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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 410 में से

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पृष्ठ 274

२५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
नवस्थानं ग्राह्यानवस्थानं च, प्रत्यर्थनियतत्वाद् बुद्धीनाम्, यावन्ति प्रदीपार्चींषि
तावत्यो बुद्धय इति । दृश्यते चात्र व्यक्तं प्रदीपार्चिषां ग्रहणमिति ॥ ४५ ॥
बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाकरणम् [ ४६-५५ ]
चेतना शरीरगुणः; सति शरीरे भावात्, असति चाभावादिति ?—
द्रव्ये स्वगुणपरगुणोपलब्धेः संशयः ॥ ४६ ॥
सांशयिकः सति भावः। स्वगुणोऽप्सु द्रवत्वमुपलभ्यते, परगुणश्चोष्णता,
तेनायं संशयः—किं शरीरगुणश्चेतना शरीरे गृह्यते, अथ द्रव्यान्तरगुण
इति ? ॥ ४६ ॥
न शरीरगुणश्चेतना । कस्मात् ?
यावच्छरीरभावित्वाद्रूपादीनाम् ॥ ४७ ॥
न रूपादिहीनं शरीरं गृह्यते, चेतनाहीनं तु गृह्यते; यथा—उष्णताहीना
आपः, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति ।
संस्कारवदिति चेद् ? न; करणानुच्छेदात् ।
यथाविधे द्रव्ये संस्कारः, तथाविध एवोपरमो न; तत्र कारणोच्छेदादत्यन्तं
नियत होने से जितनी दीपक की किरणें होगी उतनी ही बुद्धियाँ होंगी । प्रदीप की
किरणें यद्यपि अस्थिर हैं फिर भी उन से होनेवाला ज्ञान व्यक्त ही गृहीत होता है । अतः
'ज्ञान की अनवस्थायिता से अव्यक्त ज्ञान होता है'—ऐसा आप नहीं कह सकते ॥ ४५ ॥
चेतना शरीर का गुण है; क्योंकि वह शरीर के रहने पर रहती है, न रहने पर
नहीं रहती ?
द्रव्य में स्वगुण तथा परगुण—दोनों को उपलब्धि से यहां संशय है ॥ ४६ ॥
'आश्रय के होने पर उसका गुण गृहीत होता है'—इसीसे चेतन विषय में कोई
निश्चयात्मक ज्ञान नहीं हो पाता । जैसे जल में द्रवत्व स्वगुण भी उपलब्ध है, उष्णता पर-
गुण ( तैजस ) भी है । अतः यह संशय होता है—क्या शरीर में गृहीत होनेवाली चेतना
शरीर का गुण है या किसी द्रव्यान्तर का ॥ ४६ ॥
चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि
रूपादि शरीरपर्यन्त ही रहते हैं ॥ ४७ ॥
शरीर रूपादिहीन गृहीत नहीं हो पाता, जब कि वह चेतनाहीन गृहीत होता देखा
जाता है, जैसे उष्णताहीन जल । अतः चेतना शरीरगुण नहीं है ।
जैसे संस्कार शरीरगुण है, परन्तु वह शरीरपर्यन्त नहीं रहता, उसी तरह चेतना
को भी शरीरगुण मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि वहां कारण का नाश नहीं होने से
उसका नाश नहीं होता । द्रव्य की जिस स्थिति में संस्कार होता है उस स्थिति में
संस्कार का नाश नहीं होता, वहाँ कारणोच्छेद से संस्कारानुपपत्ति आत्यन्तिक होती है ।
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