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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 410 में से

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पृष्ठ 398

३८० वात्स्यायनभाष्यसहितं न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ॥ २५ ॥
हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि ।
किं पुनर्लक्षणान्तरयोगाद् हेत्वाभासा निग्रहस्थानत्वमापन्नाः, यथा प्रमाणानि
प्रमेयत्वम् ? इत्यत आह—यथोक्ता इति । हेत्वाभासलक्षणेनैव निग्रहस्थानभाव
इति ।
त इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिताः परीक्षिताश्चेति ॥ २५ ॥
योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् ।
तस्य वात्स्यायन इदं भाष्यजातमवर्तयत् ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः
✾ समाप्तं चेदं न्यायदर्शनम् ✾
•
और यथोक्त हेत्वाभास भी ॥ २५ ॥
निग्रहस्थान है ।
क्या जैसे प्रमेयादि लक्षण के योग से प्रमाण कभी-कभी प्रमेय बन जाते हैं, उसी
तरह हेत्वाभास भी किसी अन्य लक्षण के योग से निग्रहस्थान बनते हैं ? तो उनका लक्षण
सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया
है । अर्थात् पूर्वोक्त हेत्वाभास-लक्षणों से ही उनमें निग्रहस्थानत्व आ जायेगा ।
इस प्रकार ये प्रमाणादि पदार्थ क्रमशः गिना दिये गये, उनका लक्षण कर दिया
गया, तथा तत्त्वजिज्ञासु जनों के हितार्थ उनकी यथातथ परीक्षा कर दी गयी ॥ २५ ॥
यह न्यायशास्त्र ऋषिश्रेष्ठ अक्षपाद (गौतम) को अलौकिक शक्ति द्वारा ज्ञानगोचर
हुआ था, उसी न्यायशास्त्र के भाष्यरूप इस व्याख्यान की वात्स्यायन ने रचना की ॥
वात्स्यायनीय न्यायभाष्य( सहित न्यायदर्शन )में पञ्चम अध्याय का
द्वितीय आह्निक समाप्त
✾ पञ्चम अध्याय भी समाप्त ✾
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✾ न्यायदर्शन समाप्त ✾