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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 668 में से

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पृष्ठ 510

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९९
अँगुलियाँ बाहर की ओर हों और हस्तों का पृष्ठभाग बहिर्मुह हो तो यही
'विपर्यस्तत्व' है। उत्सङ्ग में लेने की योग्यता के होने से इसका 'उत्सङ्ग'
सार्थक नाम है। स्पर्शस्य अर्थात् जो परोक्षभूत वस्तु है उसके स्पर्श करने
के अभिनय में ऐसे ही उत्सङ्ग हस्त का प्रयोग किया जाता है।
'निष्पीडितः पुनः' के स्थान पर 'सिंहावलोकिते' पाठ भी है। सिंहने
देखा या सिंह को देखा इन दोनों अर्थों को यहाँ लिया जा सकता है। एक
बार कर्त्ता में तथा दूसरी बार में षष्टी का विधान कर यहाँ अर्थ समझना
चाहिए। अभिनयदर्पण के अनुसार—आलिंगन करने, लज्जा का अनुभव
करने, भुजबन्ध को दिखलाने और बालकों को शिक्षण देने के अर्थ बतलाने
में इस हस्त का प्रयोग किया जाता है। अभि० द० १८४-१८५)
१३६-१४१ निषध-हस्तः—कपित्थ हस्त से वेष्टित मुकुलहस्त का धारण
करना 'निषध' है। 'निषण्णं धत्ते इति निषधः' यह इसकी व्युत्पत्ति है। संग्रह
का अर्थ है शास्त्र का सम्यक् ग्रहण या समझना। संक्षिप्त के अभिनय से यह
बतलाया कि संक्षेपवत् द्रव्य का अभिनय इसी हस्त के द्वारा किया जाए।
अथवा संक्षिप्त का अर्थ है सम्यक् क्षिप्त अर्थात् ठीक से स्थापित। अभिनय-
दर्पण में निषधहस्त का स्वरूप नहीं मिलता है।
१४२-१४३. दोलाहस्त :--हाथों के पूरे लम्बे करने पर ही कन्धों में
शिथिलता होती है। या पताक हस्त की अँगुलियों के अवष्टम्भ के आधार
को उद्धार या हटाने में अँगुलियों के शिथिल करने पर दोला के आकार का
हस्त हो जाने से यह 'दोला' कहलाता है। भिन्न-भिन्न अभिनेय वस्तुओ में इस
बाजू से उस बाजू में जाना, निपतन तथा स्तब्धत्व आदि को समझना चाहिए।
अभिघात का अर्थ है शीत, वर्षा या आतप के चारो ओर से आने पर दोष
या अकुलाहट होना। अभिनयदर्पण के अनुसार अभिनय के आरम्भ में इस
हस्त का प्रयोग किया जाता है। (अभि० द० १८१-१८२)
१४४-१४५. पुष्पपुट हस्त :—सर्पशीर्ष हाथों के पुट से अर्थात् दोने के
आकार (द्रोणाकार) में बनाए हस्तों से पुष्पों को लेना होने से इसे
'पुष्पपुट' कहा जाता है। 'अभिनयदर्पण' के अनुसार आरती उतारने,
पानी या फल के ग्रहण करने, सन्ध्या करने, अर्घ्यदान करने तथा मन्त्रशक्ति
युक्त पुष्प के अर्थ को प्रकट करने में इस हस्त की योजना की जाती है।
(अभि० द० १८२-१८३)