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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 668 में से

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पृष्ठ 498

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८७
आती हो तो स्त्रियों के द्वारा उनकी वैसी योजना अवश्य करनी चाहिए। इसका
आशय यह नहीं कि स्त्रियों के द्वारा प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक हस्त न हो
और ऐसी दशा में अराल हस्त रहे। परन्तु परम्परा यह है कि पुरुषों के द्वारा
प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक के स्थान पर सर्वत्र अराल हस्त के प्रयोग नहीं
किये जाएँ। अभिनयदर्पण में अराल का अल्प विवरण ही प्राप्त होता है
तदनुसार यदि पताकहस्त में तर्जनी मोड़ दी जाए तो अरालहस्त हो
जाता है। जिसकी योजना विषपान, अमृत-पान, प्रचण्ड पवन के चलने जैसे
भावों को प्रदर्शित करने में की जाती है। नाट्यशास्त्र संग्रह में तथा अन्यत्र
विवरण भरत प्रदर्शित ही रखे गये हैं, विशेष कुछ भी नहीं।
५२-५३ शुकतुण्ड हस्त :-कारिका में स्थित 'तु' शब्द अरालहस्त
की तर्जनी से इस हस्त की विशेषता दर्शाने की भावना से रखा गया है तथा
दूसरी बार 'तु' का अर्थ 'अपि' होगा। 'न तुम न मैं' इत्यादि निषेध में इस
हस्त का अभिनय होता नहीं है किन्तु अर्थना, ईर्ष्या, प्रणयकलह में जब
'तुम नहीं', मैं इसे 'नहीं' जैसे भाव को दर्शाना हो तो इस हस्त का प्रयोग
होना चाहिए। सावज्ञ तिरस्कार या विसर्ग ( विदाई ) की दशा में प्रयोग
के अनुसार एक या दो बार इस हस्त का प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी
निन्दा ( आत्म धिक्कार ) के अर्थ में भी इसी हस्त की योजना रखी जाती
है। अभिनयदर्पण में इस हस्त की योजना बाण चलाने, बर्छी, भाला मारने
अपने निवास स्थान का स्मरण, मार्मिक या रहस्य भरी बात कहने तथा
उग्र भाव के प्रदर्शन में की जाती है। नाट्यशास्त्रसंग्रह के अनुसार नाट्य-
शास्त्र के विवरण का ही अनुमोदन है। केवल उपर्युक्त अर्थों के अतिरिक्त
द्यूत और अक्ष फेंकने में भी इसी हस्त की योजना का विशेष उल्लेख है।
५४-५५. मुष्टि हस्त :-लक्षण कारिका के 'संज्ञित शब्द से आशय
यह है कि लोक में भी इसी प्रकार मुष्टि प्रसिद्ध है। व्यायाम पद के द्वारा
कुश्ती के समय, खड्गयुद्ध के अवसर पर मुष्टि हस्त का प्रयोग किया जाता
है। 'निर्गम' शब्द से गीली वस्तु या गीले कपड़े को निचोड़ने में, 'पीडन'
अर्थात् गौ, महिषी जैसे पशुओं के दोहन में, असियष्टि शब्द का आशय
तलवार आदि से लेकर छुरी आदि मूठवाले शस्त्र ग्रहण का इसी के द्वारा
अभिनय किया जा सकता है। आदि शब्द से किसी के मारने या मार्जन
(सफाई करने) में भी इसी हस्त का प्रयोग किया जाता है। नाट्यशास्त्र
संग्रह में इस के द्वारा दौड़ना तथा विभिन्न युद्धों के करतब दिखलाने की