नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 514, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०३
१६७. अभिनय के विषय में अन्य तथ्य भी बतलाते हैं—ज्येष्ठ इत्यादि
से । ज्येष्ठ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के चतुर्वर्ग के उपदेश प्रदाता उत्तम
नाटकादि के प्रयोग में प्रत्यक्ष की प्रधानता है अतः हस्त का स्वल्प अभिनय
रहना चाहिए। भाण आदि हास्य प्रधान भाण प्रहसन आदि रूपकों के प्रयोग
में मध्यम हस्त प्रयोग रखना चाहिये क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष की प्रधानता के
साथ आकाशभाषितादि की भी बहुलता रहती है। नृत्त षिद्गकादि अधम में
प्रकीर्ण हस्तों का अभिनय किया जाए ।
१ : ८ . लक्षण अर्थात् वर्तना के क्रम से योजित 'सौष्ठव' अर्थात् वर्णित
स्वरूप के अनुगत । अधमपात्रों के हस्त लक्षणों के अनुगत नहीं रहते वे केवल
लोक क्रिया के अनुगत रहते हैं ।
१६६. अन्य आचार्यों के मत को अथवा के द्वारा यहाँ दिखलाया जा रहा
है । जैसा समय हो—अर्थात् भय, जुगुप्सा, आदि में तथा शीत, वर्षा या आतप
के योग में हस्तों की अस्फुट या अटपटी स्थिति ही सौष्ठव है । विपरीत या
भिन्न स्वरूप का आशय है कि अवहित्थादि में सौष्ठव की योजना न करना ही
सौष्ठव है ( तथा यही वैपरीत्य है ) ।
१७०-१७३. विहस्त = हस्त में विकलता रहना । मद्यपान से युक्त
'मदमत्त' तथा प्रमाद करने वाला व्यक्ति 'उन्मत्त' कहलाता है । ( परन्तु )
जो हस्त आन्तरिक चित्तवृत्तियों को सूचित करें उनको अवश्य प्रस्तुत किया
जाए । जैसे कपोतहस्त भय को, मदन हेतुक जृंभा ( जंभाई ) को कर्कटक-
हस्त, कपोतहस्तजैसे शोक को और शुकतुण्डहस्त ईर्ष्या को सूचित करता है
तो ऐसे हस्तों का अवश्य प्रयोग द्वारा किया जाए ।
१७४. यहाँ हस्ताभिनय प्रयोग के सभी निषेध स्थल बतलाये गये हैं।
जैसे सारथि के द्वारा घोड़ों की रस्सी सम्हालने के कारण दोनों हाथों के
व्यस्त रहने की स्थिति में हस्ताभिनय संभव नहीं होता । विलोकनं पद से
चित्तवृत्ति के मालूम हो जाने पर कि यह कैसा है इसे देखने से मुखराग आदि
के द्वारा स्फुटरूप से अभिनय करे ।
१७५. अब दिशाओं के भेद से हस्तप्रचार को कहते हैं—उत्तान इत्यादि
के द्वारा । जैसे 'पृथ्वी पर निर्माण किया' के अभिनय में किया जाने वाला
पताकहस्त उत्तान रहता है या आगे की ओर जाने वाला त्रिपताक भी ।
पार्श्व में—जैसे धनुष चलाने के अभिनय में मुष्टि हस्त का प्रयोग । अधो-
मुख—जैसे समुद्र के अभिनय में स्वस्तिक पताक हस्त का ललाटक्षेत्र गत
प्रयोग करना ।