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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 410 में से

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पृष्ठ 208

१९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
विभागाः प्रबोधसम्मीलने, क्रियाहेतुश्च क्रियानुमेयः । एवं च सति किं दृष्टान्तेन
प्रतिषिध्यते ! ॥ १९ ॥
अथ निर्निमित्तः पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकार इति मतम्, एवमात्मनोऽपि
हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति ? । तन्न—
न; उष्णशीतवर्षकालनिमित्तत्वात् पञ्चात्मकविकाराणाम् ॥ २० ॥
उष्णादिषु सत्सु भावादसत्स्वभावात्तन्निमित्ताः पञ्चभूतानुग्रहेण निर्वृत्तानां
पद्मादीनां प्रबोधसम्मीलनविकारा इति न निर्निमित्ताः । एवं हर्षादयोऽपि विकारा
निमित्ताद्भवितुमर्हन्ति, न निमित्तमन्तरेण । न चान्यत् पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धा-
न्निमित्तमस्तीति । न चोत्पत्तिनिरोधकारणानुमानमात्मनो दृष्टान्तात्, न हर्षा-
दीनां निमित्तमन्तरेणोत्पत्तिः, नोष्णादिवन्निमित्तान्तरोपादानं हर्षादीनाम् ।
तस्मादयुक्तमेतत् ॥ २० ॥
४. इतश्च नित्य आत्मा—
प्रेत्याहाराभ्यासकृतात् स्तन्याभिलाषात् ॥ २१ ॥
जातमात्रस्य वत्सस्य प्रवृत्तिलिङ्गः स्तन्याभिलाषो गृह्यते, स च नान्तरे-
णाहाराभ्यासम् । कया युक्त्या ? दृश्यते हि शरीरिणां क्षुधा पीड्यमानानामा-
मानने के बाद, हम नहीं समझ पाये कि आप पद्मादि दृष्टान्त से क्या प्रतिषिद्ध कर रहे हैं !
शङ्का—'पद्मादिक में संकोच-विकास अहेतुक हैं'—यह मत है, इसी प्रकार आत्मा
में भी हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति बन जायेगी ? वह तो
नहीं बनेगी; पञ्चात्मक विकारों का उष्ण, शीत, वर्षा काल हेतु होने से ॥ २० ॥
उष्णादि हेतु होने पर वे होते हैं, न होने पर नहीं होते, अतः वे पञ्चभूतानुगृहीत
व्यापार से निष्पन्न पद्मादि के संकोच-विकास अहेतुक नहीं हैं। इसी तरह हर्षादि विकार
भी निमित्त से ही बन सकते हैं, निमित्त के विना नहीं। वह निमित्त पूर्वाभ्यस्त स्मृत्यनु-
बन्ध के अतिरिक्त क्या हो सकता है ! दृष्टान्त से आत्मा के उत्पत्ति-विनाशकारण का
अनुमान नहीं कर सकते । हर्षादि की निमित्त के विना उत्पत्ति नहीं बन सकती ।
उष्णादि की तरह निमित्तान्तर से भी हर्षादि की उत्पत्ति हो नहीं सकती। अतः आपकी
हर्षादिकों के निर्निमित्तवाली बात अयुक्त ही है ॥ २० ॥
४. इस कारण भी आत्मा नित्य है—
जन्म होते ही आहाराभ्यासजन्य स्तन्याभिलाष से ॥ २१ ॥
उत्पन्न होते ही शिशु का प्रवृत्तिहेतुक स्तन्याभिलाष ( स्तन्यपानेच्छा ) देखा जाता
है, वह आहाराभ्यास के विना नहीं बन सकता । किस युक्ति से ? लोक में देखते हैं कि
क्षुधा से पीड़ित प्राणियों का, आहाराभ्यासजन्य स्मरणानुबन्ध से आहाराभिलाष देखा