नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९७
कटक :--
सन्दंशेष्यूर्ध्वभागे तु मध्यमानामिकान्वया ।
कटको हस्त उच्यते ॥
यदि सन्दंश हस्त में मध्यमा और अनामिका के अग्रभागों को अँगूठे से
मिला दिया जाए तो 'कटकहस्त' हो जाता है ।
एतस्य विनियोगस्तु............दर्शने ।
आह्वानभावचलने............. ॥
योजना— देखने.........बुलाने तथा चलने आदि को दिखलाने में कटक
हस्त की योजना की जाती है ।
पल्ली हस्त :—
मयूरे तर्जनीपृष्ठ मध्यमेन युतो यदि ।
पल्लिहस्तः स विज्ञेयः पल्यर्थे विनियुज्यते ॥
यदि मयूरहस्त में मध्यमा अङ्गुली को तर्जनी के पीछे मोड़ कर अगले
भाग से लगाया जाए तो 'पल्ली हस्त' हो जाता है। इसकी योजना बस्ती,
गाँव की झुग्गी-झोपड़ियों को दर्शाने में रखी जाती है ।
संयुत-हस्तमुद्राएँ :—
१२६-१२८. अञ्जलिहस्तः—यहाँ लक्षण में 'तु' शब्द के द्वारा अन्य
हस्तों के संश्लेषण में नामान्तर के होने की स्थिति बन जाती है यह दिखलाया
है जैसे सूचीमुख के सम्बन्धों का अभिनय करते हैं। मुद्राओं में असंयुतमुद्राओं
का अधिक महत्त्व एवं उपयोग है क्योंकि इन्हीं से संयुत हस्तों का निर्माण भी
होता है । जैसे संयुत हस्त अञ्जलि से नमस्कार दिखलाया जाता है, वही दो
पताक हस्तों से मिला कर भी दिखलाया जा सकता है परन्तु व्यवहारोपयोगी
होने से संयुतमुद्राओं का अलग से दिखलाना परमावश्यक है ।
१२६-१३१. कपोतहस्तः--कपोत शब्द की व्युत्पत्ति है 'कम्पते इति
कपोतः' भीरुः पक्षी कांपता है इसलिये कपोत अर्थात् डरपोक पक्षी । इसी
स्वभाव से अन्य भीरु भी प्रकृति से गृहीत होने से 'कपोत' नाम से भीरुता
ली जाती है। इस हस्त की भीत व्यक्ति के अतिरिक्त कम्पित के अभिनय में
भी योजना रहती है। स्त्रियों के उरोज कम्पन के भयजन्य होने से इसका
प्रधानतः अभिनय रहता है। इसका कूर्मवत् आकार होने से इसे 'कूर्मक' भी
समझा जा सकता है ।