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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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३९२ नाट्यशास्त्र
अल्पार्थ, स्वर्ण, ताम्र, लोह, गीलापन, दुःख, रसास्वादन, नेत्र, वर्णभेद,
प्रमाण, माधुर्य, मन्दगति, खण्ड खण्ड करना, मुख, घृत तथा तैल के भावो को
प्रदर्शन करने में की जाती है। (अभि० द० १४६-१५२)
'नाट्यशास्त्र संग्रह' में चतुर का स्वरूप इस प्रकार है :—यदि सर्पशीर्ष
हस्त में कनिष्ठिका अंगुली टेढ़ी होकर झुके तथा अंगूठे को मध्यमा के मूल
में टेढ़ा कर स्पर्श करते हुए रखा जाए तो 'चतुर-हस्त' होता है।
योजना—यदि नय या आदर व्यक्त करना हो तो मुख के सामने चतुर
हस्त को रखा जाता है। इसी प्रकार कलाई में स्वस्तिक कर दो चतुर
हस्त एक दूसरे को पार करते हैं तो उससे विनय या सहिष्णुता दिखलाई
जाती है। किसी प्रश्न पर विचार दिखलाने के लिए एक बाजू चतुर हस्त
को रखते हैं तथा किसी छानबीन या विकल्प युक्त विचार में इसी हस्त
को हृदय के पास रखते हैं। लीला विलास में दोनों हस्त उद्वेष्टित दशा में
रखे जाते हैं। ऊपर की ओर समतल चतुर हस्त से कैतव तथा अक्ष क्रीड़ा
की प्रेरणा, मृदुता बतलाना हो तो अंगुष्ठ और मध्यमा के परस्पर मर्दन
के द्वारा तथा चतुराई दिखलाने में दो चतुर हस्तो को मिला कर ऊपर
जाते हुए रखा जाता है (ना० शा० सं—१४८-१५२)
६६-१०१. भ्रमर-हस्त :—सन्दष्ट का अर्थ है अग्रभाग से श्लिष्टता
या संयोग रहना। इनकी भ्रमर जैसी आकृति रहने के कारण 'भ्रमर' नाम
करण हुआ है। अभिनयदर्पण के अनुसार भ्रमर, शुक, पखना (पक्ष),
सारस, कोकिल तथा अन्य ऐसे ही पक्षियों के भाव को व्यक्त 'करने में भ्रमर,
हस्त की योजना रहती है (अभि० द० ५२-१४५) 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' के
अनुसार इस हस्त की योजना—कमलनाल को ग्रहण करने में, पुण्य को लेने
या कर्णपूर बनाने, तालपत्र लेने और कांटा निकालने में की जाती है
(ना० शा० सं०—१६१-१६२)।
१०२-१०३. हंसास्य-हस्त :—तर्जनी, मध्यमा और अंगुष्ठ ये तीनों
'निरन्तर' अर्थात् अलग-अलग रहने का इसमें निषेध है। (अन्तर = व्यवधान
या दूरी)। अभिनयदर्पण' में इस हस्त की योजना—मांगलिक कार्य, मंगल
सूत्र या सूत्र बांधने, उपदेश, विवाद-निर्णय, रोमान्च, मौक्तिकादि माला,
दीपक की बत्ती आगे सरकाने, कसौटी, चमेली, चित्र, चित्ररचना, दंशन
और जल के बांध (जलबन्ध) को दर्शाने में की जाती है।