न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पादित कर चुके हैं ॥ ४४ ॥
४५. सू० ] बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् २५५
व्यक्तम् । प्रत्यर्थनियता हि बुद्धयः, तदिदमव्यक्तग्रहणं देशितं क्व विषये बुद्धय-
नवस्थानकारितं स्यादिति !
धर्मिणस्तु धर्मभेदे बुद्धिनानात्वस्य भावाभावाभ्यां तदुपपत्तिः ।
धर्मिणः खल्वर्थस्य समानाश्च धर्माः, विशिष्टाश्च; तेषु प्रत्यर्थनियता नाना-
बुद्धयः । ता उभय्यो यदि धर्मिणि वर्तन्ते तदा व्यक्तं ग्रहणं धर्मिणमभिप्रेत्य ।
यदा तु सामान्यग्रहणमात्रं तदाऽव्यक्तं ग्रहणमिति । एवं धर्मिणमभिप्रेत्य व्यक्ता-
व्यक्तयोर्ग्रहणयोरुपपत्तिरिति ।
न चेदमव्यक्तं ग्रहणं बुद्धेर्बोद्धव्यस्य वाऽनवस्थायित्वादुपपद्यत इति ॥ ४४ ॥
इदं हि न—
प्रदीपाचिःसन्तत्यभिव्यक्तग्रहणवत्तद्ग्रहणम् ॥ ४५ ॥
अनवस्थायित्वेऽपि बुद्धेस्तेषां द्रव्याणां ग्रहणं व्यक्तं प्रतिपत्तव्यम् । कथम् ?
प्रदीपाचिःसन्तत्यभिव्यक्तग्रहणवत् । प्रदीपाचिषां सन्तत्या वर्तमानानां ग्रहणा-
'व्यक्त' है, इसी तरह विशेषविषयक ज्ञान अपने प्रति 'व्यक्त' है बुद्धियाँ प्रत्येक विषय-
ज्ञान में नियत हैं । तो बुद्धि के अनवस्थान के कारण यह अव्यक्त ज्ञान प्रख्यात होता
हुआ किस विषय में होगा !
धर्मी में धर्मभेद होने से बुद्धि-नानात्व के होने या न होने से व्यक्त तथा अव्यक्त
की उपपत्ति होती है ।
धर्मी अर्थ के सामान्य तथा विशेष—दोनों ही धर्म होते हैं, उनमें बुद्धियाँ प्रत्यर्थ-
नियत होने से अनेकविध हैं। यदि धर्मिविषयक वे दोनों प्रकार की बुद्धि रहती हैं तो
धर्मी के अभिप्राय से व्यक्त ज्ञान होता है, तथा जब सामान्य ज्ञानमात्र होता है उसे
अव्यक्त ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार धर्मी को लेकर व्यक्ताव्यक्त ज्ञान का उत्पादन हो
सकता है, उससे ज्ञान की अवस्थितता या अनवस्थितता सिद्ध नहीं होती ।
एक बात और, यह अव्यक्त ज्ञान बुद्धि या बोद्धव्य विषय की अनवस्थायिता के
कारण नहीं, अपितु ज्ञान के प्रत्यर्थनियतत्व के कारण होता है; जो कि हम अभी प्रति-
पादित कर चुके हैं ॥ ४४ ॥
पूर्वपक्षी के मत से बुद्धचनवस्थायित्व अधर्मिता अहेतु है—ऐसा मानना उचित नहीं;
क्योंकि—
प्रदीप की प्रभासन्तति द्वारा अभिव्यक्त ज्ञान की तरह उस द्रव्य का व्यक्त ज्ञान
होता है ॥ ४५ ॥
बुद्धि को उत्पादविनाशी मानने पर भी द्रव्यों का ज्ञान व्यक्त मानना चाहिये ।
कैसे ? प्रदीप की किरण सन्तानों से अभिव्यक्त ज्ञान की तरह । दीपक की किरणसन्तति
का ज्ञान तथा ज्ञेय विषय—दोनों ही अनवस्थायी है; उसी तरह बुद्धियों के प्रत्यर्थ-
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२५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
नवस्थानं ग्राह्यानवस्थानं च, प्रत्यर्थनियतत्वाद् बुद्धीनाम्, यावन्ति प्रदीपार्चींषि
तावत्यो बुद्धय इति । दृश्यते चात्र व्यक्तं प्रदीपार्चिषां ग्रहणमिति ॥ ४५ ॥
बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाकरणम् [ ४६-५५ ]
चेतना शरीरगुणः; सति शरीरे भावात्, असति चाभावादिति ?—
द्रव्ये स्वगुणपरगुणोपलब्धेः संशयः ॥ ४६ ॥
सांशयिकः सति भावः। स्वगुणोऽप्सु द्रवत्वमुपलभ्यते, परगुणश्चोष्णता,
तेनायं संशयः—किं शरीरगुणश्चेतना शरीरे गृह्यते, अथ द्रव्यान्तरगुण
इति ? ॥ ४६ ॥
न शरीरगुणश्चेतना । कस्मात् ?
यावच्छरीरभावित्वाद्रूपादीनाम् ॥ ४७ ॥
न रूपादिहीनं शरीरं गृह्यते, चेतनाहीनं तु गृह्यते; यथा—उष्णताहीना
आपः, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति ।
संस्कारवदिति चेद् ? न; करणानुच्छेदात् ।
यथाविधे द्रव्ये संस्कारः, तथाविध एवोपरमो न; तत्र कारणोच्छेदादत्यन्तं
नियत होने से जितनी दीपक की किरणें होगी उतनी ही बुद्धियाँ होंगी । प्रदीप की
किरणें यद्यपि अस्थिर हैं फिर भी उन से होनेवाला ज्ञान व्यक्त ही गृहीत होता है । अतः
'ज्ञान की अनवस्थायिता से अव्यक्त ज्ञान होता है'—ऐसा आप नहीं कह सकते ॥ ४५ ॥
चेतना शरीर का गुण है; क्योंकि वह शरीर के रहने पर रहती है, न रहने पर
नहीं रहती ?
द्रव्य में स्वगुण तथा परगुण—दोनों को उपलब्धि से यहां संशय है ॥ ४६ ॥
'आश्रय के होने पर उसका गुण गृहीत होता है'—इसीसे चेतन विषय में कोई
निश्चयात्मक ज्ञान नहीं हो पाता । जैसे जल में द्रवत्व स्वगुण भी उपलब्ध है, उष्णता पर-
गुण ( तैजस ) भी है । अतः यह संशय होता है—क्या शरीर में गृहीत होनेवाली चेतना
शरीर का गुण है या किसी द्रव्यान्तर का ॥ ४६ ॥
चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि
रूपादि शरीरपर्यन्त ही रहते हैं ॥ ४७ ॥
शरीर रूपादिहीन गृहीत नहीं हो पाता, जब कि वह चेतनाहीन गृहीत होता देखा
जाता है, जैसे उष्णताहीन जल । अतः चेतना शरीरगुण नहीं है ।
जैसे संस्कार शरीरगुण है, परन्तु वह शरीरपर्यन्त नहीं रहता, उसी तरह चेतना
को भी शरीरगुण मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि वहां कारण का नाश नहीं होने से
उसका नाश नहीं होता । द्रव्य की जिस स्थिति में संस्कार होता है उस स्थिति में
संस्कार का नाश नहीं होता, वहाँ कारणोच्छेद से संस्कारानुपपत्ति आत्यन्तिक होती है ।
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