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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
वस्थानं सिध्यति-अयं गौरयमश्व इति, नागृह्यमाणायाम् । यस्य ग्रहणात् सत्त्व-
व्यवस्थानं सिद्धयति तं शब्दोऽभिधातुमर्हति, सोऽस्यार्थ इति ।
नैतदुपपद्यते; यस्य जात्या योगस्तत्र जातिविशिष्टमभिधीयते-गौरिति ।
न चावयव्यूहस्य जांत्या योगः, कस्य तर्हि ? नियतावयव्यूहस्य द्रव्यस्य ।
तस्मान्नाकृतिः पदार्थः ॥ ६५ ॥
जातिवादः
अस्तु तर्हि जातिः पदार्थः-
व्यक्त्याकृतियुक्तेऽप्यप्रसङ्गात् प्रोक्षणादीनां मृद्गवके जातिः ? ॥ ६६ ॥
जातिः पदार्थः । कस्मात् ? व्यक्त्याकृतियुक्तेऽपि मृद्गवके प्रोक्षणादीनाम-
प्रसङ्गादिति । गां प्रोक्षय, गामानय, गां देहीति नैतानि मृद्गवके प्रयुज्यन्ते ।
कस्मात् ? जातेरभावात् । अस्ति हि तत्र व्यक्तिः, अस्त्याकृतिः, यदभावात्
तत्रासम्प्रत्ययः स पदार्थ इति ? ॥ ६६ ॥
न, आकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वाज्जात्यभिव्यक्ते ॥ ६७ ॥
जातेरभिव्यक्तिराकृतिव्यक्ती अपेक्षते, नागृह्यमाणायामाकृतौ व्यक्तौ च
जातिमात्रं शुद्धं गृह्येत, तस्मान्न जातिः पदार्थ इति ? ॥ ६७ ॥
कहलाता है । उस आकृति के गृहीत होने पर 'यह गौ हैं', 'यह अश्व हैं'-ऐसी सत्त्व-
व्यवस्था उपपन्न हो सकती है; आकृति के अगृहीत होते हुए उक्त व्यवस्था उपपन्न नहीं
हो सकती । जिसके ग्रहण से उक्त सत्त्वव्यवस्थान सिद्ध होता हो, उसीको शब्द कहे-
यही उचित है । वही उसका अर्थ है। अतः आकृति को पदार्थ मान लें ?
आपका यह मतस्थापन उचित नहीं; क्योकि जिसका जाति से सम्बन्ध है वही यहां
जातिविशिष्ट होकर अभिहित किया जाता है; जैसे-'गौ' । अवयव्यूहात्मक आकृति
का जाति से योग नहीं होता; अपितु नियतावयव्यूह द्रव्य का योग बनता है । अतः
आकृति पदार्थ नहीं है-यह सिद्ध हो गया ॥ ६५ ॥
तो जाति को ही पदार्थ मान लें-
गौ की मिट्टी की मूर्ति में व्यक्ति तथा आकृति होते हुए भी प्रोक्षण ( बलि ) आदि
की प्रसक्ति न होने से जाति ही पदार्थ है ? ॥ ६६ ॥
जाति पदार्थ हैं; क्योंकि व्यक्त्याकृतियुक्त होने पर भी मृत्तिका-मूर्ति में प्रोक्षण आनय-
नादि की प्रसक्ति नहीं होती । 'गौ का प्रोक्षण करो', 'गौ लाओ', 'गौ दो'-ये व्यवहार
मिट्टी की मूर्ति में नहीं बनते, क्योंकि वहाँ जाति नहीं है; यद्यपि वहाँ व्यक्ति भी है, आकृति
भी है । जिसके अभाव से वहाँ उपर्युक्त ज्ञान नहीं हो पाता, वही पदार्थ हैं ? ॥ ६६ ॥
नहीं; आकृति तथा व्यक्ति की अपेक्षा लेकर जाति के सिद्ध होने से ॥ ६७ ॥
जाति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति तथा आकृति की अपेक्षा रखती है । आकृति तथा
व्यक्ति के गृहीत हुए बिना जाति एकाकी गृहीत नहीं हो पाती; अतः जाति पदार्थ
नहीं है ॥ ६७ ॥-

सूत्र में 'तु' शब्द तीनों की विशिष्टता के बोध के लिये है । क्या विशेष बोध होता

६८. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७३
सिद्धान्तवादः
न वै पदार्थेन न भवितुं शक्यम्, कः खल्विदानीं पदार्थ इति ?
व्यक्त्याकृतिजातयस्तु पदार्थः ॥ ६८ ॥
तुशब्दो विशेषणार्थः । किं विशिष्यते ? प्रधानाङ्गभावस्यानियमेन पदार्थ-
त्वमिति । यदा हि भेदविवक्षा विशेषगतिश्च, तदा व्यक्तिः प्रधानम्, अङ्गं तु
जात्याकृती । यदा तु भेदोऽविवक्षितः सामान्यगतिश्च, तदा जातिः प्रधानम्,
अङ्गं तु व्यक्त्याकृती । तदेतद् बहुलं प्रयोगेषु । आकृतेस्तु प्रधानभाव
उत्प्रेक्षितव्यः १ ॥ ६८ ॥
कथं पुनज्ञायिते-नाना व्यक्त्याकृतिजातय इति ? लक्षणभेदात् । तत्र तावत्-
व्यक्तिर्गुणविशेषाश्रयो मूर्तिः ॥ ६९ ॥
व्यज्यत इति व्यक्तिरिन्द्रियग्राह्येति, न सर्वं द्रव्यं व्यक्तिः । यो गुण-
विशेषाणां स्पर्शान्तानां गुरुत्वघनत्वसंस्काराणामव्यापिनः परिमाणस्याश्रयो
यथासम्भवं तद् द्रव्यं मूर्तिः, मूच्छितावयवत्वादिति ॥ ६९ ॥
आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ॥ ७० ॥
तीनों के न मानने से तो पदार्थ ही न बनेगा; अब किसको पदार्थ कहें ?—
व्यक्ति, आकृति, जाति मिलकर पदार्थ हैं ॥ ६८ ॥
सूत्र में 'तु' शब्द तीनों की विशिष्टता के बोध के लिये है । क्या विशेष बोध होता
है ? इन तीनों में प्रधान-गुणभाव के अनियम से पदार्थत्व रहता है । जब पदार्थ में
भेदविवक्षा तथा विशेष ज्ञान कराना हो तो वहां व्यक्ति प्रधान है; जाति, आकृति गौण
रहेंगी । जब पदार्थ में भेद अविवक्षित हो, सामान्य ज्ञान कराना हो तब जाति प्रधान
होगी; और व्यक्ति, आकृति गौण रहेंगी। लोक में प्रायः जाति एवं व्यक्ति में प्रयोग
देखा जाता है । आकृति-प्राधान्य के उदाहरण ( मृद्गवकादि ) की भी उत्प्रेक्षा कर
लेनी चाहिये ॥ ६८ ॥
यह कैसे ज्ञात होता है व्यक्ति, आकृति, जाति भिन्न-भिन्न हैं ? लक्षणभेद से ज्ञात
हो जाता है । उन लक्षणों में—
गुणविशेषाश्रित द्रव्य 'व्यक्ति' कहलाता है ॥ ६९ ॥
जो व्यक्त होता हो, अर्थात् इन्द्रियग्राह्य हो वही 'व्यक्ति' कहलाता है, न कि समग्र
द्रव्य । जो स्पर्शान्त गुणविशेषों तथा गुरुत्व, घनत्व, द्रवत्व संस्कारों एवं अव्यापि
परिमाण का यथासम्भव आश्रय हो, वह द्रव्य मूर्ति कहलाता है; क्योंकि उसके अवयव
परस्पर संयुक्त हैं ॥ ६९ ॥
जिससे जाति, तथा उसके लिङ्ग प्रख्यात हो वह 'आकृति' है ॥ ७० ॥
१. अस्मिन् सूत्रार्थे वार्त्तिककारस्यारुचिर्वार्त्तिक एव द्रष्टव्या ।

१७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० ७१. सू० ]
यया जातिर्जातिलिङ्गानि च प्रख्यायन्ते तामाकृतिं विद्यात् । सा च नान्या
सत्त्वावयवानां तदवयवनां च नियताद् व्यूहादिति । नियतावयव्यूहाः खलु
सत्त्वावयवा जातिलिङ्गम्, शिरसा पादेन गामनुमिन्वन्ति । नियते च सत्त्वा-
वयवानां व्यूहे सति गोत्वं प्रख्यायत इति । अनाकृतिव्यङ्ग्यायां जातौ मृत्,
सुवर्णम्, रजतम्-इत्येवमादिष्वाकृतिर्निवर्तते, जहाति पदार्थत्वमिति ॥ ७० ॥
समानप्रसवात्मिका जातिः ॥ ७१ ॥
या समानां बुद्धिं प्रसूते, भिन्नेष्वधिकरणेषु यया बहूनीतरेतरतो न
व्यावर्तन्ते । योऽर्थोऽनेकत्र प्रत्ययानुवृत्तिनिमित्तं तत्सामान्यम् । यच्च केषाञ्चिद-
भेदं कुतश्चिद् भेदं करोतीति तत् सामान्यविशेषो जातिरिति ॥ ७१ ॥
इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम्
❀ समाप्तश्चायं द्वितीयोऽध्यायः ❀
जिससे जाति, तथा जाति के चिह्न ज्ञात हों उसे 'आकृति' समझना चाहिये । वह
आकृति सत्त्वावयव ( शिरःपादादि ) तथा तदवयवों ( मुखखुरादि ) के नियत व्यूह से
ही जानी जाती है । सत्त्व के अवयव नियतावयव्यूह होने से जाति के ज्ञापक हैं । शिर
और पैर से गौ का अनुमान करते हैं, प्राण्यङ्गों की बनावट के नियत होने पर गोत्व
जाति का ज्ञान होता है । अनाकृतिव्यङ्ग्य गिट्टी, सोना, चाँदी आदि जातिद्रव्यों में
आकृति निवृत्त हो जाती है, वह पदार्थत्व को छोड़ देती है ॥ ७० ॥
जाति विभिन्न आश्रयों में समान बुद्धि पैदा करनेवाली होती है ॥ ७१ ॥
जो भिन्न अधिकरणों में समान बुद्धि पैदा करे, वह 'जाति' कहलाती है । जहाँ बहुत
से एक दूसरे से व्यावृत्त न होते हों । जो अर्थ अनेक स्थानों में ज्ञानानुवर्तन ( प्रतीति की
अनुवृत्ति कराने का) निमित्त हो वह 'जाति' कहलाता है । तथा जो किन्हीं पदार्थों की का
प्रतीति करके उन्हीं का कहीं से भेद ( व्यावृत्ति ) करे वह 'जातिविशेष'
कहलाता है ॥ ७१ ॥
वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में द्वितीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त
❀ द्वितीय अध्याय भी समाप्त ❀

इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ]

अथ तृतीयोऽध्यायः
[ प्रथममाह्निकम् ]
इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ]
परीक्षितानि प्रमाणानि, प्रमेयमिदानीं परीक्ष्यते । तच्चात्मादीत्यात्मा
विविच्यते—किं देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनासङ्घातमात्रमात्मा ? आहोस्वित् तद्व्यति-
रिक्त इति ? । कुतस्ते संशयः ? व्यपदेशस्योभयथा सिद्धेः । क्रियाकरणयोः
कर्त्रा सम्बन्धस्याभिधानं व्यपदेशः । स द्विविधः—अवयवेन समुदायस्य—
मूलैर्वृक्षस्तिष्ठति, स्तम्भैः प्रासादो ध्रियते इति । अन्येनान्यस्य व्यपदेशः—
परशुना वृश्चति, प्रदीपेन पश्यति । अस्ति चायं व्यपदेशः—चक्षुषा पश्यति,
मनसा विजानाति, बुद्ध्या विचारयति, शरीरेण सुखदुःखमनुभवतीति । तत्र
नावधार्यते—किमवयवेन समुदायस्य देहादिसङ्घातस्य ? अथान्येनान्यस्य तद्व्य-
तिरिक्तस्य वेति ?
अन्येनायमन्यस्य व्यपदेशः । कस्मात् ?
दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ १ ॥
प्रमाणों की परीक्षा हो चुकी, अब प्रमेयों की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है । उन
प्रमेयों में आत्मा प्रधान है, अतः सर्वप्रथम आत्मा के वारे में ही विवेचन किया जा रहा
है । क्या देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वेदना—इनका समूहमात्र 'आत्मा' है ? या इनसे
भिन्न कोई आत्मा है ? यह संशय क्यों हुआ ? लोक में उक्त दोनों ही प्रकारों में
व्यपदेश ( व्यवहार ) देखा जाता है । क्रिया तथा करण से कर्त्ता के सम्बन्धकथन को
'व्यपदेश' कहते हैं । वह दो प्रकार का है—१. अवयव से समुदाय का व्यपदेश, जैसे—
'जड़ के कारण वृक्ष खड़ा है' या 'स्तम्भों के कारण महल खड़ा है' आदि; तथा २ दूसरे
से दूसरे का व्यपदेश, जैसे—'परशु द्वारा काटता है' 'दीपक द्वारा देखता है' आदि ।
इसमें समुदाय एवं समुदायि का सम्बन्ध नहीं है । कर्त्ता एवं करण पृथक् हैं । प्रकृत में
यह व्यपदेश होता है—'चक्षु से देखता है', 'मन से समझता है', 'बुद्धि से विवेचन करता
है', 'शरीर से सुख दुःख का अनुभव करता है'—आदि । यहाँ यह निश्चय नहीं हो
पाता कि अवयव से देहादिसङ्घात का व्यपदेश है, या अन्य से अन्य का व्यपदेश ?
यह अन्य से अन्य का व्यपदेश है; क्योंकि—
दर्शन, स्पर्शन द्वारा एक ही पदार्थ का ग्रहण होता है ॥ १ ॥

१७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
दर्शनेन कश्चिदर्थो गृहीतः, स्पर्शनेनापि सोऽर्थो गृह्यते—'यमहमद्राक्षं चक्षुषा
तं स्पर्शनेनापि स्पृशामीति, यं चास्पाक्षं स्पर्शनेन तं चक्षुषा पश्यामि' इति ।
एकविषयौ चेमौ प्रत्ययावेककर्तृकौ प्रतिसन्धियेते, न च सङ्घातकर्तृकौ, नेन्द्रियेणै-
ककर्तृकौ । तद्योऽसौ चक्षुषा त्वगिन्द्रियेण चैकार्थस्य ग्रहीता भिन्ननिमित्ताव-
नन्यकर्तृकौ प्रत्ययौ समानविषयौ प्रतिसन्दधाति, सोऽर्थान्तरभूत आत्मा ।
कथं पुनर्नेन्द्रियेणैककर्तृकौ ? इन्द्रियं खलु स्वस्वविषयग्रहणमनन्यकर्तृकं
प्रतिसन्धातुमर्हति, नेन्द्रियान्तरस्य विषयान्तरग्रहणमिति । कथं न सङ्घात-
कर्तृकौ ? एकः खल्वयं भिन्ननिमित्तौ स्वात्मकर्तृकौ प्रत्ययौ प्रतिसंहितौ वेदयते,
न सङ्घातः । कस्मात् ? अनिवृत्तं हि सङ्घाते प्रत्येकं विषयान्तरग्रहणस्याप्रति-
सन्धानमिन्द्रियान्तरेणेवेति ॥ १ ॥
न, विषयव्यवस्थानात् ? ॥ २ ॥
न देहादिसङ्घातादन्यश्चेतनः । कस्मात् ? विषयव्यवस्थानात् । व्यवस्थित-
विषयाणीन्द्रियाणि—चक्षुष्यसति रूपं न गृह्यते, सति च गृह्यते । यच्च यस्मिन्न-
दर्शन ( चक्षुरिन्द्रिय ) द्वारा जो अर्थ गृहीत हुआ, वही स्पर्शन ( त्वगिन्द्रिय ) से
भी गृहीत होता है, जैसे—'जिसको मैंने पहले आंखों देखा था आज उसे मैं छू भी रहा
हूँ' या 'जिसको मैं पहले कभी छू पाया था उसे आज आँखों देख रहा हूँ'—ये दोनों ज्ञान
एकविषय तथा एककर्तृक प्रतिगृहीत होते हैं, न कि सङ्घातकर्तृक या इन्द्रियविशेष द्वारा
एककर्तृक हो सकते हैं । यह जो एक है और चक्षु एवं त्वगिन्द्रिय से एकार्थ का ग्रहण
करता है वह प्रमाता 'ये दोनों ज्ञान भिन्नेन्द्रियनिमित्तक अनन्यकर्तृक ( आत्मकर्तृक )
तथा समानविषय वाले हैं'—ऐसा प्रतिसन्धान करता है । वह अन्य अर्थ आत्मा है ।
इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक क्यों नहीं ? इन्द्रियाँ अनन्यकर्तृक स्वस्वविषयक ज्ञान
की उत्पादक हो सकती हैं, न कि इन्द्रियान्तर के विषयान्तर के ज्ञान की । सङ्घातकर्तृक
क्यों नहीं ? यह एक ही व्यक्ति भिन्न इन्द्रियों के निमित्त वाले स्वात्मकर्तृक दो ज्ञानों
का अनुसन्धान कर सकता है, यह सङ्घात नहीं हैं; क्योंकि एक सङ्घात दूसरे विषय का
ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता, किंतु अपने-अपने विषय का ग्रहण करने में समर्थ है ।
अतः इससे भी परस्पर भिन्न इन्द्रिय की तरह से अननुसन्धान ही रहेगा ? ॥ १ ॥
शंका—
अन्य चेतन की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से ही काम चल
जायेगा ? ॥ २ ॥
देहादिसङ्घात से अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के
विषयनियम से व्यवस्था बन जायेगी । इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं—चक्षु के न
रहने पर रूप का ग्रहण नहीं होता, उसके रहने पर होता है । जो जिसके न होने पर

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७
सति न भवति सति भवति, तस्य तदिति विज्ञायते । तस्माद् रूपग्रहणं चक्षुषः,
चक्षू रूपं पश्यति । एवं घ्राणादिष्वपीति । तानीन्द्रियाणीमानि स्वस्वविषय-
ग्रहणाच्चेतनानि; इन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावात् । एवं
सति किमन्येन चेतनेन ?
सन्दिग्धत्वादहेतुः । योऽयमिन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावः,
स किमयं चेतनत्वात् ? आहोस्वित् चेतनोपकरणानां ग्रहणनिमित्तत्वात् ? इति
सन्दिह्यते । चेतनोपकरणत्वेऽपीन्द्रियाणां ग्रहणनिमित्तत्वाद् भवितुमर्हति ॥ २ ॥
यच्चोक्तम्—विषयव्यवस्थानादिति ?
तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥
यदि खल्वेकमिन्द्रियमव्यवस्थितविषयं सर्वज्ञं सर्वविषयग्राहि चेतनं स्यात्,
कस्ततोऽन्यं चेतनमनुमातुं शक्नुयात् ? यस्मात्तु व्यवस्थितविषयाणीन्द्रियाणि,
तस्मात् तेभ्योऽन्यश्चेतनः सर्वज्ञः सर्वविषयग्राही विषयव्यवस्थितिमतीतोऽनु-
मीयते । तत्रेदमभिज्ञानमप्रत्याख्येयं चेतनवृत्तमुदाह्रियते—रूपदर्शी खल्वयं
नहीं होता और जिसके होने पर होता है, वह उसका विषय होता है । इसलिये रूपज्ञान
चक्षु का विषय है; क्योंकि चक्षु रूप को देखता है । इसी तरह घ्राणादि के विषय में भी
समझ लेना चाहिये । ये सभी इन्द्रियाँ अपने विषय का ज्ञान करनेवाली हैं, अतः 'चेतन'
हैं; क्योंकि इन्द्रियों के भावाभाव से उनके विषयों के ग्रहण का भावाभाव होता है । अतः
दूसरा चेतन मानने की क्या आवश्यकता ?
उत्तर—सन्दिग्ध होने से वह हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि यह जो इन्द्रियों के .
भावाभाव से विषयज्ञान का तथात्व है, वह क्या चेतन होने से है, या चेतन कर्ता के
सहकारि कारण होने से ज्ञान का निमित्त है—यह सन्देह होता है । चेतन का उपकरण
होने पर भी, इन्द्रियों के ग्रहणनिमित्त ( ज्ञानसाधन ) होने से उक्त व्यवस्था हो
सकती है ॥ २ ॥
यह जो कहा कि विषयव्यवस्था से ? यह हेतु भी असिद्ध है; क्योंकि—
तद्व्यवस्थान से आत्मा की सत्ता सिद्ध होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ३ ॥
यदि एक ही इन्द्रिय अव्यवस्थित विषय होती हुई सर्वज्ञरूप में सब विषयों का ग्रहण
करनेवाली चेतन होती तो उससे भिन्न चेतन का अनुमान कोई क्यों करे ! चूंकि इसके
विपरीत, इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं, अतः उनसे एक अन्य सर्वज्ञ, सर्वविषयग्राही,
विषयव्यवस्था की परिधि के बाहर चेतन की सत्ता का अनुमान किया जाता है । चेतन
की सत्ता को प्रमाणित करने के लिये यह दृढ़ प्रत्यभिज्ञान ( असाधारण चिह्न )
उदाहृत किया जा सकता है—'जिसने पहले रूप को देखा था, वही अब पूर्वगृहीत रस या
न्या० द० : १२

१७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
रसं गन्धं वा पूर्वगृहीतमनुमिनोति, गन्धप्रतिसंवेदी च रूपरसावनुमिनोति । एवं
विषयशेषेष्वपि वाच्यम्। रूपं दृष्ट्वा गन्धं जिघ्रति, घ्रात्वा च गन्धं रूपं पश्यति ।
तदेवमनियतपर्यायं सर्वविषयग्रहणमेकचेतनाधिकरणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धत्ते,
प्रत्यक्षानुमानागमसंशयान् प्रत्ययांश्च नानाविषयान् स्वात्मकर्तृकान् प्रतिसन्द-
धाति, प्रतिसन्धाय वेदयते । सर्वविषयं च शास्त्रं प्रतिपद्यते । अर्थमविषयभूतं
श्रोत्रस्य क्रमभाविनो वर्णान् श्रुत्वा पदवाक्यभावेन प्रतिसन्धाय शब्दार्थव्यवस्थां
च बुध्यमानोऽनेकविषयमर्थजातमग्रहणीयमेकैकेनेन्द्रियेण गृह्णाति । सेयं सर्वज्ञस्य
ज्ञेयाव्यवस्थाऽनुपदं न शक्या परिक्रमितुम् । आकृतिमात्रं¹ तूदाहृतम् । तत्र यदु-
क्तम्—'इन्द्रियचैतन्ये सति किमन्येन चेतनेन', तदयुक्तं भवति ॥ ३ ॥
शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ ४-६ ]
१. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा, न देहादिसङ्घातमात्रम्;
शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥
शरीरग्रहणेन शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनासङ्घातः प्राणिभूतो गृह्यते, प्राणिभूतं
गन्ध का ज्ञान कर रहा है, गन्धप्रतिसंवेदी रूप-रस का अनुमान कर रहा है'। इसी तरह
अन्य विषयों के बारे में कहना चाहिये—यह रूप को देखकर गन्ध सूंघता है, गन्ध
सूंघकर रूप को देखता है । इस प्रकार प्रमाता अनियतक्रम सर्वविषय-ज्ञान को एक चेतन
के आश्रय से तथा एककर्तृक रूप में प्रतिसन्धान करता है; प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द तथा
संशयों को एवं नानाविषयक ज्ञानों को एककर्तृक रुप में प्रतिसन्धान करता है, वैसा
करके जान लेता है, सर्वविषयक शास्त्र को जान लेता है ! प्रमाता श्रोत्र के अगोचर अर्थ
को, क्रमभावी वर्णों को, सुनकर पदवाक्यभाव में प्रतिसन्धान करके शब्दार्थव्यवस्था को
समझता हुआ एक ही इन्द्रिय से ग्रहण न करने योग्य अनेकविषयक अर्थों को एक-एक
इन्द्रिय से ग्रहण करता है । सर्वज्ञ की यह ज्ञेयव्यवस्था किसी भी तरह अतिक्रान्त नहीं
की जा सकती । यों हमने सामान्यतः यह एक उदाहरण दे दिया है । अतः आप
(पूर्वपक्षी—चार्वाकमतानुयायी) का यह कहना—'इन्द्रियचैतन्य के रहते अन्य चेतन
मानने की आवश्यकता नहीं'—सर्वथा आयुक्त है ॥ ३ ॥
१. इस कारण भी देहादिसङ्घात नहीं, अपितु देहादिव्यतिरिक्त ही आत्मा हैं;
शरीर-दाह में पातक न होने से ॥ ४ ॥
सूत्र में 'शरीर' से शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदनासमूहरूप प्राणी से तात्पर्य है । शास्त्र
में प्राणमय शरीर को जलाने में प्राणिहिंसा कृत पाप 'पातक' कहा गया है (केवल शरीर
१. 'सामान्यमात्रमित्यर्थः' । तदेतच्चेतनवृत्तं देहादिभ्यो व्यावर्तमानं तदतिरिक्तं
चेतनं साधयतीति नेच्छाद्याधारत्वं देहादीनाम्' इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः ।

५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९

५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९
शरीरं दहतः प्राणिहिंसाकृतपापं पातकमित्युच्यते, तस्याभावः, तत्फलेन
कर्तुरसम्बन्धात्, अकर्तुश्च सम्बन्धात् । शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनाप्रबन्धेन खल्वन्यः
सङ्घात उत्पद्यते, अन्यो निरुध्यते । उत्पादनिरोधसन्ततिभूतः प्रबन्धो नान्यत्वं
बाधते; देहादिसङ्घातस्यान्यत्वाधिष्ठानत्वात् । अन्यत्वाधिष्ठानो ह्यसौ प्रख्या-
यत इति । एवं च सति यो देहादिसङ्घातः प्राणिभूतो हिंसां करोति, नासौ
हिंसाफलेन सम्बध्यते; यश्च सम्बध्यते न तेन हिंसा कृता । तदेवं सत्त्वभेदे कृत-
हानमकृताभ्यागमः प्रसज्यते । सति च सत्त्वोत्पादे, सत्त्वनिरोधे चाकर्मनिमित्तः
सत्त्वसर्गः प्राप्नोति, तत्र मुक्त्यर्थो ब्रह्मचर्यवासो न स्यात् । तद्यदि देहादिसङ्घात-
मात्रं सत्त्वं स्यात्, शरीरदाहे पातकं न भवेत् ! अनिष्टं चैतत् । तस्माद् 'देहादि-
सङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा नित्यः' इति ॥ ४ ॥
तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि; तन्नित्यत्वात् ? ॥ ५ ॥
यस्यापि नित्येनात्मना सात्मकं शरीरं दह्यते, तस्यापि शरीरदाहे पातकं न
भवेद्दग्धुः । कस्मात् ? नित्यत्वादात्मनः । न जातु कश्चिन्नित्यं हिंसितुमर्हति,
अथ हिंस्यते ? नित्यत्वमस्य न भवति । सेयमेकस्मिन् पक्षे हिंसा निष्फला, अन्य-
स्मिंस्त्वनुपन्नेति ? ॥ ५ ॥
को जलाने से पातक नहीं लगता ) उसका अभाव होगा; क्योंकि उस फल से कर्ता का
सम्बन्ध नहीं अकर्ता का सम्बन्ध रहता है । शरीर-इन्द्रिय-बुद्धि-वेदना-प्रवाह से अन्य
सङ्घातात्मक शरीर दूसरा उत्पन्न होता है, वह फलभोक्ता है । अन्य सङ्घात निरुद्ध
( मृत ) होता है, उत्पादनिरोधरूप प्रवाह देह के अन्यत्व का बाध, देहादिसङ्घात में
ही अन्यत्व का अधिष्ठान ( भेदाधारत्व ) होने से, नहीं कर सकता । यह देहेन्द्रियादि-
सङ्घात अन्यत्व का अधिष्ठान प्रसिद्ध है'—इस मत में जो प्राणिभूत देहादिसंघात हिंसा
करता है, वह हिंसा के पातक से सम्बद्ध नहीं होगा, तथा जिसने हिंसा नहीं की उसे
वह पातक लगेगा—इस तरह आपके पक्ष में कृतहान ( कर्ता के नाश से कृत फल का
असम्बन्ध) तथा अकृताभ्यागम दोष (अकर्ता को शरीरान्तर में अकृत फल की प्राप्ति)
होने लगेगी । और अकर्मनिमित्तक ही सत्त्वोत्पत्ति होने लगेगी, तब मोक्ष के लिये ब्रह्म-
चर्यादि की क्या जरूरत रह जायेगी ! अतः यह सिद्ध हुआ यदि देहादिसंघातमात्र को
प्राणी मानोगे तो शरीरदाह में पातक न होगा, जब कि यह शास्त्रविरुद्ध है । तस्मात्
'देहादिसंघातव्यतिरिक्त आत्मा है, तथा वह नित्य है'—यही मत उचित है ॥ ४ ॥
शंका—
सात्मक शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होगा; क्योंकि आत्मा नित्य है ? ॥ ५ ॥
जिसने नित्य आत्मा से संयुक्त शरीर जलाया है, उसके जलने पर भी जलाने वाले
को पाप नहीं लगना चाहिये; क्योंकि आत्मा तो नित्य है, नित्य को कभी कोई जला
सकता है ! यदि यह जल जाता है तो इसमें नित्यत्व कैसा ? इस प्रकार यह हिंसा (दोनों
पक्षों में से ) एक पक्ष में निष्फल है और दूसरे में तो बनेगी ही नहीं ? ॥ ५ ॥
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
न, कार्याश्रयकर्तृवधात् ॥ ६ ॥
न ब्रूम :—‘नित्यस्य सत्त्वस्य वधो हिंसा’, अपि त्वनुच्छित्तिधर्मकस्य
सत्त्वस्य कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणामुपघातः
पीडा, वैकल्यलक्षणः प्रबन्धोच्छेदो वा, प्रमापणलक्षणो वधो वा हिंसेति । कार्यं तु
सुखदुःखवेदनम्, तस्यायतनमधिष्ठानमाश्रयः शरीरम्; कार्याश्रयस्य शरीरस्य
स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणां वधो हिंसा, न नित्यस्यात्मनः । तत्र
यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्' इत्येतदयुक्तम् । यस्य
सत्त्वोच्छेदो हिंसा, तस्य कृतहानमकृताभ्यागमश्चेति दोषः ।
एतावच्चैतत् स्यात्—सत्त्वोच्छेदो वा हिंसा, अनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य
कार्याश्रयकर्तृवधो वा; न कल्पान्तरमस्ति । सत्त्वोच्छेदश्च प्रतिषिद्धः, तत्र किम-
न्यच्छेषं यथाभूतमिति ।
अथ वा¹—कार्याश्रयकर्तृवधादिति, कार्याश्रयो देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घातः,
नित्यस्यात्मानस्तत्र सुखदुःखप्रतिसंवेदनं तस्याधिष्ठानमाश्रयः तदायतनं तद्
भवति न ततोऽन्यदिति स एव कर्ता । तन्निमित्ता हि सुखदुःखवेदनस्य निर्वृत्तिः
उक्त प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि हम शरीर तथा तदाश्रयभूत इन्द्रियों के उच्छेद
को 'हिंसा' कहते हैं ॥ ६ ॥
हम ( आस्तिक दर्शनकार ) यह नहीं कहते कि नित्य द्रव्य का वध 'हिंसा' है,
अपितु अनुच्छिन्न हो कर रहने वाले धर्म के सम्बन्धी आत्मा के कार्याश्रय शरीर का,
तथा स्वविषयोपलब्धि की कर्ता इन्द्रियों का उपघात = पीड़ा, उनमें विकलता लाने
वाला प्रवाहविच्छेद या विनाशलक्षण वध हमारे मत में हिंसा है। यहाँ सुखदुःखसंवेदन
कार्य है, उसका अधिष्ठान = आश्रय शरीर है। ऐसे कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषय
ज्ञान को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों का वध 'हिंसा' है, न कि नित्य आत्मा का। अतः
पूर्वपक्षी ने 'सात्मक शरीरप्रदाह में भी पातक नहीं होता; क्योंकि आत्मा नित्य है'—
यह जो कहा था वह अयुक्तियुक्त है।
एक बात और है—सत्त्वोच्छेद को ही हिंसा माना जाय तो अकृताभ्यागम आदि
दोष हो सकता है। वह हम मानते नहीं, क्योंकि पूर्वपक्षी ने ही उसका खण्डन किया
है। अतः हिंसापदार्थ कोई दूसरा ही मानना चाहिये। हिंसा दो तरह से ही बन सकती
है—१. या तो सत्त्वोच्छेद को हिंसा माने; २. या फिर अनुच्छिन्नधर्मक के कार्याश्रयभूत
शरीर या इन्द्रियों के उच्छेद को हिंसा मानें। तीसरा कोई विकल्प नहीं। यहाँ सत्त्वो-
च्छेद का तो तुमने भी उसे नित्य मान कर प्रतिषेध ही कर दिया, अब दूसरे विकल्प
वाली हिंसा मानने के अतिरिक्त कौन मार्ग है ?
अथवा—'कार्याश्रयकर्तृवधात्' पद का व्याख्यान यों समझना चाहिये—कार्याश्रय
हुआ देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घात । शरीर में रहने वाले नित्य आत्मा के सुखदुःखप्रतिसंवेदन
कार्य हैं, अतः उनका सङ्घात अधिष्ठान है, वही संघात तदायतन है अन्यायतन नहीं,
१. वार्त्तिककर्तुरप्यत्रैव व्याख्यानपक्षे सम्मतिरिति ध्येयम् ।

८. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८१

८. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८१
न तमन्तरेणेति । तस्य वधः, उपघातः, पीडा, प्रमापणं वा = हिंसा, न नित्यत्वे-
नात्मोच्छेदः। तत्र यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्',
एतन्नेति ॥ ६ ॥
प्रासङ्गिकं चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् [ ७-१४ ]
२. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा;
सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥
पूर्वपरयोर्विज्ञानयोरेकविषये प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्—'तमेवैतर्हि
पश्यामि यमज्ञासिषं स एवायमर्थः' इति, सव्येन चक्षुषा दृष्टस्येतरेणापि चक्षुषा
प्रत्यभिज्ञानाद् 'यमद्राक्षं तमेवैतर्हि पश्यामि' इति । इन्द्रियचैतन्ये तु नान्यदृष्ट-
मन्यः प्रत्यभिजानातीति प्रत्यभिज्ञानुपपत्तिः । अस्ति त्विदं प्रत्यभिज्ञानम्, तस्मा-
दिन्द्रियव्यतिरिक्तश्चेतनः ॥ ७ ॥
नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ? ॥ ८ ॥
एकमिदं चक्षुर्मध्ये नासास्थिव्यवहितम्, तस्यान्तौ गृह्यमाणौ द्वित्वाभिमानं
प्रयोजयतो मध्यव्यवहितस्य दीर्घस्येव ? ॥ ८ ॥
अतः वही ( देहेन्द्रियसंधात ) कर्ता है, उक्त संवेदन की निवृत्ति तन्निमित्तक ही है, न
कि उसके बिना । अतः उस देहेन्द्रियसंधात का वध = उपघात, पीड़ा, हिंसा, प्रमापण
( प्राणवियोजन ) बन सकता है । नित्य आत्मा का उच्छेद नहीं बनता । यों, 'सात्मक
शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होता'—यह पूर्वपक्षी का कथन अयुक्तियुक्त ही है॥६॥
२. इस कारण भी आत्मा देहादि से व्यतिरिक्त है—
वाम चक्षु द्वारा देखे गये का दक्षिण चक्षु से प्रत्यभिज्ञान होने के कारण ॥ ७ ॥
पूर्व, पर के विज्ञान का एक विषय में प्रतिसन्धिज्ञान 'प्रत्यभिज्ञान' कहलाता है ।
जैसे—'अब मैं उसी अर्थ को देख रहा हूँ, जिसे मैंने पहले जान लिया था, यह वही
विषय है' । वायीं आँख द्वारा देखे गये का दूसरी (दाहिनी) आँख द्वारा 'जिसको मैंने पहले
देखा था अब उसीको देख रहा हूँ'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होने से । इन्द्रियचैतन्य मानने
पर इन्द्रियों में भिन्नत्व होने से अन्य इन्द्रिय द्वारा दृष्ट का अन्य इन्द्रिय प्रत्यभिज्ञान
नहीं कर सकती अतः, उक्त प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा । जब कि यह प्रत्यभिज्ञान होता है,
अतः यह सिद्ध है कि चेतन इन्द्रियों से व्यतिरिक्त है ॥ ७ ॥
उक्त प्रत्यभिज्ञान वास्तविक नहीं; अपितु एक चक्षुरिन्द्रिय में नासास्थि के व्यवधान
से द्वित्व का भ्रम हो जाता है ? ॥ ८ ॥
यह एक ही चक्षु, बीच में नासास्थि ( नाक की हड्डी ) के व्यवधान से उस की
दोनों कोटियों ( अन्तों ) के गृह्यमाण होने के कारण दो की तरह प्रमाता द्वारा प्रमित
होता है, जैसे—एक ही लम्बे बाँस के मध्यभाग को लेकर दो किनारों की कल्पना कर
लेते हैं ? ॥ ८ ॥

१८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
एकविनाशे द्वितीयाविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥
एकस्मिन्नुपहते चोद्धृते वा चक्षुषि द्वितीयमवतिष्ठते चक्षुर्विषयग्रहणलिङ्गम् ।
तस्मादेकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ९ ॥
अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ? ॥ १० ॥
एकविनाशे द्वितीयाविनाशादित्यहेतुः । कस्मात् ? वृक्षस्य हि कासुचिच्छा-
खासु छिन्नासूपलभ्यत एव वृक्षः ? ॥ १० ॥
दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥
न कारणद्रव्यस्य विभागे कार्यद्रव्यमवतिष्ठते; नित्यत्वप्रसङ्गात् । बहुष्वव-
यविषु यस्य कारणानि विभक्तानि तस्य विनाशः, येषां कारणान्यविभक्तानि
तानि अवतिष्ठन्ते ।
अथवा, दृश्यमानार्थविरोधो दृष्टान्तविरोधः । मृतस्य हि शिरःकपाले द्वाव-
वटौ नासास्थिव्यवहितौ चक्षुषः स्थाने भेदेन गृह्येते । न चैतदेकस्मिन्नासास्थि-
व्यवहिते सम्भवति ।
एक का विनाश होने पर भी अन्य विनाश न होने से एकत्वसिद्धि नहीं ॥ ९ ॥
एक चक्षु के नष्ट होने या निकाल लेने पर भी दूसरी रहती है; क्योंकि प्रमाता
उस समय भी दूसरी अवशिष्ट चक्षु से विषय को गृहीत करता हुआ देखा जाता है।
इसलिए 'नासिकास्थि के व्यवधान से वहाँ द्वित्वभ्रम हो रहा हैं'-ऐसा मानना
अयुक्तियुक्त है ॥ ९ ॥
शङ्का-( आपका उक्त हेतु भी नहीं बनता; क्योंकि )
लोक में अवयव के खण्डित होने पर भी अवयवी से काम चलता हुआ देखा जाता
है ? ॥ १० ॥
एक के नाश होने पर भी दूसरे का नाश नहीं होता—अतः आपका हेतु असिद्ध है।
जैसे वृक्ष की कुछ शाखाएँ काट दी जाने पर भी वह वृक्ष ही कहलाता है। तथा प्रमाता
को पूर्ववत् अर्थसाधन में कोई बाधा न होगी ? ॥ १० ॥
समाधान-
विरुद्ध दृष्टान्त देकर प्रतिषेध नहीं किया जा सकता ॥ ११ ॥
कारणद्रव्य के विभाग (विनाश) हो जाने पर कार्य द्रव्य की सत्ता नहीं रह जाती;
अन्यथा वह कार्य द्रव्य नित्य हो जायेगा । जहाँ बहुत से अवयवी हैं, उनमें जिसके
कारण नष्ट हो गये उसका नाश हो गया । जिनके कारण नष्ट नहीं हुए वे अवस्थित
रहते हैं। उक्त दृष्टा में 'पहले जैसा यह वृक्ष'-ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं; अपितु 'कटी
शाखा वाला वृक्ष'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होता है ।
अथवा, इस सूत्र का व्याख्यान यों है—यहाँ प्रत्यक्ष दृश्यमान अर्थ का विरोध होने
से 'दृष्टान्तविरोध' हो गया ! मृतक के कङ्कालस्थ शिरःकपाल में नासास्थि से व्यवहित

१३. सू० ] । चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८४

१३. सू० ] । चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८४
अथ वा, एकविनाशस्यानियमाद् द्वाविमावर्थौ, तौ च पृथगावरणोपघातौ
अनुमीयेते—विभिन्नाविति ।
अवपीडनाच्चैकस्य चक्षुषो रश्मिविषयसन्निकर्षस्य भेदाद् दृश्यभेद इव
गृह्यते, तच्चैकत्वे विरुध्यते । अवपीडननिवृत्तौ चाभिन्नप्रतिसन्धानमिति । तस्मा-
देकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ११ ॥
३. अनुमीयते चायं देहादिसङ्घातव्यतिरिक्तश्चेतन इति;
इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥
कस्यचिदम्लफलस्य गृहीततद्रससाहचर्ये रूपे गन्धे वा केनचिदिन्द्रियेण
गृह्यमाणे रसनस्येन्द्रियान्तरस्य विकारो रसानुस्मृतौ रसगद्ध्प्रिवृत्तितोदन्तोदक-
सम्प्लवभूतो गृह्यते । तस्येन्द्रियचैतन्येऽनुपपत्तिः, नान्यदृष्टमन्यः स्मरति ॥१२॥
न; स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ? ॥ १३ ॥
स्मृतिर्नाम धर्मो निमित्तादुत्पद्यते, तस्याः स्मर्त्तव्यो विषयः, तत्कृत इन्द्रिया-
चक्षु के दो छिद्र (गड्ढे) अलग-अलग देखे जाते हैं । चक्षु के एक मानने पर, नासास्थि
के व्यवधान से ये दो छिद्र कैसे होते !
अथवा—'एक का विनाश दूसरे की स्थिति या विनाश का नियामक नहीं होता'
इस सिद्धान्त से ये चक्षु दो हैं, इन दोनों के अपने पृथक्-पृथक् आवरण और विनाश हैं,
अतः अनुमान होता है कि ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं।
एक आंख को अंगुली से अवपीड़ित करने (कौंचने) पर उसी एक के रश्मिविषयक
सन्निकर्ष का भेद होने से सीमित मात्रा में दृश्यभेद (एक चांद के दो चांद दिखायी देना
आदि) दिखायी देता है, अवपीडन के निवृत्त होने पर वह भेद भी निवृत्त हो जाता है—
यह बात चक्षु के एकत्वसिद्धान्त में कैसे बनेगी । अतः एक में व्यवधानहेतु अनुपपन्न
ही है ॥ ११ ॥
३. इसलिए भी इस आत्मा का देहादिसङ्घात से पार्थक्य अनुमित होता है—
इन्द्रियान्तर में विकार होने से ॥ १२ ॥
किसी आम-इत्यादि खट्टे फल का पहले से रससाहचर्य गृहीत होने पर, किसी
अन्य इन्द्रिय द्वारा रूप या गन्ध के जान लेने के बाद इसकी अनुस्मृति होने पर दूसरी
इन्द्रिय रसना में अम्लरस की तृष्णा से जनित विकार (मुंह में पानी भर आना) देखा जाता
है । यह बात, इन्द्रियचैतन्य मानने पर कैसे बनेगी; क्योंकि अन्य द्वारा देखे गये का
अन्य कैसे स्मरण कर सकता है ! ॥ १२ ॥
शङ्का—
स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयक होने से उससे आत्मा का पार्थक्य सिद्ध नहीं होता ॥१३॥
स्मृति नामक धर्म अपने संस्कारकारण से उत्पन्न होता है, स्मर्त्तव्य उसका विषय
है । उक्त इन्द्रियान्तरविकार तत्स्मृतिप्रयुक्त है, आत्मकृत नहीं ? ॥ १३ ॥

१८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
न्तरविकारो नात्मकृत इति¹ ? ॥ १३ ॥
तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥
तस्या आत्मगुणत्वे सति सद्भावादप्रतिषेध आत्मनः । यदि स्मृतिरात्म-
गुणः ? एवं सति स्मृतिरुपपद्यते, नान्यदृष्टमन्यः स्मरतीति । इन्द्रियचैतन्ये तु
नानाकर्तृकाणां विषयग्रहणानामप्रतिसन्धानम्, अप्रतिसन्धाने वा विषयव्यवस्था-
नुपपत्तिः । एकस्तु चेतनोऽनेकार्थदर्शी भिन्ननिमित्तः पूर्वदृष्टमर्थं स्मरतीति एक-
स्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रतिसन्धानात् स्मृतेरात्मगुणत्वे सति सद्भावः, विपर्यये
चानुपपत्तिः । स्मृत्याश्रयाः प्राणभृतां सर्वे व्यवहाराः । आत्मलिङ्गम् उदाहरण-
मात्रमिन्द्रियान्तरविकार इति ।
अपरिसङ्ख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य² ।
अपरिसङ्ख्याय च स्मृतिविषयमिदमुच्यते 'न स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात्'
इति । येयं स्मृतिर्गृह्यमाणेऽर्थे 'अज्ञासिषमहममुमर्थम्' इति, एतस्या ज्ञातृज्ञानवि-
समाधान—
उस स्मृति को आत्म-धर्म मानने से आपकी शंका नहीं उठेगी ॥ १४ ॥
उस स्मृति को आत्मा का गुण मानते हैं, क्योंकि आत्मा स्मृति का समवाय सम्बन्ध
से आधार है । अतः स्मृति की सत्ता मानने पर आत्मा का प्रतिषेध नहीं बनता; क्योंकि
स्मृति को जब आत्मा का धर्म मानोगे तभी वह उसका धर्म बनेगी; अन्यथा अन्य दृष्ट
का अन्य स्मरण कैसे करेगा ! इन्द्रियचैतन्य मानने पर, नाना इन्द्रियों द्वारा गृहीत
विषयों का प्रतिसन्धान कैसे बनेगा ! प्रतिसन्धान न बनने पर विषय-व्यवस्था कैसे
बनेगी ! एक चेतन मान लेते हो तो वह अनेकार्थदर्शी है, भिन्ननिमित्त है, पूर्वदृष्ट अर्थ
को स्मरण कर लेता है, अतः अनेकार्थदर्शी का एक में दर्शनप्रतिसन्धान बन जाने से,
स्मृति के आत्मगुण मान लेने पर, स्मृति होने पर आत्मा को उस रस की अनुभूति होगी,
स्मृति न रहने पर नहीं होगी । क्योंकि सभी प्राणियों के व्यवहार स्मृत्याश्रित हैं । इन्द्रि-
यान्तरविकार का यह प्रयोजक स्मृतिरूप आत्मगुण एक उदाहरण दिखा दिया है, अन्य
उदाहरणों की उत्प्रेक्षा कर लेना चाहिये ।
स्मृतिविषय का परिकलन ( कर्त्ता, कर्म क्रिया का प्रतिसन्धान ) न होने से भी वह
आत्मा का ही गुण है ।
स्मृतिविषयों का परिकलन न करके भी आप कहते हैं—'स्मृति स्मर्त्तव्यविषया
होती है, न कि आत्मविषया'। वर्तमान में अगृह्यमाण अर्थ की 'यह अर्थ मैं जानता
१. 'स्मृतेरात्मा न कारणम्, तस्याः संस्कारकारणकत्वात्; न स्मृतेरात्मा विषयः,
स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात्; तस्मात् स्मृत्यादिविषयादिन्द्रियान्तरविकारो नात्मकृतः'—इति
शंकाकर्त्तुराशयः. २. इदं सूत्रमेवेति केचित् ।

१४. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८५

१४. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८५
शिष्टः पूर्वज्ञातोऽर्थो विषयो नार्थमात्रम्, 'ज्ञातवानहममुमर्थम्, असावर्थो मया ज्ञातः,
अस्मिन्नर्थे मम ज्ञानमभूत्' इति चतुर्विधमेतद्वाक्यं स्मृतिविज्ञापकं समानार्थम् ।
सर्वत्र खलु ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं च गृह्यते ।
अथ प्रत्यक्षेऽर्थे या स्मृतिस्तया त्रीणि ज्ञानानि एकस्मिन्नर्थे प्रतिसन्धीयन्ते
समानकर्तृकाणि, न नानाकर्तृकाणि, नाकर्तृकाणि, किं तर्हि ? एककर्तृकाणि-
'अद्राक्षममुमर्थं यमेवैतर्हि पश्यामि' । अद्राक्षमिति दर्शनं दर्शनसंविच्च, न खल्व-
संविदिते स्वे दर्शने स्यादेतत् 'अद्राक्षम्' इति, ते खल्वेते द्वे ज्ञाने; 'यमेवैतर्हि
पश्यामि' इति तृतीयं ज्ञानम्, एवमेकोऽर्थस्त्रिभिर्ज्ञानैर्यूज्यमानो नाकर्तृको न
नानाकर्तृकः, किं तर्हि ? एककर्तृक इति ।
सोऽयं स्मृतिविषयोऽपरिसङ्ख्यायमानो विद्यमानः प्रज्ञातोऽर्थः प्रतिषिध्यते-
'नास्त्यात्मा स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात्' इति । न चेदं स्मृतिमात्रं स्मर्तव्यमात्र-
विषयं वा। इदं खलु ज्ञानप्रतिसन्धानवद् स्मृतिप्रतिसन्धानम्; एकस्य सर्वविषय-
त्वात् । एकोऽयं ज्ञाता सर्वविषयः स्वानि ज्ञानानि प्रतिसन्धत्ते-अमुमर्थं ज्ञास्यामि,
अमुमर्थं विजानामि, अमुमर्थमज्ञासिषम्, अमुमर्थं जिज्ञासमानश्चिरमज्ञात्वाऽध्य-
था'—यह स्मृति अर्थमात्र नहीं; अपितु ज्ञातृज्ञानविशिष्ट पूर्वज्ञात अर्थ इसका विषय है।
'इस अर्थ को मैं जान चुका', 'यह अर्थ मेरे द्वारा जाना गया', 'इस विषय में मेरा ज्ञान
था'—ये चारों वाक्य स्मृतिविषयज्ञापक तुल्य ही हैं, अर्थात् उक्त चारों वाक्यों का
ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता तीनों का समान ज्ञान होता है।
एक बात और सुनिये—प्रत्यक्ष अर्थ की स्मृति में ज्ञानत्रय का एक साथ समान-
कर्तृक प्रतिसन्धान होता है, वे ज्ञान न तो नानाकर्तृक हैं न अकर्तृक ही; अपितु एक-
कर्तृक हैं। 'इस अर्थ को मैंने पहले भी देखा था जिसको कि अब देख रहा हूँ' यहाँ
'देखा था' यह दर्शन तथा दर्शनसंवित्—दो चीज एकत्र हैं; क्योंकि 'देखा था' यह
प्रत्यभिज्ञान असंविदित स्वदर्शन में नहीं हो सकता। यों, ये दो ज्ञान हुए। तीसरा ज्ञान
है 'जिसको कि मैं अब देख रहा हूँ'। इस प्रकार एक ही अर्थ तीन ज्ञानों से युक्त होता
हुआ न तो अकर्तृक हो सकता है, न नानाकर्तृक ही होगा।
यों यह अपरिसंख्यायमान स्मृतिविषय, प्रमाणों द्वारा सिद्धार्थ है, विद्यमान है; फिर
भी पूर्वपक्षी नास्तिक द्वारा खण्डित किया जा रहा है कि 'स्मृति हेतु से आत्मा की सिद्धि
नहीं बनेगी; क्योंकि स्मृति तो स्मर्तव्यविषया हैं' ! हम कहते हैं—न तो यह स्मृतिमात्र
है, और न स्मर्तव्यविषयमात्र है; यह तो ज्ञानप्रतिसन्धान की तरह स्मृतिप्रतिसन्धान है;
क्योंकि यहाँ एक (आत्मा) ही सभी विषयों का ग्राहक है। यह एक ज्ञाता (आत्मा) सब
विषयों वाला है, अतः अपने ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है—'इस अर्थ को जानूँगा',
'इस अर्थ को जानता हूँ', 'इस अर्थ को जानता था'। अमुक अर्थ को जानने को इच्छा

१८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
वस्यति-‘अज्ञासिषम्’ इति। एवं स्मृतिमपि त्रिकालविशिष्टां सुस्मूर्षाविशिष्टां च
प्रतिसन्धत्ते। संस्कारसन्ततिमात्रे तु सत्त्वे उत्पद्योत्पद्य संस्कारास्तिरोभवन्ति ।
स नास्त्येकोऽपि संस्कारो यस्त्रिकालविशिष्टं ज्ञानं स्मृतिं चानुभवेत् । न चानुभव-
मन्तरेण ज्ञानस्य स्मृतेश्च प्रतिसन्धानमहं ममेति चोत्पद्यते, देहान्तरवत्। अतोऽ-
नुमीयते-‘अस्त्येकः सर्वविषयः प्रतिदेहं स्वज्ञानप्रबन्धं स्मृतिप्रबन्धं च प्रतिसन्धत्ते’
इति। यस्य देहान्तरेषु वृत्तेरभावान्न प्रतिसन्धानं भवतीति ॥ १४ ॥
आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् [ १५-१७ ]
न; आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् ? ॥ १५ ॥
न देहादिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा। कस्मात् ? आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि
सम्भवात् । ‘दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्’ ( ३.१.१. ) इत्येवमादीनामात्म-
प्रतिपादकानां हेतूनां मनसि सम्भवः; यतः मनो हि सर्वविषयमिति । तस्मान्न
शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मेति ? ॥ १५ ॥
ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः संज्ञाभेदमात्रम् ॥ १६ ॥
करता हुआ बहुत देर तक कोई एकतरफा फैसला न करके अन्त में अचानक निश्चय
करता है कि 'अरे, इसे तो मैं जानता था !' इसी तरह त्रिकालविशिष्ट तथा स्मरणेच्छा-
विशिष्ट स्मृति का भी यह आत्मा प्रतिसन्धान करता है। स्मृत्यनुभवक्रियाकारक को
संस्कार-सन्ततिधारामात्र मानेंगे तो संस्कार उत्पन्न हो हो कर विनष्ट हो जाते हैं, तो
ऐसा एक भी संस्कार कहाँ मिलेगा जो त्रिकालविशिष्ट ज्ञान तथा स्मृति का अनुभव कर
सके ! अनुभव के बिना ज्ञान तथा स्मृति का देहान्तर में 'मैं—मेरा' ऐसे प्रतिसन्धान
की तरह प्रतिसन्धान बन नहीं सकता । अतः अनुमान होता है—अवश्य कोई एक
प्रमाता है जो बाह्यान्तरभूत सब विषयों का ग्राहक है, तथा अपने प्रत्येक देह में
ज्ञानप्रबन्ध तथा स्मृतिप्रबन्ध का चिन्तन करता है। जिसकी देहान्तर में वृत्ति न मानेंगे
तो यह ज्ञान-स्मृतिचिन्तन सिद्ध नहीं होगा ॥ १४ ॥
शंका—
आत्मा नहीं है, आत्मा के साधक हेतुओं के मन में सम्भव होने से ? ॥ १५ ॥
देहादिसंघात से अतिरिक्त आत्मा नहीं हैं; क्योंकि सिद्धान्ती द्वारा आत्मा के साधन
में दिये गये हेतुओं से मन का ही सम्बन्ध है। 'दर्शन-स्पर्शन द्वारा एक अर्थ के ग्रहण से'
( ३. १. १. ) आदि हेतुओं से आत्मा के स्थान में मनकी ही सिद्धि हो पायेगी; क्योंकि
मन भी सर्व विषय का ग्राहक है। अतः हम यह क्यों न मान लें—'शरीरेन्द्रियमनोबुद्धि-
संघात से पृथक् कोई आत्मा नामक पदार्थ नहीं हैं' ? ॥ १५ ॥
उत्तर—
ज्ञाता से ज्ञानसाधन उपपन्न होने के कारण यह संज्ञाभेदमात्र है ॥ १६ ॥

१७. सू० ] आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८७

१७. सू० ] आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८७
ज्ञातुः खलु ज्ञानसाधनान्युपपद्यन्ते—चक्षुषा पश्यति, घ्राणेन जिघ्रति, स्पर्श-
नेन स्पृशति । एवं मन्तुः सर्वविषयस्य मतिसाधनं मनःकरणभूतं सर्वविषयं
विद्यते येनायं मन्यत इति । एवं सति ज्ञातर्यात्मसंज्ञा न मृष्यते, मनःसंज्ञाऽभ्यनु-
ज्ञायते; मनसि च मनःसंज्ञा न मृष्यते, मतिसाधनंत्वभ्यनुज्ञायते, तदिदं संज्ञा-
भेदमात्रम्, नार्थे विवाद इति ।
प्रत्याख्याने वा सर्वेन्द्रियविलोप्रप्रसङ्गः । अथ मन्तुः सर्वविषयस्य मति-
साधनं सर्वविषयं प्रत्याख्यायते नास्तीति ? एवं रूपादिर्विषयग्रहणसाधनान्यपि
न सन्ति इति सर्वेन्द्रियविलोप्रः प्रसज्यत इति ॥ १६ ॥
नियमश्च निरनुमानः ॥ १७ ॥
योऽयं नियम इष्यते—'रूपादिग्रहणसाधनान्यस्य सन्ति, मतिसाधनं सर्वविषयं
नास्ति' इति, अयं नियमो निरनुमानः । नात्रानुमानमस्ति येन नियमं प्रतिपद्यामह
इति ।
ज्ञाता से ज्ञानसधनों को प्रामाण्य मिलता है, जैसे—'आंख से देखता हैं', 'नाक से
सूंघता हैं', त्वक् से स्पर्श करता हैं'। इसी तरह मन्ता ( चक्षुरादिकरण-दर्शनक्रिया-
कर्ता ) से सर्वविषयक मतिसाधन उपपन्न होते हैं, उनमें मन भी उसकी मति में साधन
है, जिससे वह सब विषयों पर मनन करता है, तो मन की स्वीकृति से आत्मा का
प्रतिषेध कैसे कर सकोगे ! यह कैसी विडम्बना है कि अपनी पराजय छिपाने के लिये उस
ज्ञाता को 'मन' संज्ञा तो दे देना चाहते हो, पर उसे 'आत्मा' मानने में आपको संकोच
लग रहा है ! मन को भी 'मन' नाम नहीं देना चाहते, पर उस का मतिसाधनत्व स्वीकार
करते चले आ रहे हो ! तो यह केवल नाम पर अडंगा लगाया जा रहा है, आत्मा की
सत्ता तो आप को भी स्वीकार है ही ।
और यदि आत्मा के प्रतिषेध पर ही तुले हुए हो तो आपके मत में सब इन्द्रियों के
विलोप ( अभाव ) की स्थिति आ पड़ेगी ! क्योंकि सर्वविषयग्राहक मन्ता का मतिसाधन
तथा उसके सर्वविषयक प्रत्याख्यान पर आग्रह करोगे तब भी इन्द्रियविलोप की स्थिति
का सामना करना अभीष्ट है तो इस तरह रूपादिविषयज्ञान के साधन ही न रह जायेंगे,
अतः इन्द्रियविलोप स्पष्ट ही है ॥ १६ ॥
यह नियम अनुमान प्रमाण से सिद्ध नहीं होता ॥ १७ ॥
यह जो नियम बनाना चाह रहे हो—'ज्ञाता के रूपादिविषय ज्ञान के साधन तो हैं,
परन्तु मतिसाधन (सुखादिज्ञानकरण, मन ) सर्वविषय वाला नहीं हैं', यह नियम नहीं
बनेगा; क्योंकि यह निरनुमान है। अर्थात् ऐसा कोई अनुमान नहीं, जिससे इस नियम
को प्रमाणित कर सकें।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

पादित कर देने पर भी उसके नित्यत्व के बारे में अभी संदेह निवृत्त नहीं हुआ ?

१८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
रूपादिभ्यश्च विषयान्तरं सुखादयः, तदुपलब्धौ करणान्तरसद्भावः।
यथा चक्षुषा गन्धो न गृह्यत इति करणान्तरं घ्राणम्, एवं चक्षुर्घाणाभ्यां रसो
न गृह्यत इति करणान्तरं रसनम्, एवं शेषेष्वपि । तथा चक्षुरादिभिः सुखादयो
न गृह्यन्त इति करणान्तरेण भवितव्यम् । तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम् । यच्च
सुखाद्युपलब्धौ करणं तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम्, तस्येन्द्रियमिन्द्रियं प्रति सन्निधे-
रसन्निधेश्च न युगपज्ज्ञानान्युत्पद्यन्ते इति । तत्र यदुक्तम्—'आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां
मनसि सम्भवात्' इति तदयुक्तम् ॥ १७ ॥
आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १८-२६ ]
किं पुनरयं देहादिसङ्घातादन्यो नित्यः ? उतानित्य इति ?
कुतः संशयः ? उभयथा दृष्टत्वात् संशयः । विद्यमानमुभयथा भवति—
नित्यम्, अनित्यं च । प्रतिपादिते चात्मसद्भावे संशयानिवृत्तेरिति ।
आत्मसद्भावहेतुभिरेवास्य प्राग्देहभेदादवस्थानं सिद्धमूर्ध्वमपि देहभेदाद-
वतिष्ठते । कुतः ?
पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः ॥ १८ ॥
रूपादि से सुखादि भिन्न विषय हैं, उनके ज्ञान के लिये अलग एक साधन (इन्द्रिय)
मानना ही पड़ेगा । जैसे चक्षु से गन्धज्ञान नहीं हो पाता, अतः उस ज्ञान के लिए पृथक्
एक घ्राणेन्द्रिय माननी पड़ती है । तथा चक्षु और घ्राण से रसज्ञान नहीं होता, उसके
लिये इन्द्रियान्तर रसनेन्द्रिय माननी पड़ती है। बाकी इन्द्रियों की आवश्यकता के बारे
में भी यही समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार चक्षु-आदि से सुखादि ज्ञान गृहीत नहीं हो
सकता, अतः उक्त ज्ञान के लिये इन्द्रियान्तर मानना ही पड़ेगा । वह इन्द्रिय ज्ञानायौग-
पद्य हेतु वाली ( मन ) है । जो इन्द्रिय सुखाद्युपलब्धि में कारण ( साधन ) है वही
ज्ञानायौगपद्य हेतु वाली है। प्रत्येक इन्द्रिय के साथ इस इन्द्रिय के सामीप्य या असामीप्य
से ज्ञान उत्पन्न या अनुत्पन्न होते रहते हैं । अतः आपका यह कहना सर्वथा अनुचित है
कि 'आत्मप्रतिपादक हेतुओं का मन से सम्बन्ध होने से मन सिद्ध होता है, आत्मा
नहीं' ॥ १७ ॥
क्या यह आत्मा देहादिसंघात से अन्य होता हुआ नित्य है; या अनित्य ? यह संशय
क्यों है ? क्योंकि लोक में दोनों ही नय देखे जाने से यहाँ संशय हो गया । लोक में,
विद्यमान प्रमाणसिद्ध वस्तु नित्य भी देखी जाती है, अनित्य भी । आत्मा की सत्ता प्रति-
पादित कर देने पर भी उसके नित्यत्व के बारे में अभी संदेह निवृत्त नहीं हुआ ?
आत्मसत्ताप्रतिपादक हेतुओं से आत्मा की अवस्थिति देहादि से पूर्व सिद्ध हो चुकी,
उन्हीं हेतुओं से वह देहादिनाश के बाद भी अवस्थित हैं, क्यों ?—
पूर्वजन्माभ्यस्त स्मृत्यनुबन्ध से उत्पन्न हर्ष, भय, शोक आदि के सम्प्रतिपन्न
होने से ॥ १८ ॥
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१९. सू० ] . आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८९

१९. सू० ] . आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८९
जातः खल्वयं कुमारकोऽस्मिन् जन्मन्यगृहीतेषु हर्षभयशोकहेतुषु हर्षभय-
शोकान् प्रतिपद्यते लिङ्गानुमेयान् । ते च स्मृत्यनुबन्धादुत्पद्यन्ते, नान्यथा ।
स्मृत्यनुबन्धश्च पूर्वाभ्यासमन्तरेण न भवति । पूर्वाभ्यासश्च पूर्वजन्मनि सति,
नान्यथेति सिद्धयत्येतत्—अवतिष्ठतेऽयमूर्ध्वं शरीरभेदादिति ॥ १८ ॥
पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवत् तद्विकारः ? ॥ १९ ॥
यथा पद्मादिष्वनित्येषु प्रबोधसम्मीलनं विकारो भवति, एवमनित्यस्यात्मनो
हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तिर्विकारः स्यात् ?
हेत्वभावादयुक्तम् । अनेन हेतुना पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवदनित्य-
स्यात्मनो हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति नात्रोदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतु; न
वैधर्म्यादस्ति, हेत्वभावाद् असम्बद्धार्थकमपार्थकमुच्यते इति ।
दृष्टान्ताच्च हर्षादिनिमित्तस्यानिवृत्तिः । या चेयमासेवितेषु विषयेषु हर्षा-
दिसम्प्रतिपत्तिः स्मृत्यनुबन्धकृता प्रत्यात्मं गृह्यते, सेयं पद्मादिसम्मीलनदृष्टान्तेन
न निवर्तते । यथा चेयं न निर्वर्त्तते तथा जातस्यापीति । क्रियाजाताश्च पर्णसंयोग-
यह उत्पन्न हुआ बालक इस जन्म में अगृहीत परन्तु लिंग से अनुमेय हर्ष, भय,
शोक आदि से ग्रस्त होता है । ये हर्ष-भयादि उन्हीं की स्मृति के अनुबन्ध से उत्पन्न हो
सकते हैं, अन्यथा नहीं । यह स्मृत्यनुबन्ध पूर्वाभ्यास से उत्पन्न हो सकता है, अन्यथा
नहीं । पूर्वाभ्यास पूर्व जन्म मानने पर बन सकता है, अन्यथा नहीं । अतः सिद्ध होता है
कि शरीरनाश के बाद भी आत्मा विद्यमान है ॥ १८ ॥
शंका—
पद्मादि के संकोच-विकासादि विकारों की तरह आत्मा के विकार मान लें ? ॥१९॥
जैसे लोक में अनित्य पद्मादि में संकोच-विकास रूप विकार देखा जाता है, वैसे ही
अनित्य आत्मा में हर्ष, शोक भय आदि का सम्प्रतिपत्तिरूपविकार मान लें ? ॥ १९ ॥
उत्तर—हेतुत्व न होने से ऐसा मानना अयुक्त है । 'इस हेतु से पद्मादि के संकोच-
विकास की तरह अनित्य आत्मा को हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति होती है'—इस उदा-
हरणसाधर्म्य तथा उदाहरणवैधर्म्य मात्र से जन्मान्तरीय,अनुभवजन्य संस्कार बालक में नहीं
बनता; अतः हेतु न होने से इसके असम्बद्धार्थ हो जाने पर यह उदाहरण निरर्थक है ।
दृष्टान्त से भी हर्षादि निमित्त का अनिषेध ही रहेगा । विषयों के आसेवन से हर्ष
शोकादि की सम्प्रतिपत्ति पूर्वानुभवज स्मृति-अनुबन्ध से होती हुई प्रत्येक आत्मा को गृहीत
होती है, यह पद्मादि के संकोच विकासवाले दृष्टान्त से प्रतिषिद्ध नहीं की जा सकती ।
अथ च, जैसे पद्मादि की संकोच-विकास क्रिया निवृत्त नहीं होती, वैसे ही उत्पन्न बालक
की हर्ष-शोकादि सम्प्रतिपत्तियां निवृत्त नहीं होती । वहां संकोचविकास क्रियोत्पन्न पत्रा-
दिसंयोगविभाग से अतिरिक्त नहीं हैं । क्रियाहेतु का क्रिया से अनुमान किया जाता है । ऐसा

१९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
विभागाः प्रबोधसम्मीलने, क्रियाहेतुश्च क्रियानुमेयः । एवं च सति किं दृष्टान्तेन
प्रतिषिध्यते ! ॥ १९ ॥
अथ निर्निमित्तः पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकार इति मतम्, एवमात्मनोऽपि
हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति ? । तन्न—
न; उष्णशीतवर्षकालनिमित्तत्वात् पञ्चात्मकविकाराणाम् ॥ २० ॥
उष्णादिषु सत्सु भावादसत्स्वभावात्तन्निमित्ताः पञ्चभूतानुग्रहेण निर्वृत्तानां
पद्मादीनां प्रबोधसम्मीलनविकारा इति न निर्निमित्ताः । एवं हर्षादयोऽपि विकारा
निमित्ताद्भवितुमर्हन्ति, न निमित्तमन्तरेण । न चान्यत् पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धा-
न्निमित्तमस्तीति । न चोत्पत्तिनिरोधकारणानुमानमात्मनो दृष्टान्तात्, न हर्षा-
दीनां निमित्तमन्तरेणोत्पत्तिः, नोष्णादिवन्निमित्तान्तरोपादानं हर्षादीनाम् ।
तस्मादयुक्तमेतत् ॥ २० ॥
४. इतश्च नित्य आत्मा—
प्रेत्याहाराभ्यासकृतात् स्तन्याभिलाषात् ॥ २१ ॥
जातमात्रस्य वत्सस्य प्रवृत्तिलिङ्गः स्तन्याभिलाषो गृह्यते, स च नान्तरे-
णाहाराभ्यासम् । कया युक्त्या ? दृश्यते हि शरीरिणां क्षुधा पीड्यमानानामा-
मानने के बाद, हम नहीं समझ पाये कि आप पद्मादि दृष्टान्त से क्या प्रतिषिद्ध कर रहे हैं !
शङ्का—'पद्मादिक में संकोच-विकास अहेतुक हैं'—यह मत है, इसी प्रकार आत्मा
में भी हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति बन जायेगी ? वह तो
नहीं बनेगी; पञ्चात्मक विकारों का उष्ण, शीत, वर्षा काल हेतु होने से ॥ २० ॥
उष्णादि हेतु होने पर वे होते हैं, न होने पर नहीं होते, अतः वे पञ्चभूतानुगृहीत
व्यापार से निष्पन्न पद्मादि के संकोच-विकास अहेतुक नहीं हैं। इसी तरह हर्षादि विकार
भी निमित्त से ही बन सकते हैं, निमित्त के विना नहीं। वह निमित्त पूर्वाभ्यस्त स्मृत्यनु-
बन्ध के अतिरिक्त क्या हो सकता है ! दृष्टान्त से आत्मा के उत्पत्ति-विनाशकारण का
अनुमान नहीं कर सकते । हर्षादि की निमित्त के विना उत्पत्ति नहीं बन सकती ।
उष्णादि की तरह निमित्तान्तर से भी हर्षादि की उत्पत्ति हो नहीं सकती। अतः आपकी
हर्षादिकों के निर्निमित्तवाली बात अयुक्त ही है ॥ २० ॥
४. इस कारण भी आत्मा नित्य है—
जन्म होते ही आहाराभ्यासजन्य स्तन्याभिलाष से ॥ २१ ॥
उत्पन्न होते ही शिशु का प्रवृत्तिहेतुक स्तन्याभिलाष ( स्तन्यपानेच्छा ) देखा जाता
है, वह आहाराभ्यास के विना नहीं बन सकता । किस युक्ति से ? लोक में देखते हैं कि
क्षुधा से पीड़ित प्राणियों का, आहाराभ्यासजन्य स्मरणानुबन्ध से आहाराभिलाष देखा

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१
हाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धादाहाराभिलाषः । न च पूर्वशरीराभ्यासमन्तरेणा-
सौ जातमात्रस्योपपद्यते । तेनानुमीयते—भूतपूर्वं शरीरम्, यत्रानेनाहारोऽभ्यस्त
इति । स खल्वयमात्मा पूर्वशरीरात् प्रेत्य शरीरान्तरमापन्नः क्षुत्पीडितः पूर्वा-
भ्यस्तमाहारमनुस्मरन् स्तन्यमभिलषति । तस्मान्न देहभेदादात्मा भिद्यते,
भवत्येवोर्ध्वं देहभेदादिति ॥ २१ ॥
अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत्तदुपसर्पणम् ? ॥ २२ ॥
यथा खल्वयोऽभ्यासमन्तरेणायस्कान्तमुपसर्पति, एवमाहाराभ्यासमन्तरेण
बालः स्तन्यमभिलषति ? ॥ २२ ॥
किमिदमयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं निर्निमित्तम्, अथ निमित्तादिति ? निर्नि-
मित्तं तावत्—
न; अन्यत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २३ ॥
यदि निर्निमित्तम् ? लोष्टादयोऽप्ययस्कान्तमुपसर्पेयुः ! न जातु नियमे
कारणमस्तीति । अथ निमित्तात् ? तत्केनोपलभ्यते इति ! क्रियालिङ्गः क्रिया-
हेतुः, क्रियानियमलिङ्गश्च क्रियाहेतुनियमः, तेनान्यत्र प्रवृत्त्यभावः । बालस्यापि
जाता है । पूर्वाभ्यास के बिना उत्पन्न होते ही बालक को यह कैसे बन सकता है ! पूर्व
शरीर से च्युत होकर शरीरान्तर से अवच्छिन्न यह आत्मा क्षुधा से पीड़ित हो, पूर्व-
जन्माभ्यस्त आहार का अनुस्मरण करता हुआ स्तन्य की इच्छा करता है । अतः सिद्ध
होता है कि देहनाश से आत्मा का नाश नहीं हो जाता, अपितु वही आत्मा दूसरे देहों में
भी अवच्छिन्न है ॥ २१ ॥
शङ्का—
अयस्कान्त मणि के पास लोह के अभिगमन की तरह उस शिशु का स्तन्य की ओर
उपसर्पण मान लें ? ॥ २२ ॥
जैसे अभ्यास के बिना ही लोह अयस्कान्तमणि की ओर सरकता है, वैसे ही बालक
भी स्तन्य की ओर झुकता है, उसकी इच्छा रखता है । ( पूर्वजन्माभ्यास कारण मानोगे
तो जात्यन्ध या बधिरों को पूर्वाभ्यस्त रूपशब्दादिक का इस जन्म में भी प्रत्यक्ष होने
लगेगा ? ) ॥ २२ ॥
उत्तर—क्या यह लोह का अयस्कान्तमणि की ओर उपसर्पण अनिमित्तक है या
सनिमित्तिक ? यदि अनिमित्तक कहोगे तो—
ऐसा नहीं कह सकते; अन्यत्र प्रवृत्ति न देखी जाने से ॥ २३ ॥
यदि अनिमित्तक मानोगे तो ईंट पत्थर आदि भी अयस्कान्तमणि की ओर सरकने
लगेंगे, क्योंकि नियम में कोई कारण तो है नहीं । यदि निमित्त मानोगे तो वह किससे
उपलब्ध होता है ! क्रियालिङ्गक साध्य क्रियाजनक होता है, तथा क्रियानियमलिङ्ग
क्रियाजनकनियम होता है, इसलिये अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती । बालक की भी नियत