नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८५
है तथा केशों के संस्कार को दिखलाने के भाव में त्रिपताक हस्त को केशस्थान
पर अनामिका के साथ रखा जाता है।
३८-४१. कर्तरीमुख ( हस्त ) :—कर्तरीमुख के लक्षण में मूल कारिका
में प्रयुक्त 'पृष्ठावलोकिनी शब्द का आशय है कि तर्जनी तथा मध्यमा
अंगुलियां परस्पर संश्लिष्ट नहीं होना चाहिए तथा मध्यमा के पीछे तर्जनी
दिखलाई पड़ना चाहिए। 'कर्तरीमुख' का कैंची के जैसा ही रूप अभिनय
द्वारा दिखलाया जाता है। इसकी योजना के प्रसंग में आवश्यकता-
नुसार कर्तरीमुख को अधोगमन या नीचे मुंहवाला और पृष्ठावलोकनशील
रख कर उसके चलन हलन को सूचित किया गया है। जैसे तर्जनी
का मध्यमा के पीछे फैलाना पृष्ठावलोकन होता है, उसके विपरीत मध्यमा
का तर्जनी के पीछे जाना रूप चलन भी और फिर अपने स्वरूप की प्राप्ति
करना अर्थात् मध्यमा के पीछे तर्जनी का फैल जाना। यह क्रिया भी इसी के
द्वारा अभिनीत की जा सकती है, परन्तु अर्थानुसार ही ! आशय यही है कि
युक्ति के द्वारा कभी मिलना, फिर दूर हटना, कभी उलटे हो जाना और
कभी एक दो बार या तीन बार भी किसी 'हस्त का प्रयोग किया जा सकता
है। 'अभिनयदर्पण' में कर्तरीमुख का लक्षण भिन्न है—तदनुसार त्रिपताक
हस्त में कनिष्ठिका को टेढ़ी झुका कर तर्जनी और कनिष्ठिका को बाहर की
ओर सीधे फैला दिया जाए तो कर्तरीमुख हस्त हो जाता हैं'। इसकी योजना
स्त्री पुरुष के वियोग या विवाद, परिवर्तन या प्रतिकूलता, लूटखसोट, नेत्र
का कोना, मृत्यु, भेदभाव, बिजली की चमक, विरहावस्था में अकेले शयन,
गिरना तथा लता आदि के भावों को दिखलाने में की जाती है ।
( अभि० द० १०५-१०७ ) नाट्यशास्त्र-संग्रह में 'कर्तरीमुख' का भरतोक्त
लक्षण से थोड़ा मिलता हुआ लक्षण है। तदनुसार—महावर से पैरों को रंगने,
किसी वस्तु के गिरने को दिखलाने के लिये इसी हस्त को तर्जनी के स्थान
पर मध्यमा तथा मध्यमा के स्थान पर तर्जनी को रखते हुए की जाती है ।
इसके अतिरिक्त अधोगत हस्त को ऊपर की ओर उठा कर देखा जाए तो
लेख, पत्र या किसी पुस्तक के पढ़ने का भाव दिखलाया जा सकता है ।
( ना० शा० सं० ११६-११७ )
४२-४४. अर्धचन्द्र ( हस्त ) :— इसमें अंगूठा धनुष जैसा झुका हुआ
रहता है किन्तु अंगूठा बाहर सीधा फैल जाने से उसका मिलकर छोटा रहना
नहीं हो सकता । यहाँ योजना की कारिका ४३ में "मध्यौपम्य" शब्द है—
२५ ना० शा० द्वि०