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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 410 में से

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पृष्ठ 262

२४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
सुखदुःखानि धर्माः, नाचेतनस्येति । आरम्भनिवृत्त्योश्च प्रत्यगात्मनि दृष्टत्वात्
परत्रानुमानं वेदितव्यमिति ॥ ३४ ॥
अत्र भूतचैतनिकः १ आह—
तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः ? ॥ ३५ ॥
आरम्भनिवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति यस्यारम्भनिवृत्ती तस्येच्छाद्वेषौ तस्य
ज्ञानमिति प्राप्तम्—पार्थिवाप्यतैजसवायवीयानां शरीराणारम्भनिवृत्तिदर्शना-
दिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति चैतन्यम् ? ॥ ३५ ॥
परश्वादिष्वारम्भनिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३६ ॥
शरीरे चैतन्यनिवृत्तिः। आरम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति प्राप्तं
परश्वादेः करणस्यारम्भनिवृत्तिदर्शनाच्चैतन्यमिति । अथ शरीरस्येच्छादिभि-
र्योगः, परश्वादेस्तु करणस्यारम्भनिवृत्ती व्यभिचरतः ? न तर्ह्ययं हेतुः 'पार्थिवा-
प्यतैजसवायवीयानां शरीराणामारम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योगः' इति ।
के ही इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःखादि धर्म हैं, अचेतन के नहीं । यों यह प्रवृत्ति-
निवृत्ति जीवात्मा में प्रमाण से जान लेने के बाद परमात्मा में भी अनुमान प्रमाण से
समझ लेनी चाहिये ॥ ३४ ॥
यहाँ भूतचैतनिक चार्वाक कहता है—
इच्छा द्वेष के शरीरनिमित्तिक होने से पार्थिवादि देहों में चैतन्यप्रतिषेध नहीं
बनता ? ॥ ३५ ॥
'इच्छा, द्वेष आरम्भ-निवृत्ति के हेतु हैं'—इस सिद्धान्त से जिसके आरम्भ-निवृत्ति
होंगे, उस के इच्छा-द्वेष हैं तथा उसी का ज्ञान होना चाहिये; तब पार्थिव, आप्य, तैजस,
वायवीय शरीरों के भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से इच्छा द्वेषादि का योग भी उन्हीं
के साथ होगा, तब ज्ञान भी उन्हीं को होना चाहिये, तो क्यों न उन शरीरों में ही
चैतन्य मान लें ? ॥ ३५ ॥
परशु-आदि में भी आरम्भनिवृत्ति देखे जाने से ॥ ३६ ॥
शरीरों में चैतन्य नहीं मानना चाहिये । यदि चर्वाक यह सिद्धान्त बनायेगा कि
'जिसमें आरम्भ-निवृत्ति देखे जाय उसी का इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध होगा' तो
परशु ( कुठार ) आदि साधनों की भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उसे भी चैतन्य
मानना पड़ेगा । यदि कहें कि शरीर का इच्छा-द्वेषादि से ही सम्बन्ध होता है, परश्वादि
साधनों की आरम्भ-निवृत्ति तो कहीं-कहीं व्यभिचरित भी देखी जाती है ? तो यह कोई
हेतु नहीं बना, तथा इसी परश्वादि दृष्टान्त से आपका यह सिद्धान्त भी व्यभिचरित हो
जायेगा कि पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों की आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से
उनका इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध है ।
१. 'ज्ञानेच्छादीनां पार्थिवमिदं शरीरमेवाधिकरणम्' इति भूतचेतनवादी चार्वाक
इत्यर्थः ।