नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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१३२-१३३. कर्कट-हस्तः—केंकड़ों की दाढ़ के आकार में अँगुलियाँ
एक दूसरे के सामने रहने से इसकी 'कर्कट' संज्ञा हुई । मदन के विकार
में अङ्गों से अङ्गों के मर्दन या मरोड़ने के अभिनय में तथा सोकर उठने के
समय या अन्य किसी समय आने वाली जम्भाई में इसी हस्त का उपयोग
होता है । बृहदाकार देह के फैलाने में पेट पर हथेलियों को सामने कर इस
हस्त को रखा जाता है। हनु के धारण में अँगुलियों पर हनु को रखा जाता
है । अर्थतत्व अर्थात् अभिनेय वस्तु के तत्व को अभिनय काल में प्रयोग करने
में समर्थ आचार्यों के द्वारा ऐसे हस्त के प्रयोग स्वविवेक पूर्वक किये जाएँ ।
१३४-१३५. स्वस्तिक-हस्तः—स्वस्तिक दो प्रकार का होता है एक
शुद्ध स्वस्तिक तथा दूसरा मुष्टिकास्वस्तिक रूप विशिष्टस्वस्तिक । जहाँ
शुद्ध स्वस्तिक पद का उपादान होता है वहाँ ऐसा मणिबन्धन्यास सन्निवेश
मानना चाहिए—जैसे चिन्ता के अभिनय में । अर्थ एवं प्रकरणादि के आधार
पर अन्य प्रदेशों में भी यही प्रवृत्ति रखनी चाहिए । जैसे—'स्वस्तिकविच्युति'
से पताक के साथ भी इस हस्त का प्रयोग किया जाता है । कलाई पर सामने
की ओर रखना ही इसका लक्षण कुछ विद्वान् मानते हैं । स्वस्तिक के लक्षण
तथा स्वरूप वाला होने से इसे 'स्वस्तिक' कहते भी हैं ।
१३६. खटकावर्धमानक-हस्तः—जहाँ परस्पर अभिमुख दो खटक हो वह
इसका रूप है । खटक पर खटक को रखने से खटकावर्धमानक । इसका खटक
के चारों ओर योग या सम्बन्ध रहने से खटकावर्धमानक सार्थक नाम-करण
समझना चाहिए । शृंगारार्थ अर्थात् शृंगार के प्रयोजन वाले कार्य जैसे
ताम्बूल ग्रहण आदि में । जैसा कि आगे गतिप्रचार में कहा भी है—'खट-
कावर्धमानौ तु कृत्वा विटगतिं व्रजेत्' ( १३-१२० ) [ 'खटकावर्धमान हस्तों
को रख कर विट की चाल में चले' ] । अपनी स्वामिनी को प्रसन्न करने के
लिये प्रणाम करने में भी तथा ऐसे प्रयोजन के समय भी इसी हस्त का प्रयोग
किया जाता है ।
१३७-१३८. उत्सङ्ग-हस्तः—'विपर्यस्तत्व' का आशय है स्वस्तिका-
कार । अर्थात् दाहिना हाथ बाँये कन्धे के दायरे में रखना, जिससे प्रकोष्ठ-
स्वस्तिकत्व संकेतित होता है। अन्य के मत में स्वस्तिक की दक्षिण पार्श्व
में स्थिति ही विपर्यस्तत्व है तथा अन्य इसे अधोमुखत्व भी मानते है । अभि-
नवगुप्त पाद ने इस पर युक्तियुक्तता से विचार रख बतलाया कि ऐसा प्रतीत
होता है कि जब कूर्परों को स्वस्तिकाकार रख प्रवेश रहित स्थान से