नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 506, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९५
योजना—पल्लव, चित्रफलक, लेखन आधार, नदी तट, 'दोनो' के कथन
के लिये, आरा, छुरी, गोपुर तथा शिखर का भाव दिखलाने में अर्धपताक
हस्त की योजना की जाती है ।
मयूर :—
अस्मिन्ननामिकांगुष्ठौ श्लिष्टौ चान्याः प्रसारिताः ।
मयूरहस्तः कथितः करटीकाविचक्षणैः ।
यदि ( कर्तरीमुख की ) अनामिका को अंगूठे से मिला कर शेष अङ्गुलियों
को बाहर की ओर फैला दिया जाए तो उसे विद्वान् 'मयूर हस्त' कहते हैं ।
मयूरास्ये लतायाञ्च शकुने वमने तथा ।
अलकस्यापनयने ललाटतिलकेषु च ।
नद्युदकस्य निक्षेपे शास्त्रवादे प्रसिद्धके ।
एवमर्थेषु युज्यन्ते मयूरकरभावनाः ॥ ( १०८-११० )
योजना—मयूरमुख, लता, शकुन, वमन, केशों को फैलाने या उठाने,
ललाट पर तिलक लगाने, नदी जल को उछालने, शास्त्रार्थ करने तथा प्रसिद्ध
वस्तु के निर्देश करने में 'मयूरहस्त' की योजना की जाती है ।
चन्द्रकला :—
सूच्यामङ्गुष्ठमोक्षे तु करश्चन्द्रकला भवेत् ।
यदि सूचीहस्त में अंगूठे को खोल कर आगे तान दिया जाए तो उसे
'चन्द्रकला' हस्त कहते हैं ।
चन्द्रे मुखे च प्रादेशे तन्मात्राकारवस्तुनि ।
शिवस्य मुकुटे गङ्गानद्यां च लगुडेऽपि च ।
एषा चन्द्रकला चैव विनियोज्या विधीयते ॥
( १३२, १३३ )
योजना—चन्द्र, मुख, हाथ की बालिश्त ( प्रादेश ), अर्धचन्द्राकार
वस्तु, शिव का मुकुट, गङ्गा नदी और लकड़ी या डंडा आदि के निर्देश में
'चन्द्रकला-हस्त' की योजना की जाती है ।
सिंहमुख :—
मध्यमानामिकाग्राभ्यामङ्गुष्ठो मिश्रितो यदि ।
शेषौ प्रसारितौ यत्र स सिंहास्यकरो भवेत् ॥