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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 410 में से

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पृष्ठ 392

३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः
शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि-
धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य-
मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि—
तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥
वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥
यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति ।
एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा
एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥
परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥
यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट-
( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त
( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१.
नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर-
सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या
कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता
है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से
अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते
हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी—
दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥
वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥
जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की
तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की
अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश
गया है ।
इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह-
स्थान है ॥ ८ ॥
परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे
'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥
जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे.
क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो,
१. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष-
शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।