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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 668 में से

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पृष्ठ 513

४०२ नाट्यशास्त्र
प्रति केशों का आकर्षण खटकामुखहस्त से, प्रिया के प्रति अरालहस्त से, क्रीडा
और कलह की दशा में मुष्टिहस्त के द्वारा । इस प्रकार क्रियाओं की स्थिति
रस, भाव के अनुसार स्वयं कल्पना कर योजना की जाए । इस प्रकार इन
हस्तप्रचारों को नेत्र, मुखराग एवं भ्रुकुटि के साथ उनके भावों को व्यक्त करते
हुए रखना चाहिए । परोक्ष अभिनय में दृष्टियों को हस्त के अनुगत रखना
चाहिए, प्रत्यक्ष अभिनय में हस्तों का अनुगम नहीं होगा वहाँ इसके विपर्यय
अर्थात् प्रतिकूल क्रम रहेगा ।
१६५. करण का अर्थ है आवेष्टित आदि क्रियाएँ । कर्म = विधेय या
कर्तव्य । स्थान = ललाट आदि प्रदेश तथा उत्तान, अधोमुख, ऊर्ध्वमुख जैसी
स्थिति । प्रचार = स्वल्प, मध्य एवं अधिक प्रमाण में हस्तों का चालन ।
युक्ति = अर्थ के विषय में गौण या मुख्य की उपपत्ति या बारीकी से विचार
कर तदनुसारी अभिनय करना । यदि ब्राह्मण गौ है ( बैल या मूर्ख है ) तो
उसके मृग ( पशु ) रूप अर्थ को स्वरूप मान कर कर्तरीमुख या मृगशीर्ष
बहुल हरिण ( पशु ) का अभिनय उपयुक्त नहीं किन्तु ऐसे समय मूर्खता के
अभिनय में चतुर, शुकतुण्ड, शिखर एवं निषध हस्तों का प्रयोग प्रायः उपयुक्त
होता है । इसी प्रकार विशेषणविशेष्यभाव का विचार करना भी युक्ति
कहलाता है । जैसे लम्बकर्ण में लम्बे कानों का या जिसके लम्बे कान हों उसका
भी अभिनय किया जाता है । क्रिया यह तीन प्रकार की होती है, विधिरूपा,
निषेधरूपा तथा अनुभयरूपा ( विधि एवं निषेध से रहित ) । 'जाओ मत
जाओ' इत्यादि विधि में प्रत्ययार्थ का ही अभिनय होता है, निषेध में केवल
नञर्थ का और अनुभय में केवल प्रकृत्यर्थ का ही अभिनय होता है । इन
सभी का व्यापक कारण लोकोपचार ( लोकव्यवहार ) है ।
१६६. हस्तों के निरूपण के बाद अब उनके 'स्थान' बतलाते हैं । स्थान
अर्थात् करण तथा कर्म । यहाँ हस्तों के विभागपूर्वक वर्णन को दिया गया है
कि—उत्तम पात्र का सन्निकृष्ट प्रदेश में, मध्यम पात्र का मध्यम प्रदेश में तथा
अधम पात्र का विप्रकृष्ट प्रदेश में अभिनय किया जाए । यहाँ ललाटादि शब्द
उपलक्षणार्थक हैं । इन क्षेत्रों में वर्तना के नियोजन के साथ-साथ उत्तमपात्र
( राजा आदि ) अपने स्वरूप के उपयुक्त स्थानों पर अभिनय करें । इससे यह
भी सूचित किया गया है कि देव, गुरु, नृप आदि उत्तम पात्र ललाट क्षेत्रस्थ
अञ्जलि हस्त से, अमात्य, विदूषक आदि मध्यमपात्र वक्षःस्थ चतुरादिहस्तों
से तथा चर आदि अधमपात्र शुकतुण्ड आदि हस्तों से अपना अभिनय करें ।