नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३९३
१०४-१०७. हंसपक्ष-हस्त :—प्रत्यक्ष और परोक्ष को स्वस्तिकाकार
हाथों से अभिनीत करते है। आलिङ्गन और महास्तम्भ के अभिनय को
संयुक्त हस्त द्वारा एक कन्धे से दूसरे कन्धे पर हाथों को रख कर किया जाता
है। 'यथारसम्, का आशय है कि शृङ्गार, हास्य, अद्भुत तथा करुणादि में
व्यभिचारी विशेष के योग से दृष्टिविशेष रूप जो अनुभाव हैं उनसे स्पष्ट होने
वाले ( ऐसे ) हस्त प्रयोग विशेष स्वरूप के हस्तों से समझकर प्रस्तुत किये
जाना चाहिए। यह ध्यान सभी हस्तों के प्रयोग के समय रखा जाना
चाहिए। 'अभिनयदर्पण' के अनुसार छः की संख्या, सेतुबन्ध, नखों से रेखा
बनाने या कुरेदने या टँकने के भाव दिखलाने में भी इस हस्त की योजना की
जाती है। ( अभि० द० १५७-१५६ )
१०८-११४ सन्दंश-हस्त :—पुष्पों के चयन और छोटे कांटों के निकालने
में अग्रसन्दंश का प्रयोग होता है। धनुष में जो गुण है उसमें संयुत करण
केवल संश्लेष