोगः ।
वैधर्म्यवत् का प्रयोग—
जो सत् और उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता है वह अवश्य उपलब्ध होता है । जैसे—
नील आदि विशेष । उसी प्रकार यहाँ उपलब्धिलक्षणप्राप्त सत् घटकी उपलब्धि नहीं
है । अतएव यह अनुपलब्धि प्रयोग है ।
असत्यनित्यत्वे नास्ति सत्त्वमुत्पत्तिमत्त्वं कृतकत्वं वा ।
असच्च शब्द उत्पत्तिमान्कृतको वेति स्वभावहेतोः प्रयोगः ।
[ स्वभावहेतुके वैधर्म्यप्रयोगको कहते हैं—]
अनित्यत्व ( साध्य ) का अभाव होने पर भी सत्त्व, उत्पत्तिमत्त्व अथवा कृतकत्व नहीं
हो सकते । शब्द असत् होते हुए भी उत्पत्तिमान् तथा कृतक होता है, यह स्वभावहेतु
का प्रयोग है ।
असत्यग्नौ न भवत्येव धूमोऽत्र चास्तीति कार्यहेतोः प्रयोगः ।
अग्नि के न होने पर धूम भी नहीं होता, उसी प्रकार यहाँ है । ( अर्थात् अग्निके
न होनेसे धूम नहीं है ) । यह कार्यहेतु का प्रयोग है ।
साधर्म्येणापि हि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिरिति । असति
तस्मिन्साध्येनं हेतोरन्वयाभावात् ।
साधर्म्य ( अन्वय ) के प्रयोगसे वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) अर्थात् ही आ जाता है ।
क्योंकि व्यतिरेकके अभावमें हेतुका साध्यसे अन्वय न हो सकेगा ।
( व्याप्तिके दो भेद हैं । एक अन्वयव्याप्ति, दूसरी व्यतिरेकव्याप्ति । एकके होने
पर दूसरे का नियमसे होना अन्वय है । जैसे—धूमके सद्भावमें अग्निका सद्भाव अवश्य
होनेके कारण धूमका अग्निके साथ अन्वय है । एकके न होने पर दूसरेका भी
नियमसे न होना व्यतिरेक है । जैसे—अग्निके अभावमें धूम का अभाव ।
तथा वैधर्म्येणाप्यन्वयगतिः । असति तस्मिन्साध्यो-
भावे हेत्वभावस्यासिद्धेः ।
उसी प्रकार वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) से भी अन्वय स्वयं ही आ जाता है । क्योंकि
अन्वयके न होनेपर साध्यके अभावमें हेतुका अभाव भी सिद्ध न होगा ।
१. पीटर्सन संस्करण में 'साध्ये न' पाठ है । संस्कृत टीका में भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।
२. पीटर्सन संस्करण में 'साध्यभावे' पाठ है । संस्कृत टीकामें भी यही कर दिया गया है ।
किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है ।