नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८५
है तथा केशों के संस्कार को दिखलाने के भाव में त्रिपताक हस्त को केशस्थान
पर अनामिका के साथ रखा जाता है।
३८-४१. कर्तरीमुख ( हस्त ) :—कर्तरीमुख के लक्षण में मूल कारिका
में प्रयुक्त 'पृष्ठावलोकिनी शब्द का आशय है कि तर्जनी तथा मध्यमा
अंगुलियां परस्पर संश्लिष्ट नहीं होना चाहिए तथा मध्यमा के पीछे तर्जनी
दिखलाई पड़ना चाहिए। 'कर्तरीमुख' का कैंची के जैसा ही रूप अभिनय
द्वारा दिखलाया जाता है। इसकी योजना के प्रसंग में आवश्यकता-
नुसार कर्तरीमुख को अधोगमन या नीचे मुंहवाला और पृष्ठावलोकनशील
रख कर उसके चलन हलन को सूचित किया गया है। जैसे तर्जनी
का मध्यमा के पीछे फैलाना पृष्ठावलोकन होता है, उसके विपरीत मध्यमा
का तर्जनी के पीछे जाना रूप चलन भी और फिर अपने स्वरूप की प्राप्ति
करना अर्थात् मध्यमा के पीछे तर्जनी का फैल जाना। यह क्रिया भी इसी के
द्वारा अभिनीत की जा सकती है, परन्तु अर्थानुसार ही ! आशय यही है कि
युक्ति के द्वारा कभी मिलना, फिर दूर हटना, कभी उलटे हो जाना और
कभी एक दो बार या तीन बार भी किसी 'हस्त का प्रयोग किया जा सकता
है। 'अभिनयदर्पण' में कर्तरीमुख का लक्षण भिन्न है—तदनुसार त्रिपताक
हस्त में कनिष्ठिका को टेढ़ी झुका कर तर्जनी और कनिष्ठिका को बाहर की
ओर सीधे फैला दिया जाए तो कर्तरीमुख हस्त हो जाता हैं'। इसकी योजना
स्त्री पुरुष के वियोग या विवाद, परिवर्तन या प्रतिकूलता, लूटखसोट, नेत्र
का कोना, मृत्यु, भेदभाव, बिजली की चमक, विरहावस्था में अकेले शयन,
गिरना तथा लता आदि के भावों को दिखलाने में की जाती है ।
( अभि० द० १०५-१०७ ) नाट्यशास्त्र-संग्रह में 'कर्तरीमुख' का भरतोक्त
लक्षण से थोड़ा मिलता हुआ लक्षण है। तदनुसार—महावर से पैरों को रंगने,
किसी वस्तु के गिरने को दिखलाने के लिये इसी हस्त को तर्जनी के स्थान
पर मध्यमा तथा मध्यमा के स्थान पर तर्जनी को रखते हुए की जाती है ।
इसके अतिरिक्त अधोगत हस्त को ऊपर की ओर उठा कर देखा जाए तो
लेख, पत्र या किसी पुस्तक के पढ़ने का भाव दिखलाया जा सकता है ।
( ना० शा० सं० ११६-११७ )
४२-४४. अर्धचन्द्र ( हस्त ) :— इसमें अंगूठा धनुष जैसा झुका हुआ
रहता है किन्तु अंगूठा बाहर सीधा फैल जाने से उसका मिलकर छोटा रहना
नहीं हो सकता । यहाँ योजना की कारिका ४३ में "मध्यौपम्य" शब्द है—
२५ ना० शा० द्वि०
३८६ नाट्यशास्त्र
उसका अर्थ है कटिप्रदेश की कृशता । 'पीन' के स्थान पर कहीं 'पान' पाठ
माना गया है। तब 'पान' का अर्थ होगा चषकादि पानपात्र । 'अभिनयदर्पण'
के अनुसार 'पताक हस्त मुद्रा में अंगूठे को बाहर सीधे फैलाने पर 'अर्धचन्द्र'
हस्त हो जाता है । इसके द्वारा कृष्णपक्ष की अष्टमी का अर्धचन्द्र, हाथ से
किसी के गले को ढकेलना (गलहस्त ), भाले से युद्ध करना, देवता का
अभिषेक, भोजन, पान, उद्भव, कटि, चिन्ता, मननं, ध्यान, प्रार्थना,
अंगस्पर्श तथा प्राकृतजन को नमस्कार का भाव प्रदर्शित किया जाता है ।
नाट्यशास्त्रसंग्रह में अर्धचन्द्र के स्वरूप को दूसरी शब्दावली में दिया है ।
तदनुसार—'यदि चारों अंगुलियाँ एक दूसरे के साथ मिली हों और अंगूठा
दूसरी ओर गोलाकार बनाते हुए चन्द्रलेखा का आकार बना ले तो अर्धचन्द्र'
हस्त हो जाता है' । इसकी योजना ऊपर स्थित 'बालचन्द्र' को दिखलाने में की
जाए। यदि छोटे वृक्ष को बतलाना हो तो हाथ को ऊपर की ओर ले जाया
जाय, खेद में इसी हस्त को कपोल पर रख कर तथा मध्यभाग की कृशता
को बतलाने में हस्तों को सामने की ओर मिला कर हटाते हुए दर्शाया जा
सकता है । ( ना. शा. सं. ११४-११५ ) ।
४५-५१. अराल ( हस्त ) —कारिकास्थ "आद्य" शब्द का अर्थ है प्रथम
या तर्जनी अँगुली । इसमें मध्यमा से लेकर शेष अँगुलियाँ पूर्व अंगुली के साथ
पीछे लगी हुई रहती हैं । अराल का अर्थ है 'कुटिल' क्योंकि 'अराल-पक्ष्मणः'
इत्यादि में अराल का अर्थ वक्र होता है। कारिकास्थ गांभीर्य वह पदार्थ है
जिसके प्रभाव से हर्ष, शोक एवं भय प्रभृति भावों की दशा में भी आकार पर
उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती हो । अरालहस्त का हृदय, बाजू, आगे
की ओर चंचलता से घूमते हुए आने या चलने का प्रयोग युक्ति के साथ
(नाट्याचार्य के द्वारा ) करवाया जाना चाहिए । संग्रह पद का अर्थ है केशों
का बाँधना तथा उत्कर्ष का अर्थ है उन्हे खोलकर जमा देना । 'सर्वाङ्गिक' शब्द
से आशय है कि उसे उस बाजू से अपनी ओर लाना या प्रत्यागमन । 'सम्पयोग'
का अर्थ है मात्र संश्लेष होना, जो अंगुलियों के अगले भाग में स्वस्तिक के
योग से होता है। परिमण्डल = एक बाजू से दूसरी बाजू घूमते हुए वर्तुलाकार
में भ्रमण । आह्वान में अंगुलियाँ नीचे गिरती हुई और निवारण में बाहर की
ओर फेंकी जाने वाली रखनी चाहिए । त्रिपताक हस्त से जो आवाहन,
अवतरण आदि भाव अभिनीत होते हैं वे अराल हस्त से भी दिखलाये जा
सकते हैं । जिस प्रयोग से जिन हस्तों या अंगों के द्वारा प्रयोग में सौन्दर्यसम्पत्ति
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८७
आती हो तो स्त्रियों के द्वारा उनकी वैसी योजना अवश्य करनी चाहिए। इसका
आशय यह नहीं कि स्त्रियों के द्वारा प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक हस्त न हो
और ऐसी दशा में अराल हस्त रहे। परन्तु परम्परा यह है कि पुरुषों के द्वारा
प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक के स्थान पर सर्वत्र अराल हस्त के प्रयोग नहीं
किये जाएँ। अभिनयदर्पण में अराल का अल्प विवरण ही प्राप्त होता है
तदनुसार यदि पताकहस्त में तर्जनी मोड़ दी जाए तो अरालहस्त हो
जाता है। जिसकी योजना विषपान, अमृत-पान, प्रचण्ड पवन के चलने जैसे
भावों को प्रदर्शित करने में की जाती है। नाट्यशास्त्र संग्रह में तथा अन्यत्र
विवरण भरत प्रदर्शित ही रखे गये हैं, विशेष कुछ भी नहीं।
५२-५३ शुकतुण्ड हस्त :-कारिका में स्थित 'तु' शब्द अरालहस्त
की तर्जनी से इस हस्त की विशेषता दर्शाने की भावना से रखा गया है तथा
दूसरी बार 'तु' का अर्थ 'अपि' होगा। 'न तुम न मैं' इत्यादि निषेध में इस
हस्त का अभिनय होता नहीं है किन्तु अर्थना, ईर्ष्या, प्रणयकलह में जब
'तुम नहीं', मैं इसे 'नहीं' जैसे भाव को दर्शाना हो तो इस हस्त का प्रयोग
होना चाहिए। सावज्ञ तिरस्कार या विसर्ग ( विदाई ) की दशा में प्रयोग
के अनुसार एक या दो बार इस हस्त का प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी
निन्दा ( आत्म धिक्कार ) के अर्थ में भी इसी हस्त की योजना रखी जाती
है। अभिनयदर्पण में इस हस्त की योजना बाण चलाने, बर्छी, भाला मारने
अपने निवास स्थान का स्मरण, मार्मिक या रहस्य भरी बात कहने तथा
उग्र भाव के प्रदर्शन में की जाती है। नाट्यशास्त्रसंग्रह के अनुसार नाट्य-
शास्त्र के विवरण का ही अनुमोदन है। केवल उपर्युक्त अर्थों के अतिरिक्त
द्यूत और अक्ष फेंकने में भी इसी हस्त की योजना का विशेष उल्लेख है।
५४-५५. मुष्टि हस्त :-लक्षण कारिका के 'संज्ञित शब्द से आशय
यह है कि लोक में भी इसी प्रकार मुष्टि प्रसिद्ध है। व्यायाम पद के द्वारा
कुश्ती के समय, खड्गयुद्ध के अवसर पर मुष्टि हस्त का प्रयोग किया जाता
है। 'निर्गम' शब्द से गीली वस्तु या गीले कपड़े को निचोड़ने में, 'पीडन'
अर्थात् गौ, महिषी जैसे पशुओं के दोहन में, असियष्टि शब्द का आशय
तलवार आदि से लेकर छुरी आदि मूठवाले शस्त्र ग्रहण का इसी के द्वारा
अभिनय किया जा सकता है। आदि शब्द से किसी के मारने या मार्जन
(सफाई करने) में भी इसी हस्त का प्रयोग किया जाता है। नाट्यशास्त्र
संग्रह में इस के द्वारा दौड़ना तथा विभिन्न युद्धों के करतब दिखलाने की
३८८ नाट्यशास्त्र
योजना का विशेष उल्लेख है। मल्लयुद्ध की स्थिति में दोनों हाथों के द्वारा
मुष्टि हस्त का प्रयोग होना चाहिए।
५६-५७. शिखर हस्त :- धनुष की डोरी आदि धारण करने की
स्थिति में इस ऊर्ध्वगामी हस्त को उत्तान और पार्श्वगामी हस्त को अधोमुख
करते हुए या उत्तान हस्त को ऊपर ले जाते हुए और अधोमुख को बाजू में
ले जाकर अभिनय किया जाए। 'आलक्तकोत्पीडने चैव' के अनुसार अर्थ
है—महावर लगाने तथा उत्पीडन करने में। बालकों के कपोल को मुष्टि
हस्त के हाथ के अंगूठे और तर्जनी से दबाने पर 'उत्पीडन' दर्शाया जा
सकता है। (अभि० आ०) 'अभिनयदर्पण' में इस हस्त की योजना—
कामातुरता, धनुष, स्तम्भ, निश्चय, पितृकर्म, ओठ पर दाँत गड़ाने, शिव
लिंग पूजन, निषेध वाक्य कथन, स्मरण, अभिनय कर्म की समाप्ति, करधनी
खींचने; आलिङ्गन करने तथा घण्टानाद करने के भाव व्यक्त करने में—की
जाती है। (अभि० द० ११८-१२१)
५८-५६. कपित्थ हस्त :- इस हस्त में अंगुष्ठ तथा तर्जनी का कार्य
रहता है अभिनय प्रदर्शन में। कार्य पद से 'सत्कर्म' अर्थ लिया जा सकता
है तथा चुटकी बजाने के कार्य भी इसी से सूचित होते हैं। अभिनयदर्पण
में इसकी योजना—लक्ष्मी, सरस्वती, नटों द्वारा ताल धारण, गौदोहन, अंजन
लगाना, क्रीडा कौतुकादि के अवसर पर पुष्पधारण, कंचुकी या आंचल
पकड़ने, घूंघट निकालने और धूपदीप से अर्चन करने के भाव में—की जाती
है। (अभि० द० १२१-१२४)
६०-६३. कटकामुख हस्त :- कारिका में प्रयुक्त 'सकनीयसी' पद का
आशय है कि अनामिका और कनिष्ठिका में थोड़ी दूरी रहनी चाहिए, अर्थात्
दोनों संश्लिष्ट न रहें। खट् कांक्षायाम् भ्वादिगणीय धातु है जिसमें भूख,
तृषा या पिपासा अर्थ में वुन् प्रत्यय होकर 'खटक' (या कटक) शब्द बनता
है। यह 'खटकामुख' हस्त की व्युत्पत्ति है। अग्नि में हव्य जिस पात्र से
छोड़ते हैं उस स्रुक् स्रुवादि का अभिनय उत्तान हस्त के द्वारा किया जाता है।
अभिमुख हस्त से हव्य, आज्य आदि का अभिनय होता है। लगाम खींचना
अश्व की गति रोकने या नियंत्रण करने में उपयुक्त होती है और इसका
अभिनय परिकर्षण या खींचने वाले इसी हस्त से किया जाता है तथा
हिलते हुए हाथों को रखा जाता है। आदर्श का धारण सम्मुख रखे गये
हस्त से होता है। नर्तकी इसके द्वारा 'मैं सुन्दर हूँ' इस प्रकार की आकृति
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८९
देखने का अभिनय करती है। चन्दन पीसने का अभिनय दोनों भागों में
गोलाकार या चक्राकार हस्त को घुमाते हुए होता है। इस हस्त से विवाह में
वधू के वस्त्र प्रान्त को सम्हालने या उसके आलम्बन का अभिनय किया जाता
है। प्रायः कुपिता नायिका के प्रसादन में अनुसरण के समय इसी हस्त द्वारा
उसके आंचल के कोने को पकड़ा जाता है। क्रीड़ाकाल में केश के आकर्षण
का भी तथा पुरुषों के उत्तरीय थामने या पकड़ने का भी इसी हस्त के
द्वारा अभिनय होता है, परन्तु स्त्रियों के उत्तरीय पकड़ने का अभिनय सहज
होगा। इस प्रकार इस हस्त का चतुरस्र या सभी दशाओं में उपयुक्त
अभिनय संयोजित हो सकता है। अभिनयदर्पण के अनुसार इसका लक्षण है—
जिसमें उठी हुई तर्जनी और मध्यमा अंगूठे के अग्रभाग को छूती हो तो
'खटकामुख' हस्त होता है। इसकी योजना—फूल चुनने, मोतियों की या
पुष्पों की माला धारण करने, धनुष को मध्य भाग से पकड़ कर खींचने,
ताम्बूलादि प्रदान करने, कस्तूरी, चंदन आदि को पीसने, वस्तु को सुगन्धित
करने, बोलने या देखने के भाव में की जाती है। (अभि० द० १२४-
१२७)
६४-६७. सूचीमुख हस्त :—इस हस्त का मुख सूची के आकार का
होने से 'सूचीमुख' नाम सार्थक है। प्रदेशिनी का अर्थ है 'तर्जनी'। इस की
विविध दशाओं के कारण इसके अभिनय भी विविधता-सम्पन्न होते हैं। लोला
का अर्थ है एक बाजू से दूसरी बाजू में जाने वाली। 'कम्पिता' वह है जो
उसी स्थान पर हिलती हुई रहे। अभिनय के अनुसार चलने वाली 'चला' है।
चक्र के अभिनय में प्रदेशिनी को ऊर्ध्वमुख रख एक बाजू से दूसरे बाजू तक
चक्कर लेती हुई ले जाना चाहिए। मीन के अति बालोरग का उपादान यह
सूचित करता है कि मीन तथा बाल सर्प की गति एक दूसरे से विलक्षण
है। इसी प्रकार वल्ली, लता और मञ्जरी के अवान्तर भेदों की बारीकी
भी ध्यान में रखी जाए। जैसे—ककड़ी, लौकी की वल्ली, अंगूर दाख आदि
की लता, आम की मञ्जरी होती है। 'प्रणता' और 'उन्नता' का आशय
है पहिले झुकी हुई और फिर ऊपर को जाती हुई तथा लम्बाई में ऊँची होने
वाली। रोष दिखाने में और पसीना पोंछने में या मस्तक से पसीना
हटाने में तर्जनी को फैलाई हुई रखते हैं। अहंकार के अभिनय में ललाट
पर तर्जनी को करना चाहिए। प्रत्यक्ष शत्रु के निर्देश में तर्जनी अग्रभाग में
नत रखी जाती है। शत्रु के अनुसन्धान या खोजने का अभिनय तीन अंगु-
३९० नाट्यशास्त्र
लियों को हिलाकर किया जाता है । सामने और विरुद्ध दिशा में जाने वाली
दोनों हाथों की तर्जनी से दिन की समाप्ति को दिखलाया जाता है । यह
भी लोक में प्रचलन है कि मध्यमा से महेश्वर और शक्र का अभिनय किया
जाए किन्तु इसको 'तर्जनी' से दिखलाना ही शास्त्रानुमोदित है । ( अ०
भा० ) अभिनयदर्पण में सूचीमुखहस्त का विवरण भरत सदृश विस्तीर्ण नहीं
है । इसके अनुसार सूचीमुख हस्त की योजना—एकार्थ बोध, परब्रह्म की
भावना, शतार्थ बोध, सूर्य, नगरी, संसार, 'अच्छा है' कहना, 'जो' और 'वह'
बतलाना, नीरवता, ताड़न, दुर्बलता, सलाई, शरीर, आश्चर्य, वेणी, छत्र,
सामर्थ्य, दोनों हाथ, रोमावली, भेरी वाद्य वादन, कुम्भकार का चक्र,
पहिया, विचार विवेचन तथा सन्ध्याकाल में—की जाती है । ( अभि० द०
१२७ से १३१ )
७८-८१. पद्मकोष हस्त :—लक्षण कारिका में 'ऊर्ध्वा' का अर्थ होगा
चारों अंगुलियाँ ऊपर की ओर उत्तान स्थिति में अलग-अलग हुई हों और
सिकुड़ी हुई हों तथा पद्म की तरह जिसका अभ्यन्तर स्थान विनत हो ।
अर्थात् हथेली में गड्ढा बन जाए । बिल्वादि के ग्रहण में वे ही अंगुलियाँ पर्व
के अगले भाग में अतिशय कुञ्चित ( सिकुड़ी हुई ) रखी जाती हैं । पुष्पप्रकर
का अर्थ होगा आगे आगे दो या तीन बार पुष्पों को बिखेरना । अभिनय-
दर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना बिल्वफल, युवतिजन के गोल उरोज,
भँवर या घुमाव, गेंद, पतीली, भोजन, पुष्पकली, आम्रफल, पुष्पस्तबक,
मंजरी, जपा पुष्प, घण्टा, बाँबी ( वल्मीक ), कमल तथा अण्डे आदि भाव
प्रदर्शन में की जाती है । ( अभि० द० १३४-१३७ )
८२-८३- सर्पशीर्ष हस्त :—इसमें सभी अंगुलियाँ अंगूठे के साथ कुञ्चित
या सिकुड़ी हुई रहती हैं और सामने की ओर रखी हथेली विनत या
गड्ढेवाली गहरी रहती है, जिससे सर्प के फन जैसा हस्त का आकार बनता
है । सर्प की गति के अभिनय में यह हस्त अधोमुख रखा जाता है । आस्फोटन
का अर्थ है मल्लयुद्ध में ताल ठोंकना ।
अभिनयदर्पण में इस हस्त की योजना चन्दन, सर्प, मन्द स्वर, जल
छिड़कना, पोषण, ( देवताओं को ) तर्पण में जलाञ्जलि देना, हाथी के कुम्भ
स्थल को थपथपाना या संचालन तथा मल्लों का ताल ठोंकना जैसे भाव
प्रदर्शन में की गयी है । ( अभि० द० १३७-१३६ )
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३५१
८४-८५. मृगशीर्ष हस्त :—कुट्टमित = स्त्रियों का एक चेष्टांलकार।
इसका लक्षण है—'केशस्तनाधरादीनां ग्रहे हर्षेऽपि सम्भ्रमात्। आहुः कुट्टमितं
नाम शिरःकरविधूननम्' [ केश, स्तन, अधर आदि के ग्रहण करने से हर्ष होने
पर भी घबराहट के साथ मस्तक एवं हाथों का विशेष परिचालन 'कुट्टमित'
भाव होता है।] अभिनवदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—स्त्रियों
के कपोलचक्र, सीमा, भय, कलह, नेपथ्य, आह्वान, त्रिपुण्ड, मृगमुख, वीणा,
पाद संवाहन!धनापहरण, मिलन, छत्रधारण, संचरण, प्रियाह्वान तथा योनि
के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है। (अभि० द० १३६-१४२)
८६-८७. काङ्गुल हस्तः—कङ्गु का अर्थ है प्रियंगु लता, उसे जो लेता
है वह 'काङ्गुल'। अन्य मत में कांगुल का अर्थ बिच्छू भी होता है।
अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना लकुचफल, बच्चों के पैरों के
घुंघरू घंटियाँ, चकोर, सुपारी के वृक्ष, बाला के उरोज, श्वेतकमल, चातक
तथा नारिकेल फल के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है। (अभि० द० १४४-१४६)
८८-८६. अलपल्लव ( अलपद्मक ) हस्त :—'आत्मोपन्यास' का अन्य
अर्थ है स्त्रियों के अपने उपन्यास अर्थात् विस्मय दिखलाने में। उपन्यास का
अर्थ है विस्मय। इस स्थिति में इस हस्त का बार-बार अभिनय प्रस्तुत
किया जाए। अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—विकसित
कमल, कपित्थफल, चक्राकार पदार्थ, उरोज, वियोग, दर्पण, पूर्णचन्द्र, सौन्दर्य,
कुसुमाचित वेणी, छत के ऊपर का कमरा ( चन्द्रशाला ), गाँव, ऊँचाई,
क्रोध, सरोवर, गाड़ी, चक्रवाक पक्षी, कलकल ध्वनि तथा कीर्ति के भाव को
प्रदर्शित करने में की जातो है। (अभि० दर्प० १४६-१७)
६०-६८. चतुर-हस्त :—चतुर शब्द की 'चतस्रोऽङ्गुलयोऽङ्गुष्ठश्लिष्ट-
त्वेन सन्त्यस्मिन्' इस प्रकार अर्थ में 'अच्' प्रत्यय से निष्पन्न चतुर शब्द है।
इसमें चार अंगुलियों का अभिनय रहने से 'चतुर' कहलाता है। विभव का
एक बाजू से दूसरी बाजू में जाते हुए तथा अविभव का न जाते हुए बतला
कर अभिनय किया जाये। दारा (गृह पत्नी) को संयुक्तहस्तों से और
सम्मुखस्थ स्वस्तिक हस्त से दिखलाया जाये। इस प्रकार शरीर के वक्षः
से शिरः पर्यन्त क्षेत्रविशेष में संयुत और असंयुत, चञ्चल और स्थिर,
सम्मुख और पराङ्मुख उत्तान और अधोमुख, त्र्यस्त और चतुरस्र करते हुए
चतुर हस्तों को युक्ति के अनुसार उत्प्रेक्षित कर विशिष्ट अभिनय प्रस्तुत
करना चाहिए। अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—कस्तूरी,
३९२ नाट्यशास्त्र
अल्पार्थ, स्वर्ण, ताम्र, लोह, गीलापन, दुःख, रसास्वादन, नेत्र, वर्णभेद,
प्रमाण, माधुर्य, मन्दगति, खण्ड खण्ड करना, मुख, घृत तथा तैल के भावो को
प्रदर्शन करने में की जाती है। (अभि० द० १४६-१५२)
'नाट्यशास्त्र संग्रह' में चतुर का स्वरूप इस प्रकार है :—यदि सर्पशीर्ष
हस्त में कनिष्ठिका अंगुली टेढ़ी होकर झुके तथा अंगूठे को मध्यमा के मूल
में टेढ़ा कर स्पर्श करते हुए रखा जाए तो 'चतुर-हस्त' होता है।
योजना—यदि नय या आदर व्यक्त करना हो तो मुख के सामने चतुर
हस्त को रखा जाता है। इसी प्रकार कलाई में स्वस्तिक कर दो चतुर
हस्त एक दूसरे को पार करते हैं तो उससे विनय या सहिष्णुता दिखलाई
जाती है। किसी प्रश्न पर विचार दिखलाने के लिए एक बाजू चतुर हस्त
को रखते हैं तथा किसी छानबीन या विकल्प युक्त विचार में इसी हस्त
को हृदय के पास रखते हैं। लीला विलास में दोनों हस्त उद्वेष्टित दशा में
रखे जाते हैं। ऊपर की ओर समतल चतुर हस्त से कैतव तथा अक्ष क्रीड़ा
की प्रेरणा, मृदुता बतलाना हो तो अंगुष्ठ और मध्यमा के परस्पर मर्दन
के द्वारा तथा चतुराई दिखलाने में दो चतुर हस्तो को मिला कर ऊपर
जाते हुए रखा जाता है (ना० शा० सं—१४८-१५२)
६६-१०१. भ्रमर-हस्त :—सन्दष्ट का अर्थ है अग्रभाग से श्लिष्टता
या संयोग रहना। इनकी भ्रमर जैसी आकृति रहने के कारण 'भ्रमर' नाम
करण हुआ है। अभिनयदर्पण के अनुसार भ्रमर, शुक, पखना (पक्ष),
सारस, कोकिल तथा अन्य ऐसे ही पक्षियों के भाव को व्यक्त 'करने में भ्रमर,
हस्त की योजना रहती है (अभि० द० ५२-१४५) 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' के
अनुसार इस हस्त की योजना—कमलनाल को ग्रहण करने में, पुण्य को लेने
या कर्णपूर बनाने, तालपत्र लेने और कांटा निकालने में की जाती है
(ना० शा० सं०—१६१-१६२)।
१०२-१०३. हंसास्य-हस्त :—तर्जनी, मध्यमा और अंगुष्ठ ये तीनों
'निरन्तर' अर्थात् अलग-अलग रहने का इसमें निषेध है। (अन्तर = व्यवधान
या दूरी)। अभिनयदर्पण' में इस हस्त की योजना—मांगलिक कार्य, मंगल
सूत्र या सूत्र बांधने, उपदेश, विवाद-निर्णय, रोमान्च, मौक्तिकादि माला,
दीपक की बत्ती आगे सरकाने, कसौटी, चमेली, चित्र, चित्ररचना, दंशन
और जल के बांध (जलबन्ध) को दर्शाने में की जाती है।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९३
१०४-१०७. हंसपक्ष-हस्त :—प्रत्यक्ष और परोक्ष को स्वस्तिकाकार
हाथों से अभिनीत करते है। आलिङ्गन और महास्तम्भ के अभिनय को
संयुक्त हस्त द्वारा एक कन्धे से दूसरे कन्धे पर हाथों को रख कर किया जाता
है। 'यथारसम्, का आशय है कि शृङ्गार, हास्य, अद्भुत तथा करुणादि में
व्यभिचारी विशेष के योग से दृष्टिविशेष रूप जो अनुभाव हैं उनसे स्पष्ट होने
वाले ( ऐसे ) हस्त प्रयोग विशेष स्वरूप के हस्तों से समझकर प्रस्तुत किये
जाना चाहिए। यह ध्यान सभी हस्तों के प्रयोग के समय रखा जाना
चाहिए। 'अभिनयदर्पण' के अनुसार छः की संख्या, सेतुबन्ध, नखों से रेखा
बनाने या कुरेदने या टँकने के भाव दिखलाने में भी इस हस्त की योजना की
जाती है। ( अभि० द० १५७-१५६ )
१०८-११४ सन्दंश-हस्त :—पुष्पों के चयन और छोटे कांटों के निकालने
में अग्रसन्दंश का प्रयोग होता है। धनुष में जो गुण है उसमें संयुत करण
केवल संश्लेष
३९४ नाट्य
भी अर्थ लेते हैं। नाट्यशास्त्र-संग्रह के अनुसार नाट्यशास्त्र के विवरण के
अतिरिक्त भी चोरी को पकड़ने तथा केशों को पकड़ने में इसी हस्त की
योजना की जाती है।
१२०-१२४. ताम्रचूड-हस्त :- जिसकी मस्तक की शिखा खुली हुई या
फैली हुई हो ऐसे कुक्कुट पक्षी के आकार का है रहने से हस्त ताम्रचूड कह-
लाता है। ताल संगीत में काल का मानक होती है। संज्ञित का अर्थ है नाम
लेकर किसी बालक को बुलाना। ताम्रचूड का अन्य लक्षण भी है। जिसमें
कनिष्ठिका फैली हो ऐसी मुष्टि इसका आशय है। क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिः का
अर्थ है शीघ्रता से खोली हुई या खुली हुई अंगुलियों के द्वारा। अभिनयदर्पण
में इसकी योजना मुर्गा, बगुला, कौआ, ऊँट, बछडा और लेखनी का भाव
दिखलाने में की जाती है। (द्र० अभि० द० १६३-१६४) नाट्यशास्त्र-संग्रह
ने बतलाया कि शार्ङ्गदेव के मत में नाट्यशास्त्र के ताम्रचूड के अन्य लक्षण की
लक्ष्य में प्राप्ति अधिक नहीं होने से इसका प्रथम लक्षण ही ग्राह्य (रखना) है।
१२५. असंयुत 'हस्त इतने ही नहीं और न ही ये ही असंयुत हस्त हैं
क्योंकि कोहल आदि नाट्यशास्त्र के अन्य आचार्यों ने अन्य असंयुत हस्त भी
संश्लेषण या योग से संयुत हस्त होते हैं। अतः उन्हें स्वयं समझ लेना चाहिए।
ऐसे विशेष अभिनय आगे नाट्यशास्त्र के २६ वें अध्याय 'चित्राभिनयाध्याय में
बतलाये जायेंगे। कुछ अभिनय इन्हीं हाथों के द्वारा अपने अनुभव तथा
उत्प्रेक्षण के आधार पर भी होते हैं।
भरत के इन असंयुत हस्तो के अतिरिक्त अभिनयदर्पण में दिये हुए असंयुक्त
गये हस्तो को भी यहाँ दिया जा रहा है। क्रमशः ये हैं—(१) अर्धपताक,
(२) मयूर, (३) चन्द्रकला, (४) सिंहमुख, (५) त्रिशूल,
(६) व्याघ्र, (७) अर्धसूची, (८) कटक तथा (६) पल्ली। इनके
लक्षण का क्रमशः योजनादि विवरण इस प्रकार है :—
अर्धपताक :-
त्रिपताके कनिष्ठा चेद् वक्रितार्धपताकिका ।
यदि त्रिपताक हस्त में कनिष्ठका अंगुली को टेढ़ी कर के झुका दिया
जाए तो 'अर्धपताकिका' हस्त कहलाता है।
पल्लवे फलके तीरे उभयोरिति वाचके ।
क्रकचे छुरिकायाञ्च ध्वजे गोपुरशृङ्गयोः ।
युज्यतेऽर्धपताकोऽयं तत्तत्कर्मप्रयोगके ॥ (१०३-१०४)
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९५
योजना—पल्लव, चित्रफलक, लेखन आधार, नदी तट, 'दोनो' के कथन
के लिये, आरा, छुरी, गोपुर तथा शिखर का भाव दिखलाने में अर्धपताक
हस्त की योजना की जाती है ।
मयूर :—
अस्मिन्ननामिकांगुष्ठौ श्लिष्टौ चान्याः प्रसारिताः ।
मयूरहस्तः कथितः करटीकाविचक्षणैः ।
यदि ( कर्तरीमुख की ) अनामिका को अंगूठे से मिला कर शेष अङ्गुलियों
को बाहर की ओर फैला दिया जाए तो उसे विद्वान् 'मयूर हस्त' कहते हैं ।
मयूरास्ये लतायाञ्च शकुने वमने तथा ।
अलकस्यापनयने ललाटतिलकेषु च ।
नद्युदकस्य निक्षेपे शास्त्रवादे प्रसिद्धके ।
एवमर्थेषु युज्यन्ते मयूरकरभावनाः ॥ ( १०८-११० )
योजना—मयूरमुख, लता, शकुन, वमन, केशों को फैलाने या उठाने,
ललाट पर तिलक लगाने, नदी जल को उछालने, शास्त्रार्थ करने तथा प्रसिद्ध
वस्तु के निर्देश करने में 'मयूरहस्त' की योजना की जाती है ।
चन्द्रकला :—
सूच्यामङ्गुष्ठमोक्षे तु करश्चन्द्रकला भवेत् ।
यदि सूचीहस्त में अंगूठे को खोल कर आगे तान दिया जाए तो उसे
'चन्द्रकला' हस्त कहते हैं ।
चन्द्रे मुखे च प्रादेशे तन्मात्राकारवस्तुनि ।
शिवस्य मुकुटे गङ्गानद्यां च लगुडेऽपि च ।
एषा चन्द्रकला चैव विनियोज्या विधीयते ॥
( १३२, १३३ )
योजना—चन्द्र, मुख, हाथ की बालिश्त ( प्रादेश ), अर्धचन्द्राकार
वस्तु, शिव का मुकुट, गङ्गा नदी और लकड़ी या डंडा आदि के निर्देश में
'चन्द्रकला-हस्त' की योजना की जाती है ।
सिंहमुख :—
मध्यमानामिकाग्राभ्यामङ्गुष्ठो मिश्रितो यदि ।
शेषौ प्रसारितौ यत्र स सिंहास्यकरो भवेत् ॥
३९६ नाट्यशास्त्र
यदि मध्यमा और अनामिका दोनों उङ्गलियों के अग्रभागों को अङ्गूठे
से मिला दिया जाए और शेष दोनों उङ्गलियों के अग्रभागों को सीधे ताना
या फैला दिया जाए तो उसे 'सिंहमुख' हस्त कहते हैं ।
होमे शशे गजे दर्भचलने पद्मदामनि ।
सिंहासने वैद्यपाके शोधने सम्प्रयुज्यते ॥ ( १४२-१४४ )
योजना—हवनकर्म, खरहा, हाथी, लहराती कुशाएँ, कमल की माला,
सिंह का मुख, वैद्य द्वारा निर्मित पाक तथा उसके शोधन को सिंहमुख हस्त
के द्वारा दिखलाया जाता है ।
त्रिशूल :—
निकुञ्चनयुताङ्गुष्ठकनिष्ठस्तु त्रिशूलकः ।
यदि कनिष्ठा और अँगूठे को झुका कर मिला दिया जाए ( और तीनों
अँगुलियाँ अलग-अलग सीधी फैली हुई रहें ) तो त्रिशूल हस्त कहलाता है ।
बिल्वपत्रे त्रित्वयुक्ते त्रिशूलकर ईरितः । ( १६५ )
योजना—तीन पत्रों वाले बिल्वपत्र या तीन पदार्थों के निर्देश में त्रिशूल
हस्त की योजना की जाती है ।
व्याघ्र :—
कनिष्ठाऽङ्गुष्ठनमने मृगशीर्षकरे तथा ।
व्याघ्रहस्तः स विज्ञेयो भरतागमकोविदैः ॥
यदि मृगशीर्ष हस्त में कनिष्ठा और अँगूठे को झुका लिया जाए तो वह
'व्याघ्रहस्त' कहलाता है ।
व्याघ्रे भेके मर्कटे च शुक्तौ संयुज्यते करः । ( १६६-१६७ )
योजना—व्याघ्र, मेंढक, बन्दर, सीप ( शुक्ति ) के भाव को बतलाने में
'व्याघ्र-हस्त' की योजना की जाती है ।
अर्धसूची :—
कपित्थे तर्जनी ऊर्ध्वसारणे त्वर्धसूचिकः ।
यदि कपित्थहस्त में तर्जनी ऊपर सीधी फैला कर रखी जाए तो
'अर्धसूची' हस्त कहलाता है ।
अङ्कुरे पक्षिशावादौ बृहत्कीटे नियुज्यते । ( १६७-१६८ हैं
योजना—बीज के अङ्कुर, चिड़ियों के बच्चे, बड़े कीड़े मकोड़े को बतलाने
में 'अर्धसूची' हस्त की योजना की जाती है ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९७
कटक :--
सन्दंशेष्यूर्ध्वभागे तु मध्यमानामिकान्वया ।
कटको हस्त उच्यते ॥
यदि सन्दंश हस्त में मध्यमा और अनामिका के अग्रभागों को अँगूठे से
मिला दिया जाए तो 'कटकहस्त' हो जाता है ।
एतस्य विनियोगस्तु............दर्शने ।
आह्वानभावचलने............. ॥
योजना— देखने.........बुलाने तथा चलने आदि को दिखलाने में कटक
हस्त की योजना की जाती है ।
पल्ली हस्त :—
मयूरे तर्जनीपृष्ठ मध्यमेन युतो यदि ।
पल्लिहस्तः स विज्ञेयः पल्यर्थे विनियुज्यते ॥
यदि मयूरहस्त में मध्यमा अङ्गुली को तर्जनी के पीछे मोड़ कर अगले
भाग से लगाया जाए तो 'पल्ली हस्त' हो जाता है। इसकी योजना बस्ती,
गाँव की झुग्गी-झोपड़ियों को दर्शाने में रखी जाती है ।
संयुत-हस्तमुद्राएँ :—
१२६-१२८. अञ्जलिहस्तः—यहाँ लक्षण में 'तु' शब्द के द्वारा अन्य
हस्तों के संश्लेषण में नामान्तर के होने की स्थिति बन जाती है यह दिखलाया
है जैसे सूचीमुख के सम्बन्धों का अभिनय करते हैं। मुद्राओं में असंयुतमुद्राओं
का अधिक महत्त्व एवं उपयोग है क्योंकि इन्हीं से संयुत हस्तों का निर्माण भी
होता है । जैसे संयुत हस्त अञ्जलि से नमस्कार दिखलाया जाता है, वही दो
पताक हस्तों से मिला कर भी दिखलाया जा सकता है परन्तु व्यवहारोपयोगी
होने से संयुतमुद्राओं का अलग से दिखलाना परमावश्यक है ।
१२६-१३१. कपोतहस्तः--कपोत शब्द की व्युत्पत्ति है 'कम्पते इति
कपोतः' भीरुः पक्षी कांपता है इसलिये कपोत अर्थात् डरपोक पक्षी । इसी
स्वभाव से अन्य भीरु भी प्रकृति से गृहीत होने से 'कपोत' नाम से भीरुता
ली जाती है। इस हस्त की भीत व्यक्ति के अतिरिक्त कम्पित के अभिनय में
भी योजना रहती है। स्त्रियों के उरोज कम्पन के भयजन्य होने से इसका
प्रधानतः अभिनय रहता है। इसका कूर्मवत् आकार होने से इसे 'कूर्मक' भी
समझा जा सकता है ।
३९८ नाट्यशास्त्र
१३२-१३३. कर्कट-हस्तः—केंकड़ों की दाढ़ के आकार में अँगुलियाँ
एक दूसरे के सामने रहने से इसकी 'कर्कट' संज्ञा हुई । मदन के विकार
में अङ्गों से अङ्गों के मर्दन या मरोड़ने के अभिनय में तथा सोकर उठने के
समय या अन्य किसी समय आने वाली जम्भाई में इसी हस्त का उपयोग
होता है । बृहदाकार देह के फैलाने में पेट पर हथेलियों को सामने कर इस
हस्त को रखा जाता है। हनु के धारण में अँगुलियों पर हनु को रखा जाता
है । अर्थतत्व अर्थात् अभिनेय वस्तु के तत्व को अभिनय काल में प्रयोग करने
में समर्थ आचार्यों के द्वारा ऐसे हस्त के प्रयोग स्वविवेक पूर्वक किये जाएँ ।
१३४-१३५. स्वस्तिक-हस्तः—स्वस्तिक दो प्रकार का होता है एक
शुद्ध स्वस्तिक तथा दूसरा मुष्टिकास्वस्तिक रूप विशिष्टस्वस्तिक । जहाँ
शुद्ध स्वस्तिक पद का उपादान होता है वहाँ ऐसा मणिबन्धन्यास सन्निवेश
मानना चाहिए—जैसे चिन्ता के अभिनय में । अर्थ एवं प्रकरणादि के आधार
पर अन्य प्रदेशों में भी यही प्रवृत्ति रखनी चाहिए । जैसे—'स्वस्तिकविच्युति'
से पताक के साथ भी इस हस्त का प्रयोग किया जाता है । कलाई पर सामने
की ओर रखना ही इसका लक्षण कुछ विद्वान् मानते हैं । स्वस्तिक के लक्षण
तथा स्वरूप वाला होने से इसे 'स्वस्तिक' कहते भी हैं ।
१३६. खटकावर्धमानक-हस्तः—जहाँ परस्पर अभिमुख दो खटक हो वह
इसका रूप है । खटक पर खटक को रखने से खटकावर्धमानक । इसका खटक
के चारों ओर योग या सम्बन्ध रहने से खटकावर्धमानक सार्थक नाम-करण
समझना चाहिए । शृंगारार्थ अर्थात् शृंगार के प्रयोजन वाले कार्य जैसे
ताम्बूल ग्रहण आदि में । जैसा कि आगे गतिप्रचार में कहा भी है—'खट-
कावर्धमानौ तु कृत्वा विटगतिं व्रजेत्' ( १३-१२० ) [ 'खटकावर्धमान हस्तों
को रख कर विट की चाल में चले' ] । अपनी स्वामिनी को प्रसन्न करने के
लिये प्रणाम करने में भी तथा ऐसे प्रयोजन के समय भी इसी हस्त का प्रयोग
किया जाता है ।
१३७-१३८. उत्सङ्ग-हस्तः—'विपर्यस्तत्व' का आशय है स्वस्तिका-
कार । अर्थात् दाहिना हाथ बाँये कन्धे के दायरे में रखना, जिससे प्रकोष्ठ-
स्वस्तिकत्व संकेतित होता है। अन्य के मत में स्वस्तिक की दक्षिण पार्श्व
में स्थिति ही विपर्यस्तत्व है तथा अन्य इसे अधोमुखत्व भी मानते है । अभि-
नवगुप्त पाद ने इस पर युक्तियुक्तता से विचार रख बतलाया कि ऐसा प्रतीत
होता है कि जब कूर्परों को स्वस्तिकाकार रख प्रवेश रहित स्थान से
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९९
अँगुलियाँ बाहर की ओर हों और हस्तों का पृष्ठभाग बहिर्मुह हो तो यही
'विपर्यस्तत्व' है। उत्सङ्ग में लेने की योग्यता के होने से इसका 'उत्सङ्ग'
सार्थक नाम है। स्पर्शस्य अर्थात् जो परोक्षभूत वस्तु है उसके स्पर्श करने
के अभिनय में ऐसे ही उत्सङ्ग हस्त का प्रयोग किया जाता है।
'निष्पीडितः पुनः' के स्थान पर 'सिंहावलोकिते' पाठ भी है। सिंहने
देखा या सिंह को देखा इन दोनों अर्थों को यहाँ लिया जा सकता है। एक
बार कर्त्ता में तथा दूसरी बार में षष्टी का विधान कर यहाँ अर्थ समझना
चाहिए। अभिनयदर्पण के अनुसार—आलिंगन करने, लज्जा का अनुभव
करने, भुजबन्ध को दिखलाने और बालकों को शिक्षण देने के अर्थ बतलाने
में इस हस्त का प्रयोग किया जाता है। अभि० द० १८४-१८५)
१३६-१४१ निषध-हस्तः—कपित्थ हस्त से वेष्टित मुकुलहस्त का धारण
करना 'निषध' है। 'निषण्णं धत्ते इति निषधः' यह इसकी व्युत्पत्ति है। संग्रह
का अर्थ है शास्त्र का सम्यक् ग्रहण या समझना। संक्षिप्त के अभिनय से यह
बतलाया कि संक्षेपवत् द्रव्य का अभिनय इसी हस्त के द्वारा किया जाए।
अथवा संक्षिप्त का अर्थ है सम्यक् क्षिप्त अर्थात् ठीक से स्थापित। अभिनय-
दर्पण में निषधहस्त का स्वरूप नहीं मिलता है।
१४२-१४३. दोलाहस्त :--हाथों के पूरे लम्बे करने पर ही कन्धों में
शिथिलता होती है। या पताक हस्त की अँगुलियों के अवष्टम्भ के आधार
को उद्धार या हटाने में अँगुलियों के शिथिल करने पर दोला के आकार का
हस्त हो जाने से यह 'दोला' कहलाता है। भिन्न-भिन्न अभिनेय वस्तुओ में इस
बाजू से उस बाजू में जाना, निपतन तथा स्तब्धत्व आदि को समझना चाहिए।
अभिघात का अर्थ है शीत, वर्षा या आतप के चारो ओर से आने पर दोष
या अकुलाहट होना। अभिनयदर्पण के अनुसार अभिनय के आरम्भ में इस
हस्त का प्रयोग किया जाता है। (अभि० द० १८१-१८२)
१४४-१४५. पुष्पपुट हस्त :—सर्पशीर्ष हाथों के पुट से अर्थात् दोने के
आकार (द्रोणाकार) में बनाए हस्तों से पुष्पों को लेना होने से इसे
'पुष्पपुट' कहा जाता है। 'अभिनयदर्पण' के अनुसार आरती उतारने,
पानी या फल के ग्रहण करने, सन्ध्या करने, अर्घ्यदान करने तथा मन्त्रशक्ति
युक्त पुष्प के अर्थ को प्रकट करने में इस हस्त की योजना की जाती है।
(अभि० द० १८२-१८३)
४. अध्याय ३५-३६: भूमिका-विकल्प, नाट्य-अवतरण, भरत-पुत्र शाप-मोक्ष एवं महाग्रन्थ उपसंहार
४०० नाट्यशास्त्र
१४६-१४७. मकरहस्त :-दोनों अँगूठों का मकर के कर्णों की तरह
रहना होने के कारण इसका 'मकर' नाम है । अर्थयोगेन से आशय है कि
आगे पीछे, अगल-बगल में, ऊपर-नीचे, ठहरने-चलने, उठने-बैठने जैसे अनेक
कार्यों या प्रयोजन के अनुसार इसका प्रयोग किया जाए । 'नाट्य शा० सं०'
के अनुसार नदी के पूर को दिखलाने में इस हस्त की योजना की जाती है ।
अभि० द० में इसका लक्षण नहीं मिलता ।
१४८-१४६. गजदन्त हस्त :-इसमें वाम बाहु में दक्षिण तथा दक्षिण
बाहु में वाम हस्त स्तम्भाकार वेष्टित होता है जो हाथी के दाँत के आकार
के सम्बन्ध से गजदन्त कहलाता है । वधू तथा वर के विवाह मण्डप में ले जाने
या शिला उखाड़ने जैसे अवसरों तथा कार्यों का इस हस्त को आते जाते
रखकर अभिनय किया जाता है ।
१५०-१५१. अवहित्थ हस्त :-आकार गोपन की सूचना देने के कारण
इस हस्त का अवहित्थ नाम करण सार्थक है। अवहित्थ हस्त के प्रयोग से हृदय
के आशय को दबा लेने या उसका भेदन नहीं होने देने को बतलाया जाता है ।
१५२-१५३. वर्धमान हस्त :-दो हस्त पराङ् मुख हो स्वस्तिकता से
रहित चलने से विस्तार युक्त हो जाते हैं अतः इनमें वर्धमानता रहती है जो
इसकी व्युत्पत्ति में निमित्त होती है ।
१५४. संक्षेप में बतलाने की भावना से यहाँ इनका निरूपण किया गया ।
'तु' का आशय है—इन कथित अर्थों के अतिरिक्त अन्य अर्थों के अभिनय भी
योग्यतावश हस्तों से किये जा सकते हैं । अभिनयदर्पण में संयुतहस्त २३
बतलाये गये हैं जब कि भरतमुनि ने तेरह ही बतलाये जिनमें अभिनयदर्पण
में ६ ही समान नाम से मिलते हैं । ऐसे अतिरिक्त हस्त हैं—१. शिवलिङ्ग,
२. कर्तरी-स्वस्तिक, ३. शकट, ४. शंख, ५. चक्र ६. सम्पुट, ७. पाश,
८. कीलक, ६. मत्स्य, १०. कूर्म, ११. वराह, १२. गरुड़, १३. नागबन्ध,
१४. खट्वा तथा १५. भेरुण्ड । विस्तार भय से इनके स्वरूप को यहाँ उद्धृत
नहीं किया जा रहा है । इसे अभिनयदर्पण में यथास्थान देखा जा सकता है ।
इसके अतिरिक्त देव-देवी-प्रतिमाओं के लिये हस्तमुद्राओं का प्रयोग भी इसी में
तथा अन्यत्र (नाट्यग्रन्थों में) मिलता है । इनमें—ब्रह्महस्त, ईश्वर (शिव) हस्त,
विष्णुहस्त, सरस्वतीहस्त, पार्वतीहस्त, लक्ष्मीहस्त, विनायक (गणेश) हस्त,
षण्मुखहस्त, मन्मथहस्त, इन्द्रहस्त, अग्निहस्त, यमहस्त, निऋर्तिहस्त, वरुण-
हस्त, वायुहस्त, कुबेरहस्त, आदि आते हैं । इनके अतिरिक्त दशावतारहस्त भी
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०१
है। यथा-१. मत्स्यावतारहस्त, २. कूर्मावतारहस्त, ३. वराहावतारहस्त,
४. नृसिंहावतारहस्त, ५. वामनावतारहस्त, ६. परशुरामावतारहस्त,
७. रामावतारहस्त, ८. बलरामावतारहस्त. ६. कृष्णावतारहस्त तथा
१०. कल्क अवतारहस्त । इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियों एवं वर्णों की
हस्तमुद्राओं का विवरण प्राप्त है। इनमें राक्षसहस्त, ब्राह्मणहस्त, वैश्यहस्त,
शूद्रहस्त आते हैं। जातियों की उनके व्यवसाय, तथा विभिन्न देशों की
परम्पराओं के अनुसार हस्तमुद्राएँ रहती हैं ।
इसी क्रम में सम्बन्धीजन की हस्तमुद्राओं का भी विवरण मिलता है ।
तदनुसार दम्पत्तिहस्त, मातृहस्त, पितृहस्त, श्वश्रूहस्त, श्वशुरहस्त, भर्तृ-
भ्रातृहस्त, ननान्दृहस्त, पुत्रहस्त, स्नुषाहस्त, तथा सपत्नीहस्त । इसके
अतिरिक्त नवग्रहों के लिये भी हस्तमुद्राओं का स्वरूप इसी में दिया गया है ।
यथा-(१) सूर्यहस्त, (२) चन्द्रहस्त, (३) कुज-(भौम) हस्त,
(४) बुधहस्त, (५) गुरुहस्त, (६) शुक्रहस्त, (७) शनिहस्त,
(८) राहुहस्त तथा (६) केतु हस्त। इन सभी के लक्षण तथा योजना
आदि अभिनयदर्पण में देखना चाहिए। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में संयुक्त हस्तों
के ६ अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये गये हैं। यथा-(१) कर्तरीस्वस्तिकहस्त,
(२) स्वस्तिकहस्त, (३) पताकस्वस्तिक, (४) कलश, (५) तिलक
तथा (६) वैष्णव । इनके स्वरूपादि भी (कारिका संख्या २१८ से २२५
तक) नाट्यशास्त्रसंग्रह में देखना चाहिए ।
१५५-१५६. बिना हस्त के कोई 'नाट्य' नहीं होता है। यहाँ नाट्य
शब्द का अर्थ है 'नाट्य' के उपयोगी अभिनय में विभावादि, जिसका रूप
जो दिखाई दिया है तथा जिसको बतलाया गया है 'वह' ।
१५७. यहाँ 'अर्थ का आशय' शोभातिशय और अभिनय-सामर्थ्य है ।
छन्दतः = नाट्याचार्य की इच्छा के तथा अनुभव के अनुसार रहने वाले
प्रयोग । लोकधर्मी इतिकर्तव्यता को दिखलाने वाले अभिनय, रस तथा भाव
के सूचक जो 'हस्त' हों उन्हें ।
१५८. देश = क्षेत्रविशेष । प्रयोग = सुकुमार एवं उद्धत रूपकविशेष-
अर्थयुक्ति = अभिधेय (वाच्य) गौण (लाक्षणिक, लक्ष्य) तथा प्रतीयमान
या व्यङ्ग्य अर्थ की उपपत्ति । पुरुषों के आचार स्त्रियों की अपेक्षा सामान्य
होते हैं अतः उनकी अपेक्षा स्त्रियों के विशेष रूप में हस्त प्रयुक्त किये जाएँ ।
१५६-१६४. रस और भाव के अनुसार स्थायी एवं संचारी के भेद से
तथा भिन्न-भिन्न विभाव भेद के कारण हस्तकर्म होते हैं। जैसे-विदूषक के
२६ ना० शा० द्वि०
४०२ नाट्यशास्त्र
प्रति केशों का आकर्षण खटकामुखहस्त से, प्रिया के प्रति अरालहस्त से, क्रीडा
और कलह की दशा में मुष्टिहस्त के द्वारा । इस प्रकार क्रियाओं की स्थिति
रस, भाव के अनुसार स्वयं कल्पना कर योजना की जाए । इस प्रकार इन
हस्तप्रचारों को नेत्र, मुखराग एवं भ्रुकुटि के साथ उनके भावों को व्यक्त करते
हुए रखना चाहिए । परोक्ष अभिनय में दृष्टियों को हस्त के अनुगत रखना
चाहिए, प्रत्यक्ष अभिनय में हस्तों का अनुगम नहीं होगा वहाँ इसके विपर्यय
अर्थात् प्रतिकूल क्रम रहेगा ।
१६५. करण का अर्थ है आवेष्टित आदि क्रियाएँ । कर्म = विधेय या
कर्तव्य । स्थान = ललाट आदि प्रदेश तथा उत्तान, अधोमुख, ऊर्ध्वमुख जैसी
स्थिति । प्रचार = स्वल्प, मध्य एवं अधिक प्रमाण में हस्तों का चालन ।
युक्ति = अर्थ के विषय में गौण या मुख्य की उपपत्ति या बारीकी से विचार
कर तदनुसारी अभिनय करना । यदि ब्राह्मण गौ है ( बैल या मूर्ख है ) तो
उसके मृग ( पशु ) रूप अर्थ को स्वरूप मान कर कर्तरीमुख या मृगशीर्ष
बहुल हरिण ( पशु ) का अभिनय उपयुक्त नहीं किन्तु ऐसे समय मूर्खता के
अभिनय में चतुर, शुकतुण्ड, शिखर एवं निषध हस्तों का प्रयोग प्रायः उपयुक्त
होता है । इसी प्रकार विशेषणविशेष्यभाव का विचार करना भी युक्ति
कहलाता है । जैसे लम्बकर्ण में लम्बे कानों का या जिसके लम्बे कान हों उसका
भी अभिनय किया जाता है । क्रिया यह तीन प्रकार की होती है, विधिरूपा,
निषेधरूपा तथा अनुभयरूपा ( विधि एवं निषेध से रहित ) । 'जाओ मत
जाओ' इत्यादि विधि में प्रत्ययार्थ का ही अभिनय होता है, निषेध में केवल
नञर्थ का और अनुभय में केवल प्रकृत्यर्थ का ही अभिनय होता है । इन
सभी का व्यापक कारण लोकोपचार ( लोकव्यवहार ) है ।
१६६. हस्तों के निरूपण के बाद अब उनके 'स्थान' बतलाते हैं । स्थान
अर्थात् करण तथा कर्म । यहाँ हस्तों के विभागपूर्वक वर्णन को दिया गया है
कि—उत्तम पात्र का सन्निकृष्ट प्रदेश में, मध्यम पात्र का मध्यम प्रदेश में तथा
अधम पात्र का विप्रकृष्ट प्रदेश में अभिनय किया जाए । यहाँ ललाटादि शब्द
उपलक्षणार्थक हैं । इन क्षेत्रों में वर्तना के नियोजन के साथ-साथ उत्तमपात्र
( राजा आदि ) अपने स्वरूप के उपयुक्त स्थानों पर अभिनय करें । इससे यह
भी सूचित किया गया है कि देव, गुरु, नृप आदि उत्तम पात्र ललाट क्षेत्रस्थ
अञ्जलि हस्त से, अमात्य, विदूषक आदि मध्यमपात्र वक्षःस्थ चतुरादिहस्तों
से तथा चर आदि अधमपात्र शुकतुण्ड आदि हस्तों से अपना अभिनय करें ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०३
१६७. अभिनय के विषय में अन्य तथ्य भी बतलाते हैं—ज्येष्ठ इत्यादि
से । ज्येष्ठ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के चतुर्वर्ग के उपदेश प्रदाता उत्तम
नाटकादि के प्रयोग में प्रत्यक्ष की प्रधानता है अतः हस्त का स्वल्प अभिनय
रहना चाहिए। भाण आदि हास्य प्रधान भाण प्रहसन आदि रूपकों के प्रयोग
में मध्यम हस्त प्रयोग रखना चाहिये क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष की प्रधानता के
साथ आकाशभाषितादि की भी बहुलता रहती है। नृत्त षिद्गकादि अधम में
प्रकीर्ण हस्तों का अभिनय किया जाए ।
१ : ८ . लक्षण अर्थात् वर्तना के क्रम से योजित 'सौष्ठव' अर्थात् वर्णित
स्वरूप के अनुगत । अधमपात्रों के हस्त लक्षणों के अनुगत नहीं रहते वे केवल
लोक क्रिया के अनुगत रहते हैं ।
१६६. अन्य आचार्यों के मत को अथवा के द्वारा यहाँ दिखलाया जा रहा
है । जैसा समय हो—अर्थात् भय, जुगुप्सा, आदि में तथा शीत, वर्षा या आतप
के योग में हस्तों की अस्फुट या अटपटी स्थिति ही सौष्ठव है । विपरीत या
भिन्न स्वरूप का आशय है कि अवहित्थादि में सौष्ठव की योजना न करना ही
सौष्ठव है ( तथा यही वैपरीत्य है ) ।
१७०-१७३. विहस्त = हस्त में विकलता रहना । मद्यपान से युक्त
'मदमत्त' तथा प्रमाद करने वाला व्यक्ति 'उन्मत्त' कहलाता है । ( परन्तु )
जो हस्त आन्तरिक चित्तवृत्तियों को सूचित करें उनको अवश्य प्रस्तुत किया
जाए । जैसे कपोतहस्त भय को, मदन हेतुक जृंभा ( जंभाई ) को कर्कटक-
हस्त, कपोतहस्तजैसे शोक को और शुकतुण्डहस्त ईर्ष्या को सूचित करता है
तो ऐसे हस्तों का अवश्य प्रयोग द्वारा किया जाए ।
१७४. यहाँ हस्ताभिनय प्रयोग के सभी निषेध स्थल बतलाये गये हैं।
जैसे सारथि के द्वारा घोड़ों की रस्सी सम्हालने के कारण दोनों हाथों के
व्यस्त रहने की स्थिति में हस्ताभिनय संभव नहीं होता । विलोकनं पद से
चित्तवृत्ति के मालूम हो जाने पर कि यह कैसा है इसे देखने से मुखराग आदि
के द्वारा स्फुटरूप से अभिनय करे ।
१७५. अब दिशाओं के भेद से हस्तप्रचार को कहते हैं—उत्तान इत्यादि
के द्वारा । जैसे 'पृथ्वी पर निर्माण किया' के अभिनय में किया जाने वाला
पताकहस्त उत्तान रहता है या आगे की ओर जाने वाला त्रिपताक भी ।
पार्श्व में—जैसे धनुष चलाने के अभिनय में मुष्टि हस्त का प्रयोग । अधो-
मुख—जैसे समुद्र के अभिनय में स्वस्तिक पताक हस्त का ललाटक्षेत्र गत
प्रयोग करना ।
४०४ नाट्यशास्त्र
१७६-१७७. हस्तों को व्यवस्थित रूप में निष्पादित कर (लक्षणानु-
सारी) प्रस्तुत करना ही अभिनय की 'वस्तु' है। इनमें अनुभावात्मक
'करण' होते हैं तथा इनका सञ्चय अङ्गहार हो जाता है जिनका विवरण ना०
शा० ४ अध्याय में दिया जा चुका है। स्थान, चारी तथा नृत्तहस्तों में अब
नृत्तहस्तों का निरूपण प्रसङ्ग प्राप्त हैं। इसके बाद क्रमशः स्थान एवं चारी
का विवरण कहा जायगा।
नृत्तहस्त—
१७८. चतुरस्र नृत्तहस्त :—वक्षःस्थल से हटकर जो अष्टाङ्गुल प्रदेश
हो उस पर रहने वाले दो हाथ। आशय यही है कि एक हाथ जब वक्षः पर
हो और दूसरा हाथ आठ अंगुल से हटे हुए स्थान पर हो तो दोनों हाथों में
आठ अंगुल का अन्तर रहेगा। इस प्रकार के अन्तर रहने से हाथों में चतुरस्र
रहता है। प्राङ्मुख से आशय है कि प्रयोक्ता जिसके सम्मुख होगा उसी के
सम्मुख चतुरस्र हस्त हों। कूर्पर तथा अंसों में तराजू की डंडी की तरह
समता रखी जाए। इसका अभिनय आकर्षण विशेष में किया जाता है।
१७६. उद्वृत्तहस्त :—(आशय यही कि) 'हस्त पहिले चतुरस्र होकर
बाद में उद्वेष्टित (व्यावृत्त) वर्त्तना प्रचार से हंसपक्ष कर दिये जाते हैं।
आवर्त्तन के समय ऊपर की ओर आवर्त्तन करने से 'उद्वृत्त' हैं। इसी की अन्य
संज्ञा 'तालवृन्तक' भी है।
१८०. तलमुख हस्त :—यहाँ 'तथा' पद का अर्थ है कि व्यावृत्त तथा
उद्वृत्त पूर्व में कर लिये जाएँ फिर इसको प्रस्तुत करे। इसमें समाप्ति के
समय हंसपक्ष हस्त रखे जाए। इसके तलमुख नाम का हेतु है दोनों हथेलियों
का एक दूसरे के सम्मुख हो जाना। मर्दल आदि अवनद्ध वाद्य वादन में इसकी
योजना रखी जाती है।
१८१. स्वस्तिक तथा विप्रकीर्णहस्त :—तावेव = अर्थात् 'तलमुख'
हस्त ही। 'स्वस्तिक' = स्वस्तिकाकार में। विप्रकीर्णहस्त पूर्व में कहे गये
चारों नृत्तहस्तों का आधार लेकर प्रवृत्त होता है यही यहाँ समझना चाहिए।
१८२. अरालकटकामुखहस्त :—अराल के प्रचार द्वारा एक हस्त को
अराल तथा द्वितीय को कटकामुख चतुरस्र के संस्थान के साथ प्रस्तुत
किया जाता है। अन्य लक्षण से स्वस्तिक संस्थान से अराल एवं कटकामुख
हस्तों को रखा जाए। इसका अभिनय वणिक् या सचिव पात्र के वितर्क में
किया जाता है।