न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु-
७. सू० ] निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३
अस्ति चेदं परिमाणं प्रतिव्यक्तम्, तदेकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात्पश्यामः-
व्यक्तमिदमेकप्रकृतीति ।
अस्य व्यभिचारेण प्रत्यवस्थानम्-नानाप्रकृतीनामेकप्रकृतीनां च विकाराणां
दृष्टं परिमाणमिति । एवं प्रत्यवस्थिते आह-एकप्रकृतिसमन्वये सति शरावादि-
विकाराणां परिमाणदर्शनात्, सुखदुःखमोहसमन्वितं हीदं व्यक्तं परिमितं
गृह्यते, तत्र प्रकृत्यन्तररूपसमन्वयाभावे सत्येकप्रकृतित्वमिति ।
तदिदमविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषं ब्रुवतो हेत्वन्तरं भवति । सति च
हेत्वन्तरभावे पूर्वस्य हेतोरसाधकत्वान्निग्रहस्थानम्, हेत्वन्तरवचने सति यदि
हेत्वर्थनिदर्शनो दृष्टान्त उपादीयते ? नेदं व्यक्तमेकप्रकृति भवति; प्रकृत्यन्तरो-
पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु-
पपत्तेरानर्थक्याद्धेतोरनिवृत्तं निग्रहस्थानमिति ॥ ६ ॥
निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ ७-१० ]
प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥
यथोक्तलक्षणे पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहे हेतुतः साध्यसिद्धौ प्रकृतायां ब्रूयात् नित्यः
शब्दो ऽस्पर्शत्वादिति हेतोः । हेतुर्नाम हिनोतेर्धातोस्तुन् प्रत्यये कृदन्तपदम्,
प्रत्येक में व्यक्त है । यों एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण से सांख्यानुयायी मानते हैं—
'यह व्यक्त एकप्रकृति है' ।
प्रतिवादी इसका व्यभिचार से निषेध करता है—'नानाप्रकृतिक तथा एकप्रकृतिक
ऐसे दोनों तरह के विकारों का परिमाण लोक में देखा जाता है' । यों, प्रतिषेध किये
जाने पर वादी फिर कहता है—'एकप्रकृतिसमन्वय होने की अवस्था में शरावादि विकारों
में परिमाण देखा जाने से, सुख-दुःख-मोह-समन्वित यह व्यक्त विशिष्टतया ही गृहीत
होता है, तात्पर्य यह है कि इस हेतु में प्रकृत्यन्तररूप समन्वय के अभाव होने पर एक-
प्रकृतित्व है' ।
यों यह, सामान्यरूपेण उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर, हेतुविशेष का निवेश करने
पर वादी का हेत्वन्तर हो जाता है । हेत्वन्तरत्व हो जाने पर हेतु के असाधक हो जाने
से वह निग्रहस्थान हो गया । हेत्वन्तरवचन होने पर भी, यदि हेत्वर्थनिदर्शन ( साध्य-
साधनभाव का व्याप्यव्यापकभाव से निदर्शन ) के लिये दृष्टान्त का उपादान किया
जाता है तो प्रकृत्यन्तरोपादान की संभावना से यह व्यक्त का एकप्रकृतित्व नहीं सिद्ध
होता । तथा यदि उपादान नहीं किया जाता तो अनिदर्शित हेत्वर्थ में साधकत्व का
उपपादन न होने से दृष्टान्त का हेतु निग्रहस्थान रह ही गया ॥ ६ ॥
प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थ कहना 'अर्थान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ७ ॥
यथोक्तलक्षण पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह में हेतु से साध्य-सिद्धि करना चाहने पर कोई कहे—
'शब्द नित्य है' । इस में 'अस्पर्शत्व होने से' हेतु दे । यहाँ 'हेतु' शब्द 'हि गतो वृद्धौ च'
३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः
शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि-
धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य-
मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि—
तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥
वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥
यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति ।
एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा
एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥
परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥
यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट-
( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त
( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१.
नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर-
सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या
कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता
है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से
अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते
हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी—
दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥
वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥
जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की
तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की
अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश
गया है ।
इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह-
स्थान है ॥ ८ ॥
परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे
'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥
जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे.
क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो,
१. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष-
शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५
शब्दमप्रतीतप्रयोगमतिद्रुतोच्चरितमित्येवमादिना कारणेन तदविज्ञातम्—
अविज्ञातार्थम् । असामर्थ्यसंवरणाय प्रयुक्तमिति निग्रहस्थानमिति ॥ ९ ॥
पौर्वापर्ययोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम् ॥ १० ॥
यत्रानेकस्य पदस्य वाक्यस्य वा पौर्वापर्येणान्वययोगो नास्ति इत्यसम्बद्धार्थ-
त्वं गृह्यतं तत्समुदायार्थस्यापायादपार्थकम् । यथा—दश दाडिमानि, षडपूपाः,
कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अथ रोरुकमेतत्, कुमार्याः पाय्यम्, तस्याः
पिता अप्रतिशीन इति ॥ १० ॥
निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ ११-१३ ]
अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ॥ ११ ॥
प्रतिज्ञादीनामवयवानां यथालक्षणमर्थवशात् क्रमः, तत्रावयवविपर्यासेन
वचनमप्राप्तकालमसम्बद्धार्थं निग्रहस्थानमिति ॥ ११ ॥
हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम् ॥ १२ ॥
प्रतिज्ञादीनामन्यतमेनाप्यवयवेन हीनं न्यूनं निग्रहस्थानम्; साधनाभावे
साध्यासिद्धिरिति ॥ १२ ॥
जैसे 'जर्फरीतु, तुर्फरीतु' आदि; या बहुत शीघ्रता में बोला जाता हो । इन अवस्थाओं में
वह अविज्ञातवाक्य 'अविज्ञातार्थ' कहलाता है। ऐसा प्रयोग अपना असामर्थ्य छिपाने के
लिए प्रयुक्त किया जाता है ॥ ९ ॥
पौर्वापर्य सम्बन्ध से असम्बद्धार्थक को 'अपार्थक' कहते हैं ॥ १० ॥
जहाँ अनेक पदों या वाक्यों का पौर्वापर्य से अन्वयसम्बन्ध न बनता हो उसे
असम्बद्धार्थ (परस्परसाकांक्षत्वरहित) कहते हैं। उस समुदाय का कोई अर्थ न लगने
से वह 'अपार्थक' निग्रहस्थान है। जैसे—'दस अनार, छह पूए, कुण्ड, अज की चर्म,
पललपिण्ड, यह रौरुक है, कुमारी का पेय, उसका पिता अप्रतिशीन (वृद्ध) हैं'—इत्यादि
क्लिष्ट (असम्बद्ध) शब्दप्रयोग से एक वाक्य बोल दिया जाये जो कि अपार्थक
(परस्परासम्बद्धार्थक) है ॥ १० ॥
अवयवों का विपर्यस्त वचन 'अप्राप्तकाल' कहलाता हैं ॥ ११ ॥
प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का लक्षणनिर्देशानुसार अर्थ की आकांक्षावश क्रम नियत
है। वहाँ अवयव-विपर्यास से बोलना असम्बद्धार्थक होता है अतः वह 'अप्राप्तकाल'
निग्रहस्थान कहलाता है ॥ ११ ॥
किसी एक अवयव से हीन को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ १२ ॥
प्रतिज्ञादि अवयवों में से किसी एक अवयव से हीन प्रयोग को 'न्यून' निग्रहस्थान
कहते हैं; क्योंकि अवयवन्यूनता में साधनोपपादन न होने से साध्य की सिद्धि नहीं
बनेगी ॥ १२ ॥
पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ]
३७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥
एकेन कृतत्वाद् अन्यतरस्यानर्थक्यमिति तदेतन्नियमाभ्युपगमे वेदित-
व्यमिति ॥ १३ ॥
पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ]
शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥
अन्यत्रानुवादात् शब्दपुनरुक्तमर्थपुनरुक्तं वा, नित्यः शब्दो नित्यः शब्द इति
शब्दपुनरुक्तम्। अर्थपुनरुक्तम्-अनित्यः शब्दो निरोधधर्मको ध्वनिरिति ॥ १४ ॥
अनुवादे त्वपुनरुक्तं शब्दाभ्यासादर्थविशेषोपपत्तेः' ॥ १५ ॥
यथा हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनमिति ॥ १५ ॥
अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥
पुनरुक्तमिति प्रकृतम्। निदर्शनम्-उत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यमित्युक्त्वा
अर्थादापन्नस्य योऽभिधायकः शब्दस्तेन स्वशब्देन ब्रूयाद्-अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम्
इति, तच्च पुनरुक्तं वेदितव्यम्। अर्थसम्प्रत्ययार्थे शब्दप्रयोगे प्रतीतः सोऽर्थोऽर्था-
पत्त्येति ॥ १६ ॥
हेतु तथा उदाहरणों की अधिकता से 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता हैं ॥ १३ ॥
एक ही हेतु तथा उदाहरण से काम चल जाने पर भी पुनः हेतु आदि का प्रयोग
'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता है। परन्तु परिषद् या प्रतिवादी की जिज्ञासा हो तो
अधिक हेतु या उदाहरण दिये जा सकते हैं, तब निग्रहस्थान नहीं होता ॥ १३ ॥
शब्द या अर्थ का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' कहलाता है; अनुवाद को छोड़ कर ॥ १४ ॥
अनुवाद को छोड़कर, पुनरुक्त निग्रहस्थान 'शब्द पुनरुक्त' तथा 'अर्थ-पुनरुक्त'-
यों दो प्रकार का है। जैसे 'शब्द नित्य है, शब्द नित्य है'-यह 'शब्दपुनरुक्त' हुआ।
'शब्द अनित्य है, ध्वनि निरोधधर्मक है'-यह 'अर्थपुनरुक्त' हुआ ॥ १४ ॥
अनुवाद में दो बार बोलना 'पुनरुक्त' नहीं होता, क्योंकि वहाँ शब्द के दुहराने
से अर्थविशेष का बोध होता है ॥ १५ ॥
जैसे हेतुकथन के अनन्तर प्रतिज्ञा का पुनः दुहराना 'निगमन' कहलाता है ॥ १५ ॥
अर्थादापन्न (अर्थ से गृहीत) का स्वशब्द से पुनर्वचन भी ॥ १६ ॥
'पुनरुक्त' कहलाता है। उदाहरण है जैसे-'उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य हैं'-
कहकर अर्थादापन्न वस्तु के बोधक शब्द को पुनः कहना कि 'अनुत्पत्तिधर्मक अनित्य
होता है।' यह अर्थादापन्न का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' समझना चाहिये। अर्थज्ञान के लिए
शब्द-प्रयोग होने पर जिस अर्थ को अवगत कराता है वह अर्थ अर्थापत्ति से भी गृहीत हो
सकता है। अतः उसका पुनर्वचन निग्रहस्थान माना गया है ॥ १६ ॥
१. न्यायसूचीनिबन्धेऽसंगृहीतमपीदं सूत्रं वार्तिकस्वारस्येनात्र गृहीतम् ।
२०. सू० ] उत्तरविरोघिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७
२०. सू० ] उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७
उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ १७-२० ]
विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १७ ॥
विज्ञातस्य वाक्यार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना वा त्रिरभिहितस्य यदप्रत्यु-
च्चारणं तदननुभाषणं नाम निग्रहस्थानमिति । अप्रत्युच्चारयन् किमाश्रयं
परपक्षप्रतिषेधं ब्रूयात् ! ॥ १७ ॥
अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १८ ॥
विज्ञातार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना त्रिरभिहितस्य यदविज्ञानं तदज्ञानं
निग्रहस्थानमिति । अयं खल्वविज्ञाय कस्य प्रतिषेधं ब्रूयादिति ॥ १८ ॥
उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १९ ॥
परपक्षप्रतिषेध उत्तरम्, तद्यदा न प्रतिपद्यते तदा निगृहीतो भवति ॥ १९ ॥
कार्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ २० ॥
यत्र कर्तव्यं व्यासज्य कथां व्यवच्छिनत्ति—'इदं मे करणीयं विद्यते तस्मिन्न-
वसिते पश्चात्कथयामि' इति विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम् । एकनिग्रहावसानायां
कथायां स्वयमेव कथान्तरं प्रतिपद्यत इति ॥ २० ॥
परिषद् द्वारा जाने हुए अर्थ का तीन बार कहे जाने पर भी उच्चारण न करना
'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १७ ॥
परिषद् द्वारा जाने अर्थ को प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहे जाने पर भी ( ज्ञात
वाक्यार्थ का ) उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है । ( वादी )
उच्चारण नहीं करता है तो किसका सहारा लेकर प्रतिवादी का खण्डन करेगा ! ॥१७॥
जिसे न समझ पाये वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १८ ॥
प्रतिवादी द्वारा तीन बार उक्त तथा परिषद् द्वारा ज्ञात अर्थ को वादी जब न समझ
पावे वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान है । यह बिना जाने किसका खण्डन करेगा ! ॥ १८ ॥
उत्तर न देना 'अप्रतिभा' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १९ ॥
परपक्ष का खण्डन 'उत्तर' कहलाता है, उसे जब नहीं समझता या वह नहीं स्फुरित
होता है तो वादी निगृहीत हो जाता है ॥ १९ ॥
कार्य-व्यासक्तिव्याज से कथाविच्छेद करना 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है ॥२०॥
जहाँ अन्य कार्य में व्यासक्त दिखाकर कथा ( वाद ) को रोक दे कि 'आज तो अब
मुझे कुछ कार्य है, उसको पूरा कर उत्तर दे सकूँगा' यह 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता
है । यद्यपि कार्यव्यासङ्ग से कथा रोक देने पर स्पष्टतः यह तो सिद्ध नहीं होता कि
वादी को उत्तर नहीं आया, अतः कथा से उठ गया; क्योंकि हो सकता है कि कार्यावसान
के बाद वह उचित उत्तर दे सके, परन्तु इस वर्तमान कथा में तो उत्तर न दे पाने से
अभी तो उसका निग्रह हो ही गया । जब कार्यावसानान्तर उत्तर देगा तो वह प्रारम्भ
दूसरी कथा का ही कहलायेगा ॥ २० ॥
मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ]
३७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ]
स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥ २१ ॥
यः परेण चोदितं दोषं स्वपक्षेऽभ्युपगम्यानुद्धृत्य वदति—भवत्पक्षेऽपि
समानो दोष इति—स स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषं प्रसञ्जयन् परमत-
मनुजानातीति मतानुज्ञा नाम निग्रहस्थानमापद्यत इति ॥ २१ ॥
निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम् ॥ २२ ॥
पर्यनुयोज्यो नाम निग्रहोपपत्त्या चोदनीयः, तस्योपेक्षणं निग्रहस्थानं प्राप्तो-
सीत्यननयोगः। एतच्च कस्य पराजय इत्यनुयुक्तया परिषदा वचनीयम्, न खलु
निग्रहं प्राप्तः स्वकौपीनं विवृणुयादिति ॥ २२॥
अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः ॥ २३ ॥
निग्रहस्थानलक्षणस्य मिथ्याऽध्यवसायादनिग्रहस्थाने निगृहीतोऽसीति परं
ब्रुवन् निरनुयोज्यानुयोगान्निगृहीतो वेदितव्य इति ॥ २३ ॥
कथकान्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् [ २४-२५ ]
सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः ॥ २४ ॥
स्वपक्ष में दोषस्वीकृति से परपक्ष में दोष दिखाना 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥२१॥
जो प्रतिवादी द्वारा उठाये गये दोष को अपने मत में स्वीकार करके उसको खंडित
न कर कहे—'आपके पक्ष में यह दोष है', तो वह अपने पक्ष में दोष स्वीकार करता
हुआ तथा परपक्ष में दोष दिखाता हुआ परपक्ष को स्वीकार करता है, यह 'मतानुज्ञा'
निग्रहस्थान है ॥ २१ ॥
निग्रहस्थानप्राप्त वादी का निग्रह न करना 'पर्यनुयोज्योपेक्षण' निग्रहस्थान है ॥२२॥
पर्यनुयोज्य का अर्थ है—निग्रहोपपादन से अभियोज्य ( तिरस्करणीय )। उसकी
उपेक्षा अर्थात् 'तुम निग्रहस्थान को प्राप्त हो गये हो' ऐसा न कहना यही अननुयोग है।
यहाँ किसकी पराजय हुई यह परिषद् को ही निर्णय करना चाहिये। अन्यथा जो निगृहीत
हो चुका, वह स्वयं अपना निगृहीतत्व क्यों स्वीकार करेगा ! ॥ २२ ॥
अनिग्रहस्थानप्राप्त को निगृहीत करना 'निरनुयोज्यानुप्रयोग' निग्रहस्थान
कहलाता है ॥ २३ ॥
निग्रहस्थानलक्षणक मिथ्याध्यवसाय से अनिग्रहस्थान में भी परपक्ष को 'तुम निग्रह-
स्थान को प्राप्त हो चुके हो'—ऐसा कहनेवाला 'निरनुयोज्यानुयोग' निग्रहस्थान से
निगृहीत हो जाता है ॥ २३ ॥
सिद्धान्त की प्रतिज्ञा करके उसमें नियम से न रह कर अन्य रीति से वाद उठाना
'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २४ ॥
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां
प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः,
नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति-
'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां
दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात्
समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ
प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ
धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति ।
सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन-
नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न
कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा-
वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा-
णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम-
भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न
सिध्यति ॥ २४ ॥
किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत
अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे
कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में
नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित
करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से ।
मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद
( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर-
सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये-
'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की
निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त
तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास
द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का
आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव
के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा-
वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता
है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह
प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है,
तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो
उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।