न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
१. शब्दोऽनुमानम्, न प्रमाणान्तरम्; कस्मात् ? शब्दार्थस्यानुमेयत्वात् ।
कथमनुमेयत्वम् ? प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः। यथाऽनुपलभ्यमानो लिङ्गी मितेन लिङ्गेन
पश्चान्मीयत इति अनुमानम्, एवं मितेन शब्देन पश्चान्मीयतेऽर्थोऽनुपलभ्यमान
इत्यनुमानं शब्दः ? ॥ ५० ॥
२. इतश्चानुमानं शब्दः—
उपलब्धेर्द्विप्रवृत्तित्वात् ? ॥ ५१ ॥
प्रमाणान्तरभावे द्विप्रवृत्तिरुपलब्धिः । अन्यथा ह्युपलब्धिरनुमाने, अन्य-
थोपमाने; तद्व्याख्यातम्। शब्दानुमानयोस्तूपलब्धिर्द्विप्रवृत्तिः, यथानुमाने प्रवर्त्तते
तथा शब्देऽपि विशेषाभावादनुमानं शब्द इति ? ॥ ५१ ॥
सम्बन्धाच्च ? ॥ ५२ ॥
३. शब्दोऽनुमानमिति वर्त्तते। सम्बद्धयोश्च शब्दार्थयोः सम्बन्धप्रसिद्धौ
शब्दोपलब्धेरर्थग्रहणम्, यथा सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धप्रतीतौ लिङ्गो-
पलब्धौ लिङ्गिग्रहणमिति ? ॥ ५२ ॥
[ सिद्धान्तपक्षः ]
१. यत्तावदर्थस्यानुमेयत्वादिति, तन्न—
१. शब्द अनुमान ही है, पृथक् प्रमाणान्तर नहीं; क्योंकि उसका अर्थ अनुमेय है ।
कैसे अनुमेय है ? प्रत्यक्ष से अनुपलब्ध होने के कारण । जैसे—अनुपलभ्यमान वह्नि
प्रत्यक्ष से ज्ञात धूम अनुमित होता है, एवमेव शब्दप्रत्यक्षानन्तर उससे अनुपलभ्यमान
अर्थ की अनुमिति होता है, अतः हम शब्द को अनुमान ही मान लें ? ॥ ५० ॥
२. इस वक्ष्यमाण कारण से भी शब्द अनुमान ही है—
शब्द ज्ञान के अनुमान से भिन्न प्रकार का न होने से ॥ ५१ ॥
शब्द यदि प्रमाणान्तर होता तो अनुमान से भिन्न प्रकार की उपलब्धि होनी चाहिये ।
आप पीछे उपमानप्रकरण में कह आये हैं—'उपमान में भिन्न उपलब्धि होती है,
अनुमान में भिन्न, अतः उपमान एक स्वतन्त्र प्रमाण है न कि अनुमानान्तर्भूत', परन्तु
शब्द तथा अनुमान के वारे में यह बात नहीं कही जा सकती; इन दोनों की तो समान
उपलब्धि है, जैसे अनुमान से ज्ञान उत्पन्न होता है, ठीक उसी विधि से शब्द से भी ।
कोई विशेषता न होने से हम तो यही समझते हैं कि शब्द अनुमान ही है ॥ ५१ ॥
और सम्बन्ध से भी (शब्द अनुमान ही सिद्ध होता है) ॥ ५२ ॥
३. सम्बद्ध शब्दार्थ में ही सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर शब्दोपलब्धि से अर्थग्रहण होता
है, जैसे—सम्बद्ध लिङ्ग-लिङ्गी की सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर लिङ्ग की उपलब्धि से
लिङ्गी का ज्ञान होता है ? तात्पर्य यह निकला कि शब्द ज्ञान भी व्याप्तिज्ञानजन्य है,
अतः वह वस्तुतः अनुमान ही है, उसे पृथक् प्रमाण मानने से क्या लाभ ? ॥ ५२ ॥
१. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा कि—'अर्थ के अनुमेय होने से शब्द प्रमाण अनुमान
हैं, वह उचित नहीं—