नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ नाट्यशास्त्र
उसका अर्थ है कटिप्रदेश की कृशता । 'पीन' के स्थान पर कहीं 'पान' पाठ
माना गया है। तब 'पान' का अर्थ होगा चषकादि पानपात्र । 'अभिनयदर्पण'
के अनुसार 'पताक हस्त मुद्रा में अंगूठे को बाहर सीधे फैलाने पर 'अर्धचन्द्र'
हस्त हो जाता है । इसके द्वारा कृष्णपक्ष की अष्टमी का अर्धचन्द्र, हाथ से
किसी के गले को ढकेलना (गलहस्त ), भाले से युद्ध करना, देवता का
अभिषेक, भोजन, पान, उद्भव, कटि, चिन्ता, मननं, ध्यान, प्रार्थना,
अंगस्पर्श तथा प्राकृतजन को नमस्कार का भाव प्रदर्शित किया जाता है ।
नाट्यशास्त्रसंग्रह में अर्धचन्द्र के स्वरूप को दूसरी शब्दावली में दिया है ।
तदनुसार—'यदि चारों अंगुलियाँ एक दूसरे के साथ मिली हों और अंगूठा
दूसरी ओर गोलाकार बनाते हुए चन्द्रलेखा का आकार बना ले तो अर्धचन्द्र'
हस्त हो जाता है' । इसकी योजना ऊपर स्थित 'बालचन्द्र' को दिखलाने में की
जाए। यदि छोटे वृक्ष को बतलाना हो तो हाथ को ऊपर की ओर ले जाया
जाय, खेद में इसी हस्त को कपोल पर रख कर तथा मध्यभाग की कृशता
को बतलाने में हस्तों को सामने की ओर मिला कर हटाते हुए दर्शाया जा
सकता है । ( ना. शा. सं. ११४-११५ ) ।
४५-५१. अराल ( हस्त ) —कारिकास्थ "आद्य" शब्द का अर्थ है प्रथम
या तर्जनी अँगुली । इसमें मध्यमा से लेकर शेष अँगुलियाँ पूर्व अंगुली के साथ
पीछे लगी हुई रहती हैं । अराल का अर्थ है 'कुटिल' क्योंकि 'अराल-पक्ष्मणः'
इत्यादि में अराल का अर्थ वक्र होता है। कारिकास्थ गांभीर्य वह पदार्थ है
जिसके प्रभाव से हर्ष, शोक एवं भय प्रभृति भावों की दशा में भी आकार पर
उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती हो । अरालहस्त का हृदय, बाजू, आगे
की ओर चंचलता से घूमते हुए आने या चलने का प्रयोग युक्ति के साथ
(नाट्याचार्य के द्वारा ) करवाया जाना चाहिए । संग्रह पद का अर्थ है केशों
का बाँधना तथा उत्कर्ष का अर्थ है उन्हे खोलकर जमा देना । 'सर्वाङ्गिक' शब्द
से आशय है कि उसे उस बाजू से अपनी ओर लाना या प्रत्यागमन । 'सम्पयोग'
का अर्थ है मात्र संश्लेष होना, जो अंगुलियों के अगले भाग में स्वस्तिक के
योग से होता है। परिमण्डल = एक बाजू से दूसरी बाजू घूमते हुए वर्तुलाकार
में भ्रमण । आह्वान में अंगुलियाँ नीचे गिरती हुई और निवारण में बाहर की
ओर फेंकी जाने वाली रखनी चाहिए । त्रिपताक हस्त से जो आवाहन,
अवतरण आदि भाव अभिनीत होते हैं वे अराल हस्त से भी दिखलाये जा
सकते हैं । जिस प्रयोग से जिन हस्तों या अंगों के द्वारा प्रयोग में सौन्दर्यसम्पत्ति