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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 668 में से

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परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३८९
देखने का अभिनय करती है। चन्दन पीसने का अभिनय दोनों भागों में
गोलाकार या चक्राकार हस्त को घुमाते हुए होता है। इस हस्त से विवाह में
वधू के वस्त्र प्रान्त को सम्हालने या उसके आलम्बन का अभिनय किया जाता
है। प्रायः कुपिता नायिका के प्रसादन में अनुसरण के समय इसी हस्त द्वारा
उसके आंचल के कोने को पकड़ा जाता है। क्रीड़ाकाल में केश के आकर्षण
का भी तथा पुरुषों के उत्तरीय थामने या पकड़ने का भी इसी हस्त के
द्वारा अभिनय होता है, परन्तु स्त्रियों के उत्तरीय पकड़ने का अभिनय सहज
होगा। इस प्रकार इस हस्त का चतुरस्र या सभी दशाओं में उपयुक्त
अभिनय संयोजित हो सकता है। अभिनयदर्पण के अनुसार इसका लक्षण है—
जिसमें उठी हुई तर्जनी और मध्यमा अंगूठे के अग्रभाग को छूती हो तो
'खटकामुख' हस्त होता है। इसकी योजना—फूल चुनने, मोतियों की या
पुष्पों की माला धारण करने, धनुष को मध्य भाग से पकड़ कर खींचने,
ताम्बूलादि प्रदान करने, कस्तूरी, चंदन आदि को पीसने, वस्तु को सुगन्धित
करने, बोलने या देखने के भाव में की जाती है। (अभि० द० १२४-
१२७)
६४-६७. सूचीमुख हस्त :—इस हस्त का मुख सूची के आकार का
होने से 'सूचीमुख' नाम सार्थक है। प्रदेशिनी का अर्थ है 'तर्जनी'। इस की
विविध दशाओं के कारण इसके अभिनय भी विविधता-सम्पन्न होते हैं। लोला
का अर्थ है एक बाजू से दूसरी बाजू में जाने वाली। 'कम्पिता' वह है जो
उसी स्थान पर हिलती हुई रहे। अभिनय के अनुसार चलने वाली 'चला' है।
चक्र के अभिनय में प्रदेशिनी को ऊर्ध्वमुख रख एक बाजू से दूसरे बाजू तक
चक्कर लेती हुई ले जाना चाहिए। मीन के अति बालोरग का उपादान यह
सूचित करता है कि मीन तथा बाल सर्प की गति एक दूसरे से विलक्षण
है। इसी प्रकार वल्ली, लता और मञ्जरी के अवान्तर भेदों की बारीकी
भी ध्यान में रखी जाए। जैसे—ककड़ी, लौकी की वल्ली, अंगूर दाख आदि
की लता, आम की मञ्जरी होती है। 'प्रणता' और 'उन्नता' का आशय
है पहिले झुकी हुई और फिर ऊपर को जाती हुई तथा लम्बाई में ऊँची होने
वाली। रोष दिखाने में और पसीना पोंछने में या मस्तक से पसीना
हटाने में तर्जनी को फैलाई हुई रखते हैं। अहंकार के अभिनय में ललाट
पर तर्जनी को करना चाहिए। प्रत्यक्ष शत्रु के निर्देश में तर्जनी अग्रभाग में
नत रखी जाती है। शत्रु के अनुसन्धान या खोजने का अभिनय तीन अंगु-