सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

२२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
मानि विषयग्रहणानि तान्यवतिष्ठन्त इति युगपद् विषयाणां ग्रहणं प्रसज्यत
इति ॥ ४ ॥
अप्रत्यभिज्ञाने च विनाशप्रसङ्गः ॥ ५ ॥
. अतीते च प्रत्यभिज्ञाने वृत्तिमानप्यतीत इत्यन्तःकरणस्य विनाशः प्रसज्यते,
विपर्यये च नानात्वमिति ॥ ५ ॥
अविभु चैकं मनः पर्यायेणेन्द्रियैः सम्प्रयुज्यत इति—
क्रमवृत्तित्वादयुगपद् ग्रहणम् ॥ ६ ॥
इन्द्रियार्थानाम् । वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वमिति । एकत्वे च प्रादुर्भावतिरो-
भावयोरभाव इति ॥ ६ ॥
अप्रत्यभिज्ञानं च विषयान्तरव्यासङ्गात् ॥ ७ ॥
अप्रत्यभिज्ञानम् = अनुपलब्धिः । अनुपलब्धिश्च कस्यचिदर्थस्य विषयान्तर-
व्यासक्ते मनस्युपपद्यते; वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वात् । एकत्वे हि अनर्थको व्यासङ्ग
इति ॥ ७ ॥
विभुत्वे चान्तःकरणस्य पर्यायेणेन्द्रियैः संयोगः—
भी स्थिर रहेंगी, तब जितने भी विषयज्ञान होंगे वे सब स्थिर हो जायेंगे, फिर एक साथ
सभी विषयों का ज्ञान प्रसक्त होने लगेगा ॥ ४ ॥
[ वृत्ति तथा वृत्तिमान् के अभेद में एक और दूषण दिखा रहे हैं—]
अप्रत्यभिज्ञान में विनाश-प्रसक्ति होने लगेगी ॥ ५ ॥
प्रत्यभिज्ञान के अतीत ( समाप्त ) होने पर वृत्तिमान् भी अतीत हो जायेगा, तब
अन्तःकरण का विनाश प्रसक्त होगा । वृत्ति का नाश होने पर भी प्रत्यभिज्ञान ( अन्तः-
करण ) का अनाश—यों विपर्यय मानने पर मन का नानात्व प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ५ ॥
एक ही विनाशी मन कालभेद से इन्द्रियों के साथ संप्रयुक्त होता है, अतएव
क्रमवृत्ति होने से युगपज्ज्ञान नहीं हो पाता ॥ ६ ॥
इन्द्रियों के विषयों का । ज्ञान को अनेकता का कारण वृत्तिमान् का नानात्व मानना
ही पड़ेगा; अन्यथा ज्ञान का प्रादुर्भाव तथा तिरोभाव कैसे होगा ! ॥ ६ ॥
[ स्वमत में प्रत्यभिज्ञान का उपपादन करते हैं—]
मन के विषयान्तर में व्यासक्त होने से अप्रत्यभिज्ञान हो जाता है ॥ ७ ॥
अप्रत्यभिज्ञान से तात्पर्य है—अनुपलब्धि । यह अनुपलब्धि मन के विषयान्तर में
व्यासक्त होने पर होती है; क्योंकि हम वृत्ति तथा वृत्तिमान् को नाना मानते हैं । एक
मानने वाले के मत में भले ही उसका विषय में व्यासङ्ग होना निरर्थक रहे ! ॥ ७ ॥
मन को विभु मानने पर कालभेद से इन्द्रियों के साथ संयोग—